लेख/आलेख- 08/05/2026
जीवन में तीन चीज ही है दिल दुनिया और दौलत चौथा अगर है तो वह इन तीनों के पीछे ही रहेगा। यही जिंदगी के धरती,स्वर्ग और नरक है।
असल चाहत: कटी पतंग नहीं, खुला आसमान है।
दिल तो बस आजाद रहना चाहता है—हवाओं में उड़ना, नीले आकाश में तैरना और उमंगों की गलियों में अपनी खुशबू बिखेरना। लेकिन जब हम इसे दुनियादारी की बेड़ियों में जकड़ देते हैं और हमारी उम्मीदें टूटती हैं, तब यही दिल मायूस होकर कहने लगता है:
“ना कोई उमंग है, ना कोई तरंग है, मेरी जिंदगी क्या… एक कटी पतंग है।”
लेकिन क्या कभी किसी ने गौर किया है कि दिल क्या चाहता है कभी दिल की सुनो “दिल क्या चीज़ है जान लीजिए, बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए।”
अगर हम इस पूरी सृष्टि को गौर से देखें, तो धरती, स्वर्ग और नरक की सारी परिकल्पनाएं हमारे भीतर ही सिमटी हैं। मानव जीवन की शुरुआत ‘दिल’ से होती है, क्योंकि जब तक यह धड़कता है, तभी तक अस्तित्व है। दिल वह उपजाऊ ज़मीन है, जहाँ विचारों के बीज बोए जाते हैं; जैसा बीज आप इसमें डालेंगे, फसल वैसी ही लहलहाएगी।
जब चाहत ‘दौलत’ बन जाती है
जब तक हम दिल की सुनते हैं, हम जीवित और जीवंत हैं। लेकिन जैसे ही हम ‘दौलत’ और भौतिकता की बात करने लगते हैं, तो समझ लीजिए कि दिल पर किसी बाहरी ताकत का कब्जा हो गया है। दिल कभी नहीं बदलता, वह तो अपनी सहज लय में धड़कता रहता है, लेकिन उसमें ‘चाहत’ के बीज बाहरी दुनिया डाल देती है। “जैसी चाह, वैसी राह”—जब दौलत आती है, तो भोग की इच्छा जागती है, फिर महफिलें सजती हैं, पराए अपने बनते हैं और यहीं से ‘दुनियादारी’ का जन्म होता है।
दिल की अपनी कोई भाषा नहीं
दिल बचपन में भी वही था, जवानी में भी वही है और बुढ़ापे में भी वही रहेगा। वह तो बस धड़कना जानता है। हम अक्सर धोखा खा जाते हैं कि दिल क्या चाहता है। असल में, खुशी और गम दिल की उपज नहीं हैं, ये तो हमारे अपने दिए हुए नाम हैं। हम अपनी उम्मीदों और चिंताओं का बोझ इस मासूम दिल पर डाल देते हैं और इसे उन बातों से परेशान करते हैं जिनका इससे कोई सरोकार ही नहीं।
हम जैसा सोचते है
सच तो यह है कि दिल को कटी पतंग हमने बनाया है। अगर इसे इसकी सहजता में रहने दिया जाए, तो यह आज भी वही ‘स्वर्ग’ पैदा कर सकता है जिसका सपना हम बाहर ढूंढते हैं।


