राजनीति बुनने लगी भारत माता का आंचल, तो पाणिनि का व्याकरण भी विरोध करेगा”
हिंदी दिवस के संदर्भ में—धर्म, समाज और भाषा को बांटती राजनीति पर एक बेबाक व्यंग्य।
न्यूज आर्टिकल 15 सितंबर 2026
इन दिनों ‘हनुमान’ नाम पर बनी फिल्में चल रही हैं और बड़े-बड़े नेता भी इन्हें देखने की सलाह दे रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि हनुमान जी का नाम किसने रखा और वे किसके प्रतीक थे? वे तो निःस्वार्थ सेवा के प्रतीक थे, न कि वोट बैंक की राजनीति के! एक पार्टी कहती है कि दूसरी ने 1947 में देश का भू-भाग बांट दिया, लेकिन आज तो आम आदमी के दिलों और उनके आपसी भाईचारे को बांटने के सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं।
मां की जमीन पर बच्चे कैसे खेलते कूदते है क्या आपने ध्यान से देखा है!?
एक मां ही जानती है कि अपने अलग-अलग मिजाज वाले बच्चों को कैसे पालना है और कैसे संस्कार देने हैं। हम सब उसी भारत माता की संताने हैं—अलग स्थानों पर रहे, अलग काम किए, लेकिन मां का आंचल सबके लिए एक जैसा रहा। पर आजकल के हालात देखकर लगता है कि राजनीति और धर्म के ठेकेदार इस आंचल को ही अलग-अलग थान में काटने पर तुले हैं। अगर भाई-भाई आपस में लड़ने लगे, तो मां का दिल तो टूटेगा ही।
राजनीति में असली मुद्दे कम हो गए हैं!?
आजकल की राजनीति के पास जब असली मुद्दों की कमी होती है, तो वे भावनाओं का बाजार सजा लेते हैं। कभी राम मंदिर के नाम पर चर्चा गरम होती है, तो कभी किसी नए कोटे या कानून को लेकर बहस छिड़ जाती है। सुनने में आया है कि कुछ राज्यों ने इन बदलावों पर विस्तृत चर्चा के लिए गृह मंत्रालय से समय मांगा है, क्योंकि हमारा देश मूलतः धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर खड़ा है।
उधर कानपुर से लेकर बड़े शहरों तक यूजीसी और आरक्षण के नए-पुराने नियमों को लेकर आंदोलन चल रहे हैं।
जो वर्ग कभी सत्ता का मुख्य स्तंभ माना जाता था, वह भी सड़कों पर है। मजा देखिए, भाषा से लेकर ग्रंथों तक, प्रकृति के वैज्ञानिक वर्गीकरण से लेकर पाणिनि के व्याकरण तक—जिस संस्कृति ने इस देश को शब्द और पहचान दी, आज राजनीति उसी समाज को बांटने के नए-नए समीकरण खोज रही है।
अगर सबकुछ बांटना ही तय है, तो फिर भाषा और नामकरण भी क्यों छोड़ते हो?अपना नाम क्यों नहीं बदल लेते!!
क्या भारत माता के आंचल को भी बांट देगी वर्तमान राजनीति? पाणिनि के व्याकरण से राजनीति का विरोध!क्या उचित होगा।
1947 में धर्म के आधार पर विभाजन झेल चुका यह देश अब जातियों और वर्गों में नए विभाजन बर्दाश्त नहीं कर सकता। वोट बैंक के लिए चाहे जितने भी टुकड़े करने की कोशिश कर ली जाए, यह पावन भूमि और इसकी मूल भावना कभी इस विभाजन को स्वीकार नहीं करेगी।
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