रायपुर /बस्तर/ छत्तीसगढ़_ 05/11/2025
वीर शहीद गुण्डाधुर छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के एक महान आदिवासी क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1910 में अंग्रेज शासन के विरुद्ध भूमकाल आंदोलन की शुरुआत की। वह नेतानार गाँव के धुरवा आदिवासी समुदाय से थे और अपने नेतृत्व, बहादुरी और संगठन क्षमता के लिए प्रसिद्ध थे।
गुण्डाधुर ने बस्तर के आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की रक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा। उन्होंने आम की टहनियों में लाल मिर्च बांधकर विद्रोह का संदेश गांव-गांव तक पहुंचाया था। उनका विद्रोह इतना प्रबल था कि अंग्रेजों को कुछ समय के लिए जंगलों की गुफाओं में छिपना पड़ा। उनके नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों और अत्याचारों का सामना किया और इसका खामियाजा अंग्रेजों को भारी नुकसान के रूप में भुगतना पड़ा।
अंग्रेजों द्वारा बस्तर के कई गांव जलाए गए, और सैकड़ों आदिवासी शहीद हो गए, मगर गुण्डाधुर अंत तक लड़ते रहे। 35 साल की उम्र में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी और बस्तर की अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष किया। आज भी छत्तीसगढ़ के आदिवासी उन्हें महान नायक और शहीद के रूप में याद करते हैं, और उनके नाम पर आदिवासी क्षेत्रों में तीरंदाजी के उत्कृष्ट पुरस्कार भी दिए जाते हैं। गुण्डाधुर की गाथाएं और भूमकाल विद्रोह की कहानियां आज भी लोकगीतों और जनश्रुतियों में जीवित हैं।
संक्षेप में, गुण्डाधुर का नाम उस वीरता, संघर्ष और आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ी गई लड़ाई के प्रतीक के रूप में अमर है, जिसने अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ बस्तर को एक पहचान दिलाई। उनकी कहानियां आज भी आदिवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं और उनका बलिदान इतिहास में सदैव याद रखा जाएगा।


