(BNS)भारतीय न्याय संहिता के 2 साल पूरे: जानिए 5 बड़े बदलावों से आसान हुई न्याय प्रणाली
नई दिल्ली /रायपुर/ बेमेतरा 12 जुलाई 2026
उपलब्ध जानकारी के अनुसार (BNS)भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में ऐतिहासिक बदलाव को दो साल पूरे हो गए हैं। 1 जुलाई 2024 को अंग्रेजों के जमाने के IPC-CrPC की जगह लागू हुई BNS-BNSS-BSA, दो साल बाद जमीनी असर दिखने लगा है।
नई न्याय व्यवस्था के लिए देश भर में भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) लागू किए गए थे, जिन्होंने 1860 के IPC और 1973 के CrPC जैसे औपनिवेशिक कानूनों की जगह ली थी।
शुरुआत में सवाल था कि क्या सिर्फ कानूनों के नाम बदलेंगे या सच में आम आदमी को फायदा होगा? दो साल के आंकड़े और जमीनी रिपोर्ट बताते हैं कि पुलिसिंग और शिकायत की प्रक्रिया में 5 बड़े बदलाव साफ तौर पर दिखे हैं।
1. e-FIR से थाने के चक्कर खत्म
BNSS की धारा 173 के तहत अब नागरिक ऑनलाइन FIR दर्ज करा सकते हैं। CCTNS पोर्टल पर शिकायत देकर 3 दिन के अंदर थाने में हस्ताक्षर करना होता है। इससे समय की बचत और पुलिस की जवाबदेही दोनों बढ़ी है।
2. Zero FIR: कहीं भी दर्ज कराएं शिकायत
अपराध कहीं भी हुआ हो, अब किसी भी थाने में FIR दर्ज होगी। पुलिस क्षेत्राधिकार का हवाला देकर लौटा नहीं सकती। बाद में केस को संबंधित थाने में ट्रांसफर किया जाता है। यह प्रावधान यात्रियों और महिलाओं के मामलों में सबसे ज्यादा मददगार साबित हुआ है।
3. क्राइम सीन की वीडियोग्राफी अनिवार्य
7 साल या उससे अधिक सजा वाले गंभीर अपराधों में अब घटनास्थल की वीडियोग्राफी और फॉरेंसिक जांच अनिवार्य कर दी गई है। इससे सबूतों से छेड़छाड़ पर रोक लगी है और सजा की दर बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
4. महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सुरक्षा
नए नियमों में महिला पीड़िता का बयान महिला अधिकारी द्वारा ही दर्ज करने, और 15 साल से कम उम्र के बच्चे, 60 साल से अधिक के बुजुर्ग व दिव्यांगजनों का बयान उनके घर पर दर्ज करने का प्रावधान है।
5. नशे में अपराध पर और कड़ी सजा
BNS में 2026 में जोड़ा गया नया संशोधन धारा 24A कहता है कि स्वेच्छा से नशा करके किया गया गंभीर अपराध अब बचाव नहीं बनेगा। ऐसे मामलों में डेढ़ गुना तक अधिक सजा और 5 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।
क्या चुनौतियां अभी भी बाकी हैं?
केंद्र सरकार के अनुसार 8 लाख से ज्यादा पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी थानों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और पूरी ट्रेनिंग अभी भी बड़ी चुनौती है।
निष्कर्ष यही है कि भारतीय न्याय संहिता ने न्याय प्रणाली को आधुनिक, डिजिटल और पीड़ित-केंद्रित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
(संक्षिप्त जानकारी पर आधारित)
- Advertisement -
- Advertisement -