काठमांडू/नई दिल्ली/डिजिटल डेस्क_29/03/ 2026
लेखक_शुभम पांडेय
नेपाल में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़े स्तर पर बदलाव लागू किए गए हैं, जिनका उद्देश्य पारंपरिक “एग्जाम और रट्टा” आधारित मॉडल से हटकर स्किल-बेस्ड लर्निंग, समझ और व्यवहारिक ज्ञान पर फोकस करना है। नई नीतियों के तहत कक्षा 5 तक पारंपरिक परीक्षाएं समाप्त कर दी गई हैं, स्कूलों में छात्र राजनीति पर रोक लगाई गई है और फ्लेक्सिबल ग्रेडिंग सिस्टम को लागू किया गया है।
इसके साथ ही शिक्षा को अधिक प्रैक्टिकल और कौशल आधारित बनाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि छात्र केवल जानकारी याद करने के बजाय उसे वास्तविक जीवन में इस्तेमाल करना सीखें। इस नई व्यवस्था में शुरुआती कक्षाओं की पढ़ाई को स्थानीय परिवेश, संस्कृति और वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिससे बच्चे अपने ही वातावरण के माध्यम से सीख सकें और विषयों को अधिक गहराई से समझ सकें।
शिक्षा विशेषज्ञों और न्यूरोसाइंस से जुड़े अध्ययनों के अनुसार, कम दबाव वाले माहौल में पढ़ाई करने से शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर कम होता है, जिससे मेमोरी, समझने की क्षमता और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है। स्किल-बेस्ड और अनुभवात्मक लर्निंग बच्चों में समस्या समाधान और क्रिटिकल थिंकिंग जैसी क्षमताओं को मजबूत बनाती है।
इस मॉडल का उद्देश्य छात्रों को केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में विकसित करना है जो अपने परिवेश को समझ सकें, नई परिस्थितियों में खुद को ढाल सकें और वास्तविक जीवन की समस्याओं का समाधान कर सकें। इन बदलावों के साथ नेपाल में एक ऐसा छात्र मॉडल तैयार करने की दिशा में काम किया जा रहा है जो कम तनाव में बेहतर सीख सके और मानसिक रूप से अधिक सशक्त हो।
नेपाल का यह कदम दक्षिण एशिया के शिक्षा तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है, क्योंकि यह पारंपरिक पढ़ाई के तरीकों पर एक नई बहस को जन्म देता है। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत जैसे देशों में भी शिक्षा को अंकों और याद करने की प्रणाली से आगे बढ़ाकर समझ, कौशल और सोचने की क्षमता पर आधारित बनाया जाना चाहिए। आने वाले समय में इन सुधारों के परिणाम यह तय करेंगे कि नेपाल का यह मॉडल अन्य देशों के लिए एक उदाहरण बनता है या नहीं।


