सुप्रीम कोर्ट बोला— लिव-इन में भी महिला को मिलेगा 498A का कानूनी कवच
नई दिल्ली 04 अगस्त 2026
व्यापक तौर पर यह टिप्पणी महिलाओं के अधिकारों और बदलते सामाजिक-पारिवारिक ढांचे को मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
नए जमाने के बदलते रिश्तों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के कानूनी अधिकारों को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला को केवल इसलिए कानून की सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसका रिश्ता पारंपरिक विवाह के रूप में नहीं है।
कोर्ट के अनुसार, कुछ खास परिस्थितियों में लिव-इन से जुड़े मामलों में भी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के प्रावधान लागू हो सकते हैं।
धारा 498A का इस्तेमाल आमतौर पर विवाहित महिला को पति या उसके रिश्तेदारों की ओर से होने वाली क्रूरता और उत्पीड़न से बचाने के लिए किया जाता रहा है। लेकिन लिव-इन रिलेशनशिप में इस धारा के इस्तेमाल का सवाल लंबे समय से कानूनी बहस का विषय रहा है। ऐसे मामलों में अदालत को रिश्ते की प्रकृति, दोनों पक्षों के साथ रहने की स्थिति और सामने आए आरोपों समेत कई पहलुओं की जांच करनी होती है।
कब माना जाएगा ‘विवाह की प्रकृति’ का रिश्ता
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि किसी लिव-इन रिश्ते को ‘विवाह की प्रकृति’ का तभी माना जाएगा जब:
दोनों पक्षों के बीच शादी करने की स्पष्ट मंशा रही हो
रिश्ता लंबे समय से चला आ रहा हो और विवाह जैसा स्थापित हो चुका हो।रिश्ता पति-पत्नी की तरह के आचरण को दर्शाता हो।
ऐसी परिस्थितियों में अगर महिला के साथ क्रूरता या उत्पीड़न होता है, तो पुरुष साथी के खिलाफ धारा 498A के तहत आपराधिक कार्रवाई हो सकती है।
सिर्फ नाम से नहीं, हालात से तय होगा फैसला
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी मामले में कानून लागू करने का फैसला केवल रिश्ते के नाम के आधार पर नहीं किया जा सकता। हर मामले की परिस्थितियों को अलग-अलग परखना जरूरी होगा।
इसका मतलब यह है कि हर लिव-इन रिश्ते में धारा 498A अपने-आप लागू नहीं होगी, लेकिन जहां कानून के तहत जरूरी परिस्थितियां मौजूद हैं, वहां महिला को केवल शादी न होने की वजह से सुरक्षा से वंचित नहीं रखा जा सकता।
संबंध पर अहम है यह टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर सामाजिक और कानूनी, दोनों स्तरों पर बहस तेज हुई है। आज बड़ी संख्या में लोग विवाह के बजाय साथ रहने का विकल्प चुन रहे हैं। ऐसे रिश्तों में महिलाओं को हिंसा, मानसिक प्रताड़ना या गंभीर दुर्व्यवहार का सामना करना पड़े तो उनके अधिकारों और कानूनी सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
कोर्ट की टिप्पणी से यह संदेश साफ है कि रिश्ते की कानूनी स्थिति के साथ-साथ उसमें शामिल महिला के साथ होने वाले व्यवहार को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
मुख्य बिंदु एक नजर में यह व्याख्या से कानूनी सुरक्षा का विस्तार धारा 498A अब सिर्फ विवाहित महिलाओं तक सीमित नहीं ,शर्त रिश्ता विवाह की प्रकृति का हो और शादी की मंशा रही हो।
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