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Friday, June 5, 2026

बुद्ध पूर्णिमा: मारने वाला से बचाने वाला बड़ा होता है राजसी वैभव से निर्वाण तक का मार्ग

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बुद्ध पूर्णिमा – 01/04/2026

आज बुद्ध पूर्णिमा है—वह पावन दिन जब सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ, उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ और इसी दिन उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि करुणा, त्याग और आत्म-साक्षात्कार के उस सफर का उत्सव है जिसने पूरी दुनिया को शांति का मार्ग दिखाया।

दया और न्याय का आरंभ: सिद्धार्थ और देवदत्त

सिद्धार्थ के भीतर करुणा के बीज बचपन में ही दिखने लगे थे। एक प्रसिद्ध प्रसंग है जब उनके चचेरे भाई देवदत्त ने एक पक्षी (हंस)को तीर मार दिया। घायल पक्षी सिद्धार्थ की गोद में गिरा। उन्होंने उसका उपचार किया और उसे जीवनदान दिया।

जब देवदत्त ने अपने शिकार पर अधिकार जताया, तो सिद्धार्थ उससे उलझ गए। मामला दरबार तक पहुँचा, जहाँ यह ऐतिहासिक निर्णय हुआ कि “मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है।” यहीं से स्पष्ट हो गया था कि सिद्धार्थ का हृदय प्राणीमात्र के दुख से द्रवित होने वाला है।

आसक्ति में दुख है विरक्ति में आनंद

वे चार दृश्य: जिन्होंने जीवन की दिशा बदल दी
एक राजकुमार के रूप में सिद्धार्थ का जीवन सुख-सुविधाओं से भरा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। महल की चहारदीवारी से बाहर निकलने पर उन्होंने चार ऐसे दृश्य देखे जिन्होंने उनके अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया:
एक वृद्ध व्यक्ति: शरीर की जर्जरता और लाचारी को देख उन्हें समय की क्रूरता का आभास हुआ।
एक बीमार व्यक्ति: शारीरिक कष्ट और पीड़ा ने उन्हें झकझोर दिया।
एक शवयात्रा:निर्जीव देह को देख सिद्धार्थ के मन में **’जीवन की नश्वरता’ का भाव जागा। उन्हें समझ आया कि मृत्यु अटल है और यह वैभव क्षणभंगुर है।
एक संन्यासी: अंत में एक शांत संन्यासी को देख उन्हें बोध हुआ कि असली शांति बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि विरक्ति और भीतर की खोज में है।

जीवन नश्वर है, यहाँ की खुशियाँ स्थायी नहीं हैं। असली आनंद तो संसार के मोह से ऊपर उठने में है।” — यही वह विचार था जिसने उनके मन में ‘वैराग्य’ पैदा किया।



महाभिनिष्क्रमण: सत्य की खोज

29 वर्ष की आयु में, जब दुनिया सो रही थी, सिद्धार्थ ने अपने परिवार (पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल), पिता, राज्य और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। इसे बौद्ध ग्रंथों में महाभिनिष्क्रमण’ कहा गया है।

वे किसी राज्य को जीतने नहीं, बल्कि जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाने के लिए निकले थे। वर्षों की कठोर तपस्या और साधना के बाद, बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें वह ‘प्रकाश’ मिला जिसने उन्हें **’बुद्ध’ (जागृत पुरुष)** बना दिया।



बुद्ध का संदेश आज के लिए

आज के भागदौड़ भरे जीवन में बुद्ध की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हैं। बुद्ध हमें सिखाते हैं कि:

अप्प दीपो भव:अपना दीपक स्वयं बनें।

मध्यम मार्ग: न अत्यधिक विलासिता, न अत्यधिक कठोरता।

अहिंसा:मन, वचन और कर्म से किसी को दुःख न पहुँचाना।

बुद्ध पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर, आइए हम भी अपने भीतर के करुणा के भाव को जगाएं और शांति की ओर एक कदम बढ़ाएं।

नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।


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