नदी में डूबी पूरी जिंदगी”घमंड कोई भी हो, इंसान को अंदर से खाली कर देता है”
डिजिटल डेस्क- 02/07/2026
“भगवद्गीता 2.47 में कहा है – कर्म करो, फल की चिंता नहीं। शास्त्री जी के पास ज्ञान था, कर्म नहीं। नाविक के पास कर्म था, इसलिए बच गया।”
गंगा का किनारा। यात्रियों से भरी एक नाव दूसरे पार जा रही थी। उस नाव में एक विद्वान पंडित मोहन शास्त्री भी बैठे थे। नदी की लहरों से ज्यादा उफान उनके ज्ञान के अहंकार में था।
उन्होंने नाव खेते हुए भोले-भाले नाविक से पूछा, “भूगोल पढ़ी है?”
नाविक ने सिर हिलाया, “बाबूजी, भूगोल क्या होता है, मैं नहीं जानता।”
शास्त्री जी मुस्कुराए, “तब तो तुम्हारी पाव भर जिंदगी पानी में गई।”
थोड़ी देर बाद दूसरा सवाल आया, “इतिहास जानते हो? लक्ष्मीबाई कौन थीं?”
नाविक फिर चुप। शास्त्री जी बोले, “आधी जिंदगी पानी में गई।”
अहंकार यहीं नहीं रुका। तीसरा वार हुआ, “महाभारत का भीष्म-नाविक संवाद या रामायण में केवट-राम का संवाद सुना है?”
नाविक ने न में सिर हिलाया। शास्त्री जी खिलखिला उठे, “तुम्हारी तो पौनी जिंदगी पानी में गई।”
तूफान कभी भी आ सकता है
तभी गंगा का बहाव तेज हो गया। आसमान में बादल गरजे। नाव डगमगाने लगी। नाविक ने यात्रियों को संभलने को कहा और शास्त्री जी से पूछा, “पंडित जी, तैरना आता है?”
अब शास्त्री जी का चेहरा फीका पड़ गया। डरते हुए बोले, “नहीं… तैरना नहीं आता।”
नाविक ने शांत स्वर में कहा, “तब तो पंडित जी, आपकी पूरी जिंदगी पानी में गई।”
अगले ही पल नाव पलटी। सबको बचाने वाला नाविक बच गया, पर किताबी ज्ञान पर इतराने वाले शास्त्री जी गंगा की गोद में समा गए।
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कहानी के पीछे की सच्चाई
हम कितने भी बड़े हो जाएं, कितनी भी डिग्रियां बटोर लें, कितना भी पैसा कमा लें – सुबह पहनने वाली चप्पल से लेकर रात को ओढ़ने वाली चादर तक सब किसी न किसी मजदूर के हाथों से बनकर आती है।
सहयोगी कौन
जिस दफ्तर में AC में बैठकर हम बड़ी-बड़ी मीटिंग करते हैं, उसे सुंदर बनाने वाला, साफ करने वाला, चाय पिलाने वाला भी वही ‘अनपढ़’ वर्ग होता है जिसे हम अक्सर दरवाजे पर रोक देते हैं। हमारे सूट को सिलने वाला दर्जी, जूते पॉलिश करने वाला मोची, बाल काटने वाला नाई – इनके बिना हमारी पर्सनालिटी अधूरी है।
जब हम सफल हो जाते हैं तो बनाने वालों को भूल जाते हैं। यही घमंड है। और घमंड की उम्र बहुत छोटी होती है।
शिक्षा क्या कहती है(उद्देश्य)
विद्या विवाद के लिए नहीं, समाधान के लिए है। शास्त्र शस्त्र बन जाएं तो ज्ञान अभिशाप बन जाता है।
‘विद्या विनयेन शोभते’ – विद्या विनम्रता से ही सुंदर लगती है। जिस तरह फल से लदा पेड़ झुक जाता है, उसी तरह ज्ञानी व्यक्ति और विनम्र हो जाता है।
धन दान के काम
कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता। समाज एक शरीर है। मजदूर उसके पैर हैं। पैर के बिना सिर कितना भी बड़ा हो, चल नहीं सकता।
इसलिए अगली बार किसी को कमतर आंकने से पहले सोचिए – क्या मुझे तैरना आता है? क्योंकि जिंदगी की नदी में तूफान कभी भी आ सकता है। और उस वक्त डिग्री नहीं, हुनर और इंसानियत ही काम आती है।
घमंड पानी है – जिसमें सब डूब जाता है। विनम्रता नाव है – जो सबको पार लगा देती है।
सवाल? “आज रात सोने से पहले सोचिए – मेरी जिंदगी की नाव में तैरने वाला हुनर कौन सा है?”
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