अध्यात्म डेस्क,31/03/2026
श्रीहनुमान जी का व्यक्तित्व अकल्पनीय है। वह अद्वितीय शक्ति के स्वामी होकर भी परम शांत हैं और असीमित साहस के प्रतीक होकर भी परम विनम्र। हनुमान जयंती के इस अवसर पर, आइए उनके जीवन के उन अनछुए पहलुओं पर विचार करें जो हमें हमारे लक्ष्यों (Goals) की प्राप्ति और चुनौतियों के सामना करने की कला सिखाते हैं।
विस्मृति से आत्मबोध तक: मौन की शक्ति
सुंदरकांड के प्रारंभ में हनुमान जी शांत और गंभीर मुद्रा में बैठे हैं। उन्हें स्वयं की शक्तियों का भान नहीं है। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो, शक्तियों को भूल जाना अहंकार को शून्य करने की प्रक्रिया है। जब व्यक्ति अपनी ‘कर्त्ता’ वाली शक्ति को भूलकर साक्षी भाव में आता है, तभी वह ईश्वरीय कार्य के लिए तैयार होता है। जामवंत जी द्वारा उन्हें जागृत करना इस बात का प्रतीक है कि हर व्यक्ति के भीतर असीमित संभावनाएं हैं, बस उसे एक सही ‘मेंटर’ या ‘प्रेरणा’ की आवश्यकता होती है।
जब पैरों तले जमीन खिसक जाए: साहस की परीक्षा
एक बहुत सटीक अवलोकन किया कि हनुमान जी जिस पर्वत पर चढ़कर छलांग लगाते हैं, वह उनके वेग से पाताल में धंस जाता है— “चलेउ सो गा पाताल तुरंता”।
जीवन का पाठ: जब हम किसी महान लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाते हैं, तो अक्सर हमारे पुराने आधार, सुख-सुविधाएं और सुरक्षा (Comfort Zone) छिन जाती है। ऐसा लगता है जैसे पैरों तले जमीन खिसक गई हो। लेकिन हनुमान जी घबराते नहीं; वह आधार गिरने पर ‘आकाश’ को अपना मार्ग बना लेते हैं। यदि लक्ष्य बड़ा है, तो जमीन का सहारा छोड़कर उड़ने का साहस जुटाना ही होगा।
सुरसा और सूक्ष्म रूप: अहंकार का त्याग
रास्ते में सुरसा रूपी समस्या आती है जो अपना मुख बढ़ाती ही जाती है। हनुमान जी ने यहाँ ‘प्रतियोगिता’ के बजाय ‘बुद्धिमानी’ चुनी।
जीवन का पाठ: समस्याओं से लड़ने के लिए हमेशा बल की नहीं, कभी-कभी ‘लघु’ (छोटा) बनने की आवश्यकता होती है। जब हम अपनी समस्याओं के सामने बहुत बड़े बनकर खड़े होते हैं, तो समस्या और विकराल हो जाती है। हनुमान जी का “अति लघु रूप” धारण करना सिखाता है कि विनम्रता और चपलता से बड़ी से बड़ी बाधा के ‘मुंह’ से सुरक्षित निकला जा सकता है।
अदृश्य शत्रु और मनोबल की रक्षा
सिंहिका जैसी ‘परछाईं पकड़ने वाली’ आसुरी शक्तियों का सामना करना पड़ता है, जो हमें दिखाई नहीं देतीं लेकिन हमारे मनोबल और प्रसिद्धि को खींचकर नीचे गिराना चाहती हैं।
जीवन का पाठ: समाज में ऐसे कई लोग और परिस्थितियां होंगी जो सीधे सामने नहीं आएंगी, लेकिन आपकी तरक्की को देखकर पीछे से आपकी छवि या आपके उत्साह को नुकसान पहुंचाएंगी। हनुमान जी ने उसे पहचान कर उसका संहार किया। सजगता ही ऐसे अदृश्य शत्रुओं से बचने का एकमात्र उपाय है।
दुर्गम राह और मशक रूप: सूक्ष्म दृष्टि
लंका जैसी अभेद्य नगरी, जहाँ प्रवेश के मार्ग बंद थे, वहाँ हनुमान जी “मशक समान रूप” (मच्छर के समान छोटा रूप) धारण कर प्रवेश करते हैं।
जीवन का पाठ: जटिल परिस्थितियों में बड़े-बड़े प्रयास कभी-कभी विफल हो जाते हैं। वहाँ सूक्ष्म निरीक्षण और एक छोटी सी शुरुआत (Micro-steps) काम आती है। यदि दीवार ऊंची है और दरवाजा बंद है, तो अपनी रणनीति को इतना सूक्ष्म और सटीक बनाएं कि बाधाओं को पता ही न चले कि आप कब सफल हो गए।
देह और आत्मा का एकाकार: विज्ञान की पराकाष्ठा
हनुमान जी ‘अष्ट सिद्धि और नवनिधि’ के दाता हैं। वे शरीर को विचार के वेग से चलाने की क्षमता रखते हैं। आज का विज्ञान जिस ‘आत्मा और शरीर के संबंध’ की खोज कर रहा है, हनुमान जी उसके जीवंत उदाहरण हैं। उनकी भक्ति ही उनकी शक्ति है, जहाँ देह का अस्तित्व केवल राम-काज (लक्ष्य) के लिए है।
निष्कर्ष
हनुमान जयंती हमें सिखाती है कि लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शारीरिक बल से अधिक मानसिक दृढ़ता, अहंकार का विसर्जन और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की कला (Adaptability) अनिवार्य है। हनुमान जी की तरह शांत रहकर अपनी ऊर्जा को संचित करें और सही समय आने पर अपने पैरों तले जमीन खिसकने की परवाह किए बिना ‘लक्ष्य’ की उड़ान भरें।


