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Saturday, August 29, 2026

धन-दौलत और विशाल साम्राज्य होने के बाद भी इंसान क्यों खाली हाथ और दुखी रहता है?

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लेख विशेष – 28 अगस्त 2026

राजा की बात सुनते ही ब्राह्मण ने अपनी पोटली से वही ₹1 का सिक्का निकाला और राजा की हथेली पर रख दिया।

आज की दुनिया में हर व्यक्ति अधिक से अधिक पाने की अंधी दौड़ में शामिल है। लेकिन विचार करने योग्य विषय यह है कि आखिर जीवन में सबसे ज्यादा आवश्यकता किस चीज की है? क्या अपार धन-संपदा इंसान को अमीर बनाती है, या फिर असंतोष उसे सबसे बड़ा भिखारी बना देता है? इस सत्य को उजागर करती हुई यह एक मार्मिक कथा है।

कहानी: रास्ते का सिक्का और राजा की दरिद्रता

एक समय की बात है, एक ज्ञानी ब्राह्मण तड़के उठकर पूजा-पाठ के लिए मंदिर की ओर जा रहे थे। मार्ग में उनकी नज़र ज़मीन पर पड़े ₹1 के एक सिक्के पर पड़ी। ब्राह्मण ने सिक्का उठाया और सोचा— “यह धन मेरा नहीं है। मैं इसे किसी ऐसे दरिद्र व्यक्ति को दान करूँगा, जिसे इसकी वास्तव में आवश्यकता हो।”

ब्राह्मण ने पूरे नगर में भ्रमण किया, लेकिन उन्हें कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो वास्तव में दरिद्र लगे। नगर का हर नागरिक अपनी स्थिति में प्रसन्न और संतुष्ट था। दिन बीतते गए, ब्राह्मण वह सिक्का अपनी पोटली में बांधकर रोज दरिद्र की खोज करते रहे।

एक सुबह, जब ब्राह्मण मंदिर की ओर बढ़ रहे थे, तो उन्होंने देखा कि राज्य के राजा अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ किसी पड़ोसी राज्य पर आक्रमण करने जा रहे हैं।

सबसे बड़ा दरिद्र: एक रुपये का महासत्य

राजा की नज़र जैसे ही ब्राह्मण पर पड़ी, उन्होंने अपना रथ रुकवाया। राजा ने रथ से उतरकर ब्राह्मण के चरण स्पर्श किए और नम्रता से कहा—
“हे महात्मा! मैं दूसरे नगर पर विजय प्राप्त करने और उसके राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाने युद्ध पर जा रहा हूँ। कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मेरी जीत हो।”

राजा की बात सुनते ही ब्राह्मण ने अपनी पोटली से वही ₹1 का सिक्का निकाला और राजा की हथेली पर रख दिया।

राजा आश्चर्यचकित रह गया। उसने अचंभित होकर पूछा— “महात्मा! आप यह क्या कर रहे हैं? एक विशाल सेना के स्वामी और राजा को आप आशीर्वाद के स्थान पर यह एक रुपये का सिक्का क्यों दे रहे हैं?”

ब्राह्मण ने अत्यंत शांत और गंभीर स्वर में उत्तर दिया—
“राजन्! मुझे कुछ दिन पहले यह ₹1 का सिक्का मिला था। मैंने संकल्प लिया था कि इसे किसी अत्यंत दरिद्र और भिक्षुक को ही दूँगा। मैंने पूरे नगर में तलाश की, पर मुझे कोई दरिद्र नहीं मिला। आज जब मैंने आपको देखा, तो मुझे अहसास हुआ कि इस पूरी सृष्टि में आपसे बड़ा दरिद्र कोई नहीं है।

विशाल साम्राज्य, अपार धन-दौलत और सेना होने के बावजूद आपकी तृष्णा शांत नहीं हुई है। सब कुछ होते हुए भी आप दूसरों का राज्य छीनने जा रहे हैं। जिसके पास असंतोष का अभाव है, वही सबसे बड़ा भिखारी है। इसीलिए यह सिक्का आपके ही योग्य है।”

ब्राह्मण के यह शब्द सीधे राजा के हृदय में तीर की तरह चुभे। राजा की आँखें खुल गईं और उसका मस्तक लज्जा से झुक गया। उसे समझ आ गया कि भौतिक वस्तुओं का संग्रह इंसान को अमीर नहीं बनाता। उसने तुरंत अपनी सेना को वापस लौटने का आदेश दिया और युद्ध का विचार सदा के लिए त्याग दिया।

कहानी का मूल बोध
अतृप्त इच्छा ही दरिद्रता हैइंसान के पास कितना धन या पद है, इससे उसकी संपन्नता तय नहीं होती। अगर मन में और पाने का लालच भरा है, तो व्यक्ति सब कुछ होते हुए भी दरिद्र ही रहेगा।

स्वार्थ और असंतोष का चक्र-
जीवन में आगे बढ़ने का लक्ष्य होना अच्छी बात है, लेकिन जब इच्छाएँ इस हद तक बढ़ जाएँ कि मन में यह विचार आने लगे कि “दूसरे की जेब का पैसा मेरी जेब में कैसे आए”, तो इंसान अपना मानसिक संतुलन और शांति खो देता है।

संतोष ही असली धन है-
इंसान को खुश रहने के लिए परिग्रह (संग्रह) की नहीं, बल्कि संतोष की आवश्यकता होती है। जब तक ‘तृष्णा’ का अंत नहीं होगा, तब तक जीवन में सच्चे ‘आनंद’ का आरंभ नहीं हो सकता।

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