ED की ताकत पर सवाल: क्या केंद्रीय एजेंसी के अधिकार निर्वाचित मुख्यमंत्री तक भी समान रूप से लागू होते हैं?
कोलकाता_10/01/2026:_ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक कार्रवाई ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा सियासी और कानूनी टकराव खड़ा कर दिया है। ED की रेड के कुछ ही देर बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का काफिला I-PAC के कोलकाता स्थित कार्यालय पहुंचा, जहां से फाइलें और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस ले जाए जाने को लेकर विवाद सामने आया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ राज्य की राजनीति को गरमा दिया, बल्कि केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका और अधिकारों पर राष्ट्रीय बहस भी छेड़ दी है।
ED का आरोप है कि जांच के दौरान उसकी कार्रवाई में दखल दिया गया और संभावित सबूतों से छेड़छाड़ हुई। वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया और ED पर चुनावी रणनीति तथा इलेक्शन से जुड़े डेटा जब्त करने का आरोप लगाया। दोनों पक्षों के आरोप–प्रत्यारोप के बाद मामला कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचा, जहां हंगामे के चलते सुनवाई टाल दी गई। इस मामले में अगली सुनवाई 14 जनवरी को होनी है।
प्रवर्तन निदेशालय का गठन 1 मई 1956 को किया गया था। शुरुआती दौर में इसका दायरा विदेशी मुद्रा विनियमन कानूनों तक सीमित था, लेकिन समय के साथ इसकी भूमिका लगातार मजबूत होती चली गई। साल 2002 में लागू हुए धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) ने ED को गिरफ्तारी, संपत्ति जब्ती और पूछताछ के दौरान दिए गए बयान को अदालत में सबूत के रूप में पेश करने जैसे व्यापक अधिकार प्रदान किए।
हालांकि कानून ED को सशक्त बनाता है, लेकिन उसकी हर कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है।
इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब अदालत का रुख यह तय करेगा कि जांच एजेंसी की सीमाएं कहां तक हैं और संवैधानिक पद पर बैठे जनप्रतिनिधियों के अधिकारों की रेखा कहां खिंचती है।


