34.4 C
Raipur
Saturday, March 7, 2026

भगवान का प्रश्न: जावेद अख्तर और मुफ्ती शमाइल नदवी के विचार

Must read

आस्था, तर्क और इंसानी ज़िम्मेदारी: एक सार्वजनिक बहस का अर्थ

नई दिल्ली:_22/12/2025

हाल ही में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में “क्या भगवान मौजूद हैं?” जैसे संवेदनशील और दार्शनिक प्रश्न पर आयोजित सार्वजनिक बहस ने देश में बौद्धिक विमर्श को नई दिशा दी। इस संवाद में कवि-गीतकार जावेद अख्तर और इस्लामिक विद्वान मुफ्ती शमाइल नदवी ने अपने-अपने विचार रखे। यह बहस किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय विचारों के आदान-प्रदान का मंच बनी।

जावेद अख्तर ने ईश्वर की सर्वशक्तिमान और करुणामयी अवधारणा को मानवीय पीड़ा के संदर्भ में परखते हुए नैतिक सवाल उठाए। उन्होंने वैश्विक संघर्षों और हिंसा का उल्लेख कर यह प्रश्न रखा कि आस्था और यथार्थ के बीच संतुलन कैसे समझा जाए। उनकी बातों में व्यंग्य था, असहमति थी, लेकिन मूल स्वर मानवीय संवेदना का था।

वहीं, मुफ्ती शमाइल नदवी ने ईश्वर के अस्तित्व का पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि हिंसा और बुराई की जड़ें इंसानी निर्णयों में हैं। उनके अनुसार स्वतंत्र इच्छा के दुरुपयोग से उत्पन्न कृत्यों की जिम्मेदारी ईश्वर पर नहीं, बल्कि समाज और व्यक्ति पर आती है। उन्होंने यह भी कहा कि ईश्वर जैसे विषय पर विज्ञान या धर्मग्रंथ अकेले अंतिम कसौटी नहीं हो सकते।

लोकतांत्रिक समाज में ऐसी बहसों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि ये असहमति को स्थान देती हैं। आस्था और तर्क को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय उनके बीच संवाद ही समाज को आगे बढ़ाता है। सवाल पूछना, तर्क रखना और सुनना—यही स्वस्थ विचारशीलता की पहचान है।
यह बहस हमें याद दिलाती है कि इंसानी जिम्मेदारी, नैतिकता और संवाद ही किसी भी सभ्य समाज की असली बुनियाद हैं।

- Advertisement -spot_img

More articles

- Advertisement -spot_img

Latest article