34.3 C
Raipur
Friday, June 5, 2026

छत्तीसगढ़ माटी की सौंधी खुशबू से: स्थानीय संस्कृति की खोज

Must read

छत्तीसगढ़ पारंपरिक त्योहारों में बनाता असली रंग, नई पीढ़ी को जोड़ने की जरूरत

रायपुर, 15 मई 2026:-

आज हम छत्तीसगढ़ के त्यौहार और उत्सव पर बात करते है।
छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ तो कहा ही जाता है, लेकिन इसकी असली पहचान यहां की मिट्टी से जुड़ी संस्कृति और पारंपरिक त्योहारों से है। आधुनिकता की दौड़ में कहीं खोते जा रहे इन लोक उत्सवों को सहेजना अब जरूरी हो गया है।

छत्तीसगढ़ में तिहार (त्योहार) नहीं, जीवन पद्धति है
छत्तीसगढ़ के त्योहार सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं हैं। ये यहां के किसान, आदिवासी और ग्रामीण जीवन का दर्पण हैं।
छत्तीसगढ़ में ही सभी त्यौहार पर्व पर आनंद और उत्सव मनाया जाता है।

राज्य के प्रमुख पारंपरिक त्योहार और उनका महत्व:

हरेली
छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार हरेली मुझे लगता है इसका एक अभिप्राय हरियाली से हो सकता है जहां धरती चहुंओर हरियाली चुनर ओढ़े नजर आती है।सावन महीने में खेती-किसानी के औजारों की पूजा होती है। बैलों को सजाया जाता है, गेड़ी चढ़ने की प्रतियोगिता होती है। छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य है जिसका संदेश साफ है- अन्नदाता और उसके साथी पशुओं का सम्मान।

पोला-पिठौरा
जो खेती किसानी में पहले बहुत काम आया बैलों के बगैर किसानी मुश्किल ही था इसलिए यह त्यौहार बैलों को समर्पित है। किसान अपने बैलों को नहलाकर, सींगों में तेल लगाकर, माला पहनाते हैं। बच्चे मिट्टी के नंदी-बैल से खेलते हैं। कृषि संस्कृति की जड़ से जोड़ता है यह पर्व।

तीजा
महिलाओं का सबसे बड़ा त्योहार। मायके आने वाली बेटियां सुआ, करमा, ददरिया गीत गाती हैं। फुलेरा बांधकर झूला झूलती हैं। नारी शक्ति और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक।

नवाखाई
नए धान की फसल आने की खुशी। घर-घर नए चावल का भोग लगता है। ‘जुर मिलन’ मतलब जुड़कर एक साथ एकता की परंपरा में पूरा गांव एक साथ खाता है। सामुदायिक एकता का सबसे बड़ा उदाहरण।

बस्तर दशहरा
लोक प्रसिद्ध तिहार 75 दिन चलने वाला दुनिया का सबसे लंबा दशहरा। रावण दहन नहीं होता, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना होती है। आदिवासी संस्कृति की जीवंत झांकी।

मड़ई मेला
उत्सव और आनंद बिखेरते गांव-गांव लगने वाले मेले। देवगुड़ी में पूजा के बाद नाचा, गम्मत, रहस का दौर चलता है। लोक कलाकारों को मंच मिलता है।

क्यों जरूरी है इनका संरक्षण?
संस्कृति विभाग के अधिकारी बताते हैं कि शहरीकरण के कारण युवा पीढ़ी सुआ-करमा के गीत भूल रही है। गेड़ी-भौंरा की जगह मोबाइल ने ले ली है। अगर ये त्योहार नहीं बचे तो छत्तीसगढ़ी पहचान का बड़ा हिस्सा खत्म हो जाएगा।

सरकार और समाज की पहल
राज्य सरकार ने ‘लोक कलाकार प्रोत्साहन योजना’ के तहत मड़ई मेलों को अनुदान देना शुरू किया है। स्कूलों में हरेली-तीजा पर अवकाश और सांस्कृतिक कार्यक्रम अनिवार्य किए गए हैं। कई ग्राम पंचायतें अब ‘त्योहार कैलेंडर’ बनाकर उत्सव मना रही हैं।

विशेषज्ञ की राय
लोक संस्कृति के जानकार कहते हैं, “छत्तीसगढ़ के त्योहार प्रकृति और खेती से जुड़े हैं। ये हमें पर्यावरण बचाने का संदेश देते हैं। हरेली पर नीम की डाली गाड़ना, तीजा पर बीज सहेजना- ये सब सतत विकास के पाठ हैं।”

आगे की राह जन चौपाल 36 की चाह
जरूरत है कि इन त्योहारों को सिर्फ ‘इवेंट’ न बनाकर जीवन का हिस्सा बनाया जाए। स्कूल-कॉलेजों में लोकगीत प्रतियोगिता, गांवों में युवाओं को पारंपरिक वाद्य सिखाना, और सोशल मीडिया पर छत्तीसगढ़ी संस्कृति का प्रचार करना होगा। क्योंकि जब तक त्योहार जिंदा हैं, तब तक छत्तीसगढ़ की आत्मा जिंदा है।

- Advertisement -spot_img

More articles

- Advertisement -spot_img

Latest article