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Friday, June 5, 2026

जीवन सत्य ,अध्यात्म का खोखलापन और अनदेखा बवंडर

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मेरा विचार मेरा दर्शन – 05 जून 2026

भगवान को संसार का कण-कण जानता है, पूजता है और उनका अनुकरण करता है लेकिन वह किसे जानता है किसे पहचानता है?! फिर सनातन दर्शन कहता है कि ईश्वर ‘क्षीर सागर’ (महासागर) में वास करते हैं। लेकिन मनुष्य ने ईश्वर को भी अपने बनाए शोर की तरह मंदिरों और कर्मकांडों में सीमित कर दिया। वह यह भूल गया कि ईश्वर जिस महासागर में रहते हैं, उसकी लहरों की चीख को सुनना ही वास्तविक अध्यात्म था।

ईश्वर बहुत ही गहरी और दार्शनिक बात है। जब हम ईश्वर को ‘अपना’ घर या ‘पराया’ घर मान लेते हैं, तब हम अद्वैत और सर्वव्यापकता के भाव से दूर हो जाते हैं।

ईश्वर को किसी विशेष दायरे, धर्म या संप्रदाय में बाँधने के बजाय, उन्हें सर्वव्यापी और अपने भीतर अनुभव करना ही आध्यात्मिकता का मूल है। इस विषय पर विभिन्न संतों और विचारकों ने भी यही कहा है कि ईश्वर प्रेम और शुद्ध चेतना का नाम है, जो किसी एक का नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि का आधार है।

ईश्वर कहां है क्या एक योनि में_
यदि हम पूरी सृष्टि के संदर्भ में देखें, तो जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की तुलना में मानव का प्रतिशत आटे में नमक के बराबर भी नहीं है। शास्त्रों में ८४ लाख योनियों का वर्णन है, जिसमें मानव महज एक योनि है। बाकी की योनियां और यह पूरी प्रकृति हमारे चारों तरफ बिखरी है। हम उनके साथ रहते हैं, उन्हीं की हवा में सांस लेते हैं, उन्हीं का दिया खाते हैं; फिर हम प्रकृति के इन बाकी सह-यात्रियों की भाषा और उनके शोर को पहचानने की कोशिश क्यों नहीं करते?

प्रजनन और सृजन_
हमने मनुष्य के प्रजनन के विज्ञान को समझ लिया, पौधों के प्रजनन को जान लिया। लेकिन एक गहरा रहस्य देखिए—मनुष्य को सृजन के लिए बाह्य सहयोग और समाज की आवश्यकता होती है, लेकिन इन पेड़-पौधों और मूक जीवों को देखिए, वे बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी बाहरी आडंबर के प्रकृति के मौन नियम से अपना सृजन कर जाते हैं। यह सामर्थ्य उन्हें कहां से मिलता है??

प्रकृति ही परमेश्वर है_
धर्मों के बीच टकराव का मुख्य कारण ईश्वर पर एकाधिकार जमाने की कोशिश है।जब हम ईश्वर को केवल मंदिर, मस्जिद या चर्च तक सीमित कर देते हैं, तो हम अपने भीतर की चेतना खो देते हैं।
“मेरा मार्ग ही सही है” महा अंहकार का भाव है जो व्यक्ति में आध्यात्मिक अहंकार पैदा करता है।

महाप्रलय_
जब मनुष्य प्रकृति के उस संवाद को, उस अलगाव की पीड़ा को नहीं सुनता, तो वही अनसुनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर तूफान और बवंडर का रूप ले लेती है। सागर भीतर से शांत है, पर उसकी सतह का शोर मनुष्य को चेतावनी देता है कि आंतरिक विज्ञान को समझो, बाहरी दिखावे को नहीं।

मेरा विचार मेरा दर्शन ___ना कोई दार्शनिक, ना कोई कवि, ना कोई आध्यात्मिक प्रणेता…”दीपक पांडेय







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