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Tuesday, October 20, 2026

राष्ट्रहित का ‘मोदी मंत्र’: सोने का मोह और ईंधन का धुँआ… कहीं हम अपना भविष्य तो नहीं जला रहे?

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डिजिटल डेस्क 12/05/2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विजन केवल आज की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह तीन दशकों के अनुभव और ‘राम मंदिर निर्माण’ जैसे अकल्पनीय कार्यों की दूरदर्शिता से उपजा है।

हाल के संदर्भों में उनके द्वारा दी गई सलाह—”डीजल-पेट्रोल का सीमित उपयोग और सोने के प्रति अनावश्यक मोह का त्याग”—महज एक अपील नहीं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता का एक ब्लूप्रिंट है।

विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा: सैर-सपाटा या संकट?
आजकल थाईलैंड, बैंकॉक और सिंगापुर जाना एक स्टेटस सिंबल बन गया है। प्रधानमंत्री का संकेत स्पष्ट है: जब हम बेवजह विदेश यात्राओं पर डॉलर खर्च करते हैं, तो देश का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) कम होता है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपातकाल के लिए यह भंडार रीढ़ की हड्डी है। अनावश्यक “सैर-सपाटा” देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव डालता है। हमें केवल अति-आवश्यक कार्यों के लिए ही वाहनों का प्रयोग करना चाहिए ताकि ट्रैफिक और प्रदूषण के साथ-साथ ईंधन आयात का खर्च भी कम हो सके।

जन चौपाल-36 विचार
सोना: आभूषण नहीं, देश की ढाल
“भारत में सोने के प्रति दीवानगी जगजाहिर है, लेकिन पीएम का मानना है कि सोना देश का आपातकालीन सुरक्षित भंडार है। क्या देश की संकट कालीन पूंजी को गहनों की तरह पहनकर चलना उचित है?”

प्रदर्शन बनाम सुरक्षा:
25-25 तोला सोना पहनकर ‘गोल्डमैन’ बनना रईसी नहीं, बल्कि संसाधनों का दुरुपयोग है।
सीमित संसाधन:
सोना एक प्राकृतिक और सीमित संसाधन है। अंधाधुंध उपभोग भविष्य के भंडार को रिक्त कर देगा।

आध्यात्मिक संकेत;
याद रखिए, जिसकी लंका जली थी वह सोने की थी। सीता भी मोहित हुई थी स्वर्णमृग में,कलयुग का वास भी स्वर्ण में माना गया है। हमारे आदर्श ‘वल्कल धारी’ राम और ‘ब्रह्मचारी’ हनुमान हैं, जो सादगी का प्रतीक हैं।

जीवन जीने का नजरिया: ढोना नहीं, जीना सीखें
प्रधानमंत्री के शब्दों का सार यह है कि हम सोने और संसाधनों को बटोरने में ही जिंदगी न गुजार दें। दुनिया के अन्य देशों में लोग जीवन का आनंद लेते हैं, जबकि हम उसे ‘ढोते’ हैं। आज सुलभ लोन के कारण हर हाथ में वाहन है, जिससे सड़कें छोटी पड़ रही हैं और पुलिस व्यवस्था पर बोझ बढ़ रहा है।

जनचौपाल 36/निष्कर्ष
प्रधानमंत्री एक ‘चमत्कार’ की भांति देश को सही दिशा दिखा रहे हैं। एक आम नागरिक के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि हम दिखावे की संस्कृति को छोड़कर, देश की आर्थिक सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भागीदार बनें। चमत्कार को नमस्कार तभी सार्थक है, जब हम उनके बताए मार्ग पर चलें।

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