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Friday, June 5, 2026

महापर्व का ‘महा-क्लाइमेक्स’: बंगाल में स्याही, झालमुड़ी और परिणाम का इंतज़ार

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न्यूज आर्टिकल:01/05/2026
बंगाल की हवाओं में इस वक्त रबींद्र संगीत की मिठास कम और ‘एग्जिट पोल’ की कड़वाहट ज़्यादा घुली हुई है। 4 मई को बॉक्स खुलने वाला है और अगले तीन दिन तक पूरा तंत्र एक ऐसे ‘अदृश्य’ परिणाम के इंतज़ार में है, जो तय करेगा कि अगले पाँच साल तक जनता ‘राजा’ रहेगी या सिर्फ एक ‘आंकड़ा’।

विज्ञापनों का ‘सोनार बांग्ला’ बनाम हकीकत का गलियारा
पिछले कुछ हफ्तों में हमने विज्ञापनों में जो बंगाल देखा, वह किसी जन्नत से कम नहीं था। चमचमाती सड़कों और फ्लाईओवर की तस्वीरों के बीच वह आम बंगाली कहीं खो गया है, जो आज भी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते अपनी चप्पलें घिस चुका है। विडंबना देखिए, जिस उंगली पर नीली स्याही लगाने के लिए करोड़ों खर्च किए गए, वही उंगली जब रोजगार के लिए ‘कलम’ उठाना चाहती है, तो व्यवस्था उसे ‘आधार कार्ड’ का एक बेजान नंबर मानकर फाइलों में दबा देती है।

झालमुड़ी का तीखापन और चुनावी चकाचौंध
इन दिनों बंगाल के हर नुक्कड़ पर झालमुड़ी के दोने में कड़वे तेल की महक के साथ सत्ता का स्वाद भी घुला हुआ है। जिस तरह झालमुड़ी में मुड़मुड़े, चने और मसालों का घालमेल होता है, वैसे ही चुनावी वादों में हकीकत और सपनों का ऐसा मिश्रण परोसा गया है कि जनता का गला सूख रहा है।

नेताजी ने चकाचौंध भरी सड़कों का विज्ञापन तो परोसा, लेकिन झालमुड़ी बेचने वाले उस युवा की सुध नहीं ली जिसने एम.ए. (M.A.) की डिग्री होने के बावजूद स्टेशन की पटरी को अपना ‘ऑफिस’ बना लिया है।

सरकार को वह उंगली तो पसंद है जो ईवीएम (EVM) दबाती है, लेकिन झालमुड़ी के तीखेपन की तरह जब जनता सवाल पूछती है, तो उसे ‘फ्रीबीज’ की मीठी चटनी चटाकर शांत कर दिया जाता है।

“दीदी’ की दुआ और ‘दादा’ का दावा: उंगलियों का हिसाब
सरकारों को जनता केवल चुनाव के समय ही ‘इंसान’ नजर आती है। जैसे ही 4 मई का सूरज उगेगा और किसी एक दल के माथे पर विजय का तिलक लगेगा, ये चमचमाती सड़कों वाली तस्वीरें और सुरक्षा के दावे फिर से सरकारी फाइलों की धूल चाटने लगेंगे। विकास का पहिया हाईवे पर तो फर्राटा भर रहा है, लेकिन वह उस माँ की रसोई तक नहीं पहुँच पा रहा, जहाँ आज भी ‘काम’ की जगह ‘राशन’ का इंतजार है।

खबरनिष्कर्ष: परिणाम का धर्म
4 मई को जो भी जीते, असली जीत तब होगी जब उंगली पर लगी वह स्याही केवल वोट का निशान न रहकर, हक़ की कलम बन जाए। झालमुड़ी का तीखापन ज़बान पर तो रहे, पर व्यवस्था के प्रति यह सवाल भी कम न हो कि “हमें स्मार्ट सिटी चाहिए या स्मार्ट जीवन?”

डिस्क्लेमर :-यह मात्र वैचारिक लेख है जहां व्यवस्था की विसंगतियों पर एक व्यंग्यात्मक ध्यानाकर्षण है। उद्देश्य केवल आइना दिखाना है।”

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