रायपुर 17 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा नारायणपुर वनमंडल कार्यालय सभागार में 14 अगस्त को वैद्य सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन का उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और वनौषधियों के संवर्धन को बढ़ावा देना था।
छत्तीसगढ़ की समृद्ध आदिवासी स्वास्थ्य परंपरा और वनौषधीय ज्ञान को अब वैश्विक पहचान मिल रही है। अबूझमाड़ की पारंपरिक स्वास्थ्य और भोजन परंपरा पर शोध करने के लिए विदेशों से भी शोधार्थी आ रहे हैं। यह बात नारायणपुर में आयोजित जिला स्तरीय वैद्य सम्मेलन में सामने आई।
वैद्यों ने साझा किया अनुभव, हर्बल गार्डन की मांग
बोर्ड के अध्यक्ष श्री विकास मरकाम ने दीप प्रज्ज्वलित कर सम्मेलन का शुभारंभ किया। वनमंडल अधिकारी श्री वेंकटेश एम. जी. ने उनका स्वागत किया। सम्मेलन में वैद्य रतन रंजन धर, कज्जाराम गोटा, रूपसिंह, सुखदेव, सोमनाथ, फूलसिंह, अमृतलाल और हरिचंद सहित नारायणपुर जिले के 25 वैद्यों ने हिस्सा लिया और पारंपरिक जड़ी-बूटियों से उपचार के अपने अनुभव साझा किए। वैद्यों ने जिले में वनौषधियों के संरक्षण और जन-जागरूकता के लिए हर्बल गार्डन विकसित करने की मांग रखी।
मुख्यमंत्री और वन मंत्री के मार्गदर्शन में वैद्यों के लिए योजनाएं
बोर्ड अध्यक्ष श्री विकास मरकाम ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की संवेदनशील पहल और वन मंत्री श्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार वैद्यों के उत्थान के लिए लगातार कार्य किया जा रहा है।
बोर्ड के कंसल्टेंट अमित गुप्ता ने बताया कि –
- आर्थिक रूप से कमजोर वैद्य समूहों को उच्च गुणवत्ता की जड़ी-बूटी पीसने के लिए निःशुल्क पल्वराइजर मशीन दी जा रही है। • हीलर हर्बल गार्डन योजना के तहत वैद्य अपनी बाड़ी में औषधीय पौधों का उद्यान लगा सकते हैं, जिसके लिए बोर्ड आर्थिक और तकनीकी मदद दे रहा है। • स्कूल हर्बल गार्डन के विकास और रखरखाव में भी सहयोग दिया जा रहा है। • पारंपरिक उपचार पद्धतियों का प्रमाणीकरण QCI के माध्यम से किया जा रहा है।
3 हजार हेक्टेयर में होगा वनौषधियों का रोपण
वनमंडल अधिकारी श्री वेंकटेश एम. जी. ने वैद्यों की मांग पर नारायणपुर में हर्बल गार्डन विकसित करने का आश्वासन दिया। उन्होंने बताया कि नारायणपुर वनमंडल में लगभग 3 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में वनौषधियों का रोपण किया जा रहा है। साथ ही वनौषधियों की रिपॉजिटरी और वैद्यों के ज्ञान का दस्तावेजीकरण भी किया जाएगा।
विलुप्तप्राय रसना और दहीमन का होगा संरक्षण
श्री मरकाम ने कहा कि विलुप्ति की कगार पर पहुंची रसना जड़ी नारायणपुर के छोटे डोंगर और बेनूर के जंगलों में पाई जाती है, इसी तरह लगभग विलुप्तप्राय दहीमन भी यहां उपलब्ध है। ऐसी दुर्लभ 50 वनौषधियों की पहचान कर उनके संरक्षण का कार्य बोर्ड द्वारा किया जा रहा है। यह सरकार और वैद्यों की साझा जिम्मेदारी है।


