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Saturday, June 6, 2026

देश में बिकती बेटियाँ: जब “माँ से मिलवाने” का वादा बन जाता है जाल

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न्यूज डेस्क 06 जून 2026

12 साल। 16 साल। दो बहनें। एक झूठा वादा — “माँ से मिलवा देंगे।”और फिर — राजस्थान के कोटा में, डेढ़ लाख रुपये में, एक “शादी।”

यह किसी फिल्म की पटकथा नहीं है। यह लखनऊ के गनिहार गाँव की हकीकत है, जो मई 2025 में तब सामने आई जब दो नाबालिग बहनें अचानक गायब हो गईं और उनकी बूढ़ी दादी थाने की दहलीज़ पर खड़ी थी — आँखों में आँसू और हाथ में एक शिकायत।

गिरोह का चेहरा: भरोसे की आड़ में धंधा
लखनऊ पुलिस ने जो गिरोह पकड़ा, वह कोई आकस्मिक अपराध नहीं था — यह एक सुनियोजित, अंतरराज्यीय तंत्र था। गिरफ्तार आरोपी हैं — अनुराग यादव (25), मोहम्मद अख्तर (32), प्रिया पटेल उर्फ शीला (23) और एक 17 वर्षीय नाबालिग।

तरीका सीधा और क्रूर था:
निशाना:गरीब, अनाथ या माँ-बाप से दूर रहने वाली लड़कियाँ
लालच: बेहतर ज़िंदगी, अच्छे कपड़े, घूमने-फिरने का मौका
तरीका: भरोसेमंद रिश्तेदार या परिचित बनकर विश्वास जीतना
अंजाम: राजस्थान में डेढ़ लाख रुपये में “शादी” के नाम पर सौदा

पुलिस के अनुसार अब तक इस गिरोह ने 20 लड़कियों को अपना शिकार बनाया — जिनकी उम्र 12 से 16 साल के बीच थी। दो तस्कर अभी भी फरार हैं।

वह कड़ी जो सब जोड़ती है — x पटेल
इस पूरे नेटवर्क की धुरी थी x पटेल — रायबरेली की रहने वाली, जो पीड़ित लड़कियों की “रिश्तेदार” बनकर उनके घर में आई।

जाँच में खुलासा हुआ कि 2020 में रायबरेली में एक शादी समारोह के दौरान उसकी मुलाकात कोटा की एक महिला “y” से हुई थी। वहीं से यह गिरोह बना। लखनऊ में लड़कियाँ पकड़ो, राजस्थान में बेचो — एक साफ-सुथरा, ठंडे दिमाग से बनाया गया धंधा।

सबसे चौंकाने वाली बात — एक महिला खुद इस गिरोह की सक्रिय सदस्य थी। यह तथ्य उस धारणा को तोड़ता है कि मानव तस्करी केवल पुरुषों का अपराध है।

पुलिस की मेहनत: 150 CCTV, चार टीमें, छह दिन
12 मई को लड़कियाँ गायब हुईं। 18 मई को बरामद हुईं। इन छह दिनों में लखनऊ पुलिस ने जो किया, वह काबिले तारीफ है:
150 CCTV कैमरों की फुटेज खंगाली। चार विशेष टीमें बनाईं — एक सादे कपड़ों में।तकनीकी और मैनुअल निगरानी एक साथ चलाई। लड़कियों के मोबाइल बंद थे — फिर भी सुराग निकाला

यह पुलिस कार्यवाही एक उदाहरण है कि जब संसाधन और इरादा दोनों हों, तो परिणाम मिलता है।

असली सवाल: 20 लड़कियाँ — और कितनी?
दो लड़कियाँ मिल गईं। लेकिन जो 20 बिक चुकी हैं — उनका क्या?
यह आँकड़ा केवल इस एक गिरोह का है, केवल लखनऊ का है, केवल उन मामलों का जो दर्ज हुए। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार भारत में हर साल मानव तस्करी के हज़ारों मामले दर्ज होते हैं — और विशेषज्ञ मानते हैं कि असली संख्या इससे कई गुना अधिक है।

कुछ प्रश्न जो इस मामले से उठते हैं और जिनका जवाब समाज को देना होगा:
पहला — जिन 20 लड़कियों को बेचा गया, क्या उनकी तलाश हो रही है? क्या वे उन “शादियों” में अभी भी फँसी हैं?

दूसरा — राजस्थान में “X” और उसके साथी अभी भी फरार हैं। बिना उस सिरे को पकड़े यह नेटवर्क टूटेगा नहीं।

तीसरा — गरीब, अनाथ और बेसहारा लड़कियाँ बार-बार इन गिरोहों का निशाना क्यों बनती हैं? क्योंकि उनके लिए **कोई सरकारी सुरक्षा जाल नहीं है।

समाज का दर्पण
डेढ़ लाख रुपये — यह उस बच्ची की “कीमत” है जिसने शायद कभी स्कूल का मुँह देखा हो या न देखा हो। जो शायद सोचती थी कि कोई उसे उसकी माँ से मिलाने ले जा रहा है।

यह केवल पुलिस और कानून का मामला नहीं है। यह उस समाज का आईना है जहाँ गरीबी, अनाथपन और लिंग मिलकर एक बच्ची को “बिकाऊ माल” बना देते हैं।

जब तक गाँव की वह दादी — जो थाने गई — अकेली लड़ती रहेगी, तब तक यह गिरोह टूट सकते हैं, लेकिन यह तंत्र नहीं टूटेगा।

दो बहनें मिल गईं — यह राहत की बात है। लेकिन 20 और लड़कियाँ अभी भी कहीं हैं। उनके लिए कौन थाने जाएगा?(खबर सूत्रों पर)

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