कंक्रीट की दुनिया और मरता हुआ दिल: एक अनकही त्रासदी
संपादकीय/26 जून 2026
हमको आजादी मिली गुलामी गरीबी और बेबसी की बुनियाद पर लेकिन आज हमने देश को उत्तरोत्तर विकास की ओर ले गए और विकास के शिखर पर देश को खड़ा कर दिया। हमने अपनी आजादी का बेदर्दी दुरुपयोग किया हरियाली को पूरी तरीके से खत्म कर कंक्रीटीकरण का पूरा जाल बुन दिए ।
हमने हरियाली पर विकास का अमरबेल चढ़ा दिया
आज हम चारों तरफ जिस ‘विकास’ का शोर सुन रहे हैं, वह असल में ‘कंक्रीटीकरण’ का एक जाल है। हमने सिर्फ जंगलों और खेतों को ही कंक्रीट से नहीं ढका, बल्कि हमने अपने अहसास और अपने दिल को भी इसी ‘कंक्रीट’ की कठोरता से भर दिया है।
दिल की अनदेखी: कंक्रीट का साम्राज्य
जब हमने दिल की कोमल आवाज़ को अनसुना करना शुरू किया और दौलत की खनखनाती फड़फड़ाती आवाज को सुनना शुरू किया तभी से हमने कुदरत (प्रकृति) के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया। आज चारों तरफ बस कंक्रीट ही कंक्रीट की दुनिया है। हमने ज़मीन को सीमेंट से ढंक दिया ताकि वहां धूल न उड़े, लेकिन हम भूल गए कि जब ज़मीन की पोर-पोर बंद हो जाएगी, तो वह आसमान से गिरने वाले अमृत (बारिश के पानी) को पियेगी कैसे?
जल संकट और बंजर भावनाएं
इस साल मानसून रूठ गया और आज जो जल संकट हम देख रहे हैं, वह सीधे तौर पर हमारे ‘पत्थर होते दिल’ का नतीजा है।हमने जिंदगी को गाँवों में नसीब से देखा है और शहरों की जिंदगी बड़े करीब से देखा है।
बाहर का संकट:
ज़मीन पर कंक्रीट की चादर बिछ गई, इसलिए भू-जल का स्तर गिर गया। नदियाँ सूख गईं और प्यास बढ़ गई।
भीतर का संकट:
दिल पर स्वार्थ की कंक्रीट जम गई, इसलिए भावनाओं का जल सूख गया। दया और करुणा की नदियाँ अब समाज में नहीं बहतीं। हमने प्रकृति से उसका पानी छीन लिया, और प्रकृति ने हमारे जीवन से उसकी शांति छीन ली।
पर्यावरण प्रदूषण: दिल की गंदगी का प्रतिबिंब
आज जो पर्यावरण प्रदूषण है, वह असल में हमारी सोच का प्रदूषण है। जब तक दिल में ‘मिट्टी की महक’ थी, हम पेड़ लगाते थे, नदियों को माँ कहते थे। लेकिन जब दिल ‘पत्थर का व्यापारी’ हो गया, तो हमने पेड़ों को सिर्फ लकड़ी और नदियों को सिर्फ नाला समझा।
अगर हमने दिल की बात सुनी होती, तो हम जानते कि कंक्रीट की ये ऊँची इमारतें कभी वो सुकून नहीं दे सकतीं जो एक बरगद की ठंडी छाँव और कल-कल बहते झरने में मिलता है।
कुछ समझे आप कंक्रीट तोड़िए, दिल को जोड़िए,दीवारों में कैद न रहिये
आज की युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि सिर्फ कंक्रीट के शहर बसा लेने से जीवन खुशहाल नहीं होगा। अगर हमें भविष्य बचाना है, तो हमें अपने दिल की ज़मीन से उस कंक्रीट को हटाना होगा। हमें वापस ‘मिट्टी’ से जुड़ना होगा, पर्यावरण की धड़कन को अपनी धड़कन समझना होगा। हमें तो याद है आज भी तालाब के पार में चलते हुए मिट्टी से फिसले गिरे और फिर नहाने गए। कभी मौसम खुलने का इंतजार करते रहे फटफटी (बाइक)निकाली तो बाइक के मडगार्ड में कीचड़ जम गई फिर हमने जाने का इरादा ही बदल दिया था सोचा जमीन में जमे रहो क्योंकि मिट्टी हमे रोक लेती थी ।
फिर क्या गुड़ी में गप्पे मारे और शाम को चौपाल लग गई। बरवट में देखा आरामी कुर्सी में बैठे दादाजी किताब पढ़े जा रहे थे।बातें याद आ गई दादा जी को कहते सुना था कुल बिहाओ और कन्हार जोतो ।मेरा गांव मेरी दुनिया मेरा तो देश बन गया।
“कंक्रीट का जंगल बनाम दिल की ज़मीन”
दिल अब ऐसे ही हो गया ।हम कभी पानी से बचते थे अब पानी हमसे बच रहा है।
“जिस दिन आखिरी पेड़ कटेगा और आखिरी नदी सूखेगी, तब इंसान को समझ आएगा कि वह ‘कंक्रीट’ और ‘नोट’ खाकर जिंदा नहीं रह सकता।”
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