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Saturday, March 14, 2026

कल आज और कल:आधुनिक भारत के निर्माता – राजा राममोहन राय

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भोर का तारा – जब एक दीपक ने अंधेरे को चुनौती दी

लेख_आलेख_13/03/2026

भूमिका तब
कल्पना कीजिए एक ऐसे भारत की, जहाँ धर्म के नाम पर कुरीतियाँ जड़ें जमा चुकी थीं, जहाँ सवाल पूछना पाप था और जहाँ शिक्षा केवल कुछ ही लोगों की जागीर थी। ऐसे दमघोंटू माहौल में बंगाल की धरती पर एक बालक का जन्म हुआ, जिसे आगे चलकर इतिहास ने ‘आधुनिक भारत का जनक’ कहा। उनका नाम था— राममोहन राय।

जरूरत अब

हमारा समाज तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक हम अपने गौरवशाली अतीत के तर्कों को आधुनिक संकल्पों के साथ नहीं जोड़ते।”(एक संक्षिप्त जानकारी पर आधारित 4भागों में_दीपक पाण्डेय प्रदेश प्रचार सचिव छग सर्व ब्राह्मण समाज)

“मजहबी जंगी नारों और सरहदों के बारूदी धुएं के बीच, जब विश्व मानवता की राह भूलने लगेराजनीति जब शुष्क साहित्य की ओट में स्वार्थ सिद्ध करे और समाज वैचारिक द्वंद्व में उलझने लगेतब आज के ‘धर्म-युद्ध’ को ‘कर्म-युद्ध’ में बदलने के लिए एक ही नाम मशाल बनकर उभरता है,वैश्विक शांति और आधुनिक चेतना के वही पुरोधा— राजा राममोहन राय, अब वक्त की पुकार हैं!”

विचार जागरण का कारण:_
अंतरराष्ट्रीय युद्ध और धार्मिक कट्टरता मानवता के विरुद्ध संकेत है।राजनीति में हो रहे वैचारिक बदलाव और समाज भटकाव की दिशा में है।विचार समाधान की दिशा दिखाती है कि आज जिसे लोग ‘धर्म युद्ध’ समझ रहे हैं, वहां असल में ‘तार्किक कर्म’ की जरूरत है।
अब:राजा राममोहन राय के विचारों को वर्तमान संकट का एकमात्र समाधान घोषित करती है।

तर्क की पहली चिंगारी
22 मई, 1772 को राधानगर (बंगाल) के एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में जन्मे राममोहन बचपन से ही साधारण नहीं थे। जहां उनके परिवार में मूर्तिपूजा और कर्म कांडों का कड़ा पालन होता था, वहीं बालक राममोहन के मन में एक ही सवाल उठता था— “ईश्वर एक है, तो हम उसे इतने टुकड़ों और रीति-रिवाजों में क्यों बांटते हैं?”

महज 15-16 साल की उम्र में उन्होंने मूर्तिपूजा के विरोध में एक लेख लिख डाला। परिणाम? अपने ही पिता से गहरा वैचारिक मतभेद। जिस घर में सुख-सुविधाओं की कमी नहीं थी, सत्य की खोज में राममोहन ने उस घर की दहलीज को पार कर लिया।

सत्य की खोज में ”बंजारा
राममोहन राय केवल विद्रोही नहीं, बल्कि एक गहरे जिज्ञासु थे। उन्होंने हिमालय की कंदराओं से लेकर तिब्बत के बौद्ध मठों तक की यात्रा की। उन्होंने अरबी और फारसी सीखी ताकि वे इस्लाम के ‘एकेश्वरवाद’ को समझ सकें; उन्होंने संस्कृत पढ़ी ताकि वे वेदों और उपनिषदों के असली मर्म को जान सकें; और उन्होंने अंग्रेजी सीखी ताकि वे पश्चिमी विज्ञान और लोकतंत्र को समझ सकें।

वे पहले ऐसे भारतीय थे जिन्होंने यह समझा कि धर्म अंधभक्ति नहीं, बल्कि तर्क पर आधारित होना चाहिए।
आज के समय में प्रासंगिकता
आज के दौर में, जब सोशल मीडिया और समाज अक्सर बिना सोचे-समझे किसी भी बात पर यकीन कर लेते हैं या भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं, राजा राममोहन राय का जीवन हमें ‘तार्किक सोच की याद दिलाता है।
उनका संदेश साफ था: यदि कोई परंपरा या विचार मानवता के खिलाफ है, तो वह धर्म नहीं हो सकता, चाहे वह कितना भी पुराना क्यों न हो।

आज के संदर्भ में समाधान
आज जब राजनीति और युद्ध समाज को बांट रहे हैं, तब राममोहन राय के दो सूत्र सबसे बड़े ‘समाधान’ बन सकते हैं:
सहनशीलता (0): अलग-अलग विचारों के बावजूद साथ रहना।
मानवतावाद: धर्म और राजनीति से ऊपर इंसानियत को रखना।

‘आज’ और ‘कल’ का संगम
मैं यह कहना चाहता हूं कि “समाज के बिना जीवन व्यर्थ है”, वास्तव में इन तीनों महान सोच का सार भी यही है:
राममोहन राय: समाज को आधुनिक और तार्किक बनाया।
दीनदयाल जी: समाज को एकात्म और स्वावलंबी बनाने का मार्ग दिया।
मोदी जी: उस चेतना को राष्ट्रवाद और सुशासन से जोड़कर विश्व पटल पर रख रहे हैं।

अस्वीकरण:“इतिहास और वर्तमान के संगम पर आधारित एक स्वतंत्र वैचारिक लेख।”कोई वाद_विवाद का विषय नहीं।



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