रविवारीय – 03/05/2026
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ” यह अध्यात्म है अनुभूति है।अनुभूति से अनुभव है ईश्वर की वास्तविक अनुभूति वह गूढ़, आंतरिक अनुभव है जो मनुष्य की साधारण इंद्रियों और शब्दों से परे होती है। इसे शब्दों और सोच के माध्यम से व्यक्त करना कठिन इसलिए होता है क्योंकि यह अनुभूति ज्ञान या तर्क से नहीं, बल्कि एक गहरी भावना या आंतरिक चेतना से जुड़ी होती है। यह अनुभूति हमारे मन और हृदय की गहराइयों में होती है, जहां शब्द सीमित और अनुभव असीमित होता है।
अनुभूति के लिए आवश्यक है मन की शांति, एकाग्रता और अंदर की तरफ झांकने की क्षमता। जब मन सभी बाहरी विचारों, भावनाओं और मानसिक हलचल से मुक्त होता है, तभी वह उस गहन अनुभूति को महसूस कर पाता है जिसे हम ईश्वर की अनुभूति कहते हैं। यह ऐसी स्थिति होती है जहां न तो सोच की कोई बाधा रहती है और न ही शब्दों की जरूरत होती है।
इस प्रकार, ईश्वर की अनुभूति कोई बाहरी वस्तु या विचारधारा नहीं है बल्कि एक सहज, आंतरिक अनुभव है जो मन और भावनाओं की सीमा को पार करके होती है। इसे महसूस करना ‘मन की छठी इंद्रिय’ या ‘भावना की अनुभूति’ जैसा होता है, जो हृदय की गहराई में होती है और जिसका कोई सटीक वर्णन शब्दों में संभव नहीं होता।
साधारण उदाहरण दें तो जैसे प्रकाश को हम आंखों से देख पाते हैं लेकिन उसकी प्रकृति को पूरी तरह समझाना शब्दों में मुश्किल होता है, उसी तरह ईश्वर की अनुभूति भी मन और हृदय की गहन संवेदना है, जिसका अनुभव केवल अनुभव के द्वारा ही संभव है, न कि केवल शब्दों या सोच के माध्यम से।
इसलिए कहा जाता है कि ईश्वर को “देखना” नहीं बल्कि “अनुभव करना” होता है और यह अनुभव उच्चतम चेतना का परिणाम है जो साधना, ध्यान और आंतरिक समझ से प्राप्त होता है
ईश्वर का स्वरूप अनुभूति में है दिखावे में नहीं ज्ञान और तर्क में भी नहीं


