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Friday, June 5, 2026

होशियारी की दुनिया में मासूमियत की ढाल: कैसे जीएँ आज की ज़िंदगी?

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लेख आलेख 04 जून 2026

सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालो कि हम हैं अनाड़ी…”
साल 1959 में शैलेंद्र के लिखे ये बोल आज 2026 में भी हमारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच बनकर खड़े हैं। इसके साथ ही जब हम चारों तरफ नज़र दौड़ाते हैं, तो शायर शौक़ बहराइची की ये पंक्तियाँ ज़हन में गूँजने लगती हैं— “बर्बाद-ए-गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था, हर शाख़ पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा।”

एक तरफ सीधापन और मासूमियत खोने का दर्द है, तो दूसरी तरफ हर मोड़ पर स्वार्थ और चालाकी का पहरा। ऐसे माहौल में एक बुनियादी सवाल उठता है: जब हर शाख़ पर चालाकी बैठी हो, तो एक सीधा और सच्चा इंसान अपनी अच्छाई के साथ ज़िंदा कैसे रहे?. ‘होशियारी’ बनाम ‘समझदारी’ का बारीक अंतर

गीत में जिस ‘होशियारी’ को न सीखने की बात कही गई है, वह दरअसल नकारात्मक चालाकी, कपट और दूसरों का इस्तेमाल करने की कला है। आज की दुनिया में जीने के लिए आपको इस तरह की ‘घटिया होशियारी’ सीखने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।

ज़रूरत है तो सिर्फ ‘समझदारी’ (Alertness) की। समझदारी का मतलब दूसरों को धोखा देना नहीं, बल्कि खुद को धोखेबाज़ों से बचाना है। आप दिल के साफ़ बने रह सकते हैं, बशर्ते आप आँखें खुली रखें।

जब हर डाल पर ‘उल्लू’ बैठा हो, तब क्या करें?

शायर का यह कहना बिल्कुल सही है कि जब तंत्र और समाज के हर हिस्से में स्वार्थी लोग बैठ जाएँ, तो व्यवस्था बिखरने लगती है। लेकिन इस कड़वी सच्चाई के बीच दो रास्ते बचते हैं: या तो हम भी उन्हीं की तरह बनकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाएँ, या फिर अपनी सीमाएं (Boundaries) तय करना सीखें।

  • अपेक्षाओं का बोझ उतारें: जब आप यह मान लेते हैं कि सामने वाला व्यक्ति स्वार्थी हो सकता है, तो उसका वैसा व्यवहार आपको मानसिक चोट नहीं पहुँचाता।
  • ‘ना’ कहना सीखें: शराफ़त का मतलब कमज़ोरी नहीं है। अगर कोई आपकी अच्छाई का फायदा उठाने की कोशिश करे, तो बिना किसी अपराध बोध (Guilt) के दृढ़ता से ‘ना’ कहिए।

पूरी दुनिया को सुधारना या बदलना किसी एक इंसान के बस में नहीं है। अगर हम पूरे गुलिस्ताँ (संसार) के अंजाम की चिंता में घुले रहेंगे, तो अपनी मानसिक शांति खो बैठेंगे। इसकी जगह, अपनी ऊर्जा को अपनी छोटी सी दुनिया पर केंद्रित करें। आपके परिवार, आपके गिने-चुने सच्चे दोस्त और आपकी अपनी ईमानदारी—यही आपका छोटा सा बाग़ है। इसे ‘होशियारी’ के ज़हर से बचाकर रखें।

अंजाम-ए-गुलिस्ताँ की चिंता छोड़ें, अपना कोना महकाएँ

निष्कर्ष: अनाड़ी बने रहने में ही समझदारी है

ज़िंदगी का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि चालाक लोग सब कुछ हासिल करके भी अंत में अकेलापन और अविश्वास पाते हैं। वहीं, जिसे दुनिया ‘अनाड़ी’ कहती है, वह भले ही कुछ भौतिक चीज़ों में पीछे रह जाए, लेकिन रात को सुकून की नींद सोता है।

इस दौर में सबसे बड़ी बहादुरी यह नहीं है कि आप कितने चालाक बन सकते हैं, बल्कि सबसे बड़ी बहादुरी यह है कि इस बेहद चालाक दुनिया में रहते हुए भी आप अपनी अंदर की अच्छाई और मासूमियत को मरने न दें।

स्वविचार स्वलेख कोइ विवाद के लिए नहीं है🙏

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