लेख/आलेख -25/04/2026(दीपक पाण्डेय)
आज जब हम विश्व पटल पर ईरान, इज़राइल और अमेरिका जैसे देशों को एक-दूसरे के आमने-सामने देखते हैं, तो यह केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि ‘सतह’ पर वर्चस्व की एक पुरानी जंग का हिस्सा लगता है। सागर की लहरों और सीमाओं के लिए आज जीवन की सीमाओं को खत्म किया जा रहा है। एक पत्रकार और एक तटस्थ विचारक के रूप में, जब हम इस परिदृश्य को देखते हैं, तो कुछ गहरे दार्शनिक प्रश्न सामने आते हैं।अभी तो युद्ध विराम है।
लहरों का भ्रम और गहराई का सत्य
संसार एक सागर की तरह है। जब तक हम इसकी सतह पर रहेंगे, हमें लहरों के आवेग को सहना ही होगा। ये लहरें—चाहे वे राजनीतिक हों या कूटनीतिक—अस्थाई होती हैं, लेकिन वे बहुत शोर मचाती हैं। सागर का खारापन दुनिया के अनुभवों का वह स्वाद है, जो भले ही पीने लायक न हो, पर उसे नकारा नहीं जा सकता। विडंबना यह है कि आज राष्ट्र इसी ‘खारेपन’ और सतही सीमाओं पर कब्जा करने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं।
साक्षी भाव: ब्रह्मांडीय तटस्थता
जैसे हम ब्रह्मांड के अनंत विस्तार और उसमें होने वाली खगोलीय घटनाओं को देखते हैं, जहाँ हमारा कोई अधिकार नहीं होता, वैसे ही आज के इन युद्धों को एक ‘साक्षी’ की नज़र से देखना अनिवार्य है। यह तटस्थता हमें यह समझने की शक्ति देती है कि सत्ता और सीमाओं की ये जंग कितनी क्षणभंगुर है। सागर की एक-एक बूंद पर अपना नाम लिखने की चाहत में मनुष्य उस महासागर (शांति) को ही ज़हरीला बना रहा है, जिसने पूरी सृष्टि को थाम रखा है।
मौन ही अंतिम सत्य है
सागर की गहराई में एक ऐसा बिंदु आता है जहाँ बाहरी हवाओं का असर खत्म हो जाता है। वहाँ न कोई सरहद है, न कोई देश और न ही कोई अहंकार। साधु-संतों ने इसे ‘मौन’ कहा है और यही मौन जीवन का आधार है। युद्ध की विभीषिका के बीच, अंततः सबको इसी मौन में विलीन होना है। लेकिन युद्ध का मौन ‘समाधि’ का नहीं, बल्कि ‘विनाश’ का होता है।
निष्कर्ष
हमें लहरों के खेल का आनंद लेना चाहिए और उनकी मर्यादा को समझना चाहिए, लेकिन हमारी नज़र हमेशा उस गहराई पर होनी चाहिए जहाँ ‘परम शांति’ निवास करती है। मैं केवल एक दृष्टा हूँ, जो लहरों के इस संघर्ष को देख रहा हूँ, पर मेरी चेतना उस अथाह गहराई के मौन में सुरक्षित है जहाँ कोई भौतिक सीमा नहीं पहुँच सकती।


