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Tuesday, July 21, 2026

लहरों का अनसुना शोर: प्रकृति का आदिम व्याकरण

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लेख – 07 जून 2026

मेरा जीवन मेरा दर्शन’ की शैली में एक बेहद प्रभावशाली और मुकम्मल लेख में लहरों के शोर को सीधे ईश्वर, मानव चेतना, प्रकृति की मूक भाषा और जल संरक्षण से जोड़ कर देखा गया है।

इस लेख का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि मनुष्य अपनी ही बनाई भाषा और शोर में इतना खो गया है कि वह प्रकृति (लहरों, जीव-जंतुओं, जल) की अनंत और रहस्यमयी भाषा को भूल चुका है।

सागर का शांत होना और लहरों का बार-बार किनारे पर आकर शोर मचाना, दरअसल प्रकृति की एक अनसुनी पुकार है, जिसे न समझ पाने के कारण ही आज असंतुलन पैदा हो रहा है।

सागर की यात्रा लगभग हर किसी ने की होगी। हम उसके विशाल विस्तार को देखते हैं, पैरों को छूकर गुजरती लहरों के साथ अठखेलियां करते हैं और लौट आते हैं।

लेकिन क्या कभी आपने ठहरकर उन लहरों के शोर को गहराई से पहचाना है? क्या कभी उस गूंज को डिकोड करने की कोशिश की है? वह सिर्फ पानी की हलचल नहीं है, वह ब्रह्मांड का एक आदिम संवाद है। लहरें कुछ कहती हैं, उनकी अपनी एक चीख है, एक भाषा है—वही लहरों का असल शोर है।

चलिए, आज इसी शोर का एक सिरा पकड़ते हैं और सत्य के कुछ छिपे हुए द्वारों को खटखटाते हैं।

ईश्वर, क्षीर सागर और अलगाव का रहस्य
भगवान को संसार का कण-कण जानता है, पूजता है और उनका अनुकरण करता है। लेकिन क्या कभी इस दार्शनिक पहलू पर विचार किया कि क्या वह परम चेतना भी इस सांसारिक शोर में हमें व्यक्तिगत रूप से पहचानती है? सनातन दर्शन में ईश्वर का वास ‘क्षीर सागर’ (दूध के समुद्र) में माना गया है। वह वहां शेषनाग की शय्या पर परम शांत मुद्रा में विराजमान हैं।

सवाल उठता है कि क्या भगवान क्षीर सागर में इसलिए रहते हैं ताकि वे इस सृष्टि के मूल शोर और उसकी तड़प को सीधे महसूस कर सकें? सागर की लहरों के बीच बैठकर कभी ध्यान से सुनिए। वे लहरें बार-बार उठती हैं और पूरी ताकत से किनारे की तरफ भागती हैं। ऐसा क्यों? क्या वे समुद्र के साथ नहीं रहना चाहतीं? या फिर वे लहरें उस महासागर के देखे गए अंतहीन सपने हैं, जो बार-बार साकार होने के लिए छटपटाते हैं? वे किनारों से टकराकर लगातार जो शोर मचाती हैं, वह अलगाव की पीड़ा है या मिलन की तड़प?

एक गहरा प्रश्न: क्या लहरों की इस चीख को समुद्र नहीं सुनता? और जब यह अनसुनी पराकाष्ठा पर पहुंचती है, तभी शायद समुद्र में तूफान उठते हैं और बवंडर का जन्म होता है। समुंदर भीतर से शांत है, पर उसकी सतह पर लहरों का एक शाश्वत शोर है।

इंसानी व्याकरण बनाम प्रकृति की मूक भाषा
मनुष्य ने अपनी बुद्धि के बल पर तरकीबें निकालीं। हमने अपने भीतर के शोर को शब्द दे दिए, उन शब्दों को व्याकरण के नियमों में बांधा और भाषा की रचना कर डाली। आज हम खुद को बहुत अभिव्यक्त पा रहे हैं। लेकिन याद कीजिए, जब हम इस प्रकृति की गोद में पहली बार जनमे थे, क्या तब हमारे पास ये शब्द थे? क्या हम एक-दूसरे की भाषा समझ पाते थे? नहीं। तब हम भी इसी मूक प्रकृति का हिस्सा थे
सागर का शांत होना और लहरों का बार-बार किनारे पर आकर शोर मचाना, दरअसल प्रकृति की एक अनसुनी पुकार है, जिसे न समझ पाने के कारण ही आज असंतुलन पैदा हो रहा है।








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