लेख/जन चौपाल 36
भारत में जीवन के हर क्षेत्र में आधुनिकता की बयार बह रही है—भोजन, शयन, या सामाजिक जीवन, सभी जगह पश्चिमी तौर-तरीकों का असर दिखाई देता है। रंग-बिरंगे एयर-कंडीशंड रेस्टोरेंट, भीड़-भाड़ और भाग-दौड़ भरे माहौल में ज़मीन पर शांत चित्त बैठकर भोजन करने की भारतीय परंपरा कहीं खोती सी नज़र आती है। हमारे पूर्वजों ने भोजन, विश्राम और संबंधों को दिखावे के बजाय स्वास्थ्य और आत्मिक शांति से जोड़कर देखा, जबकि आज का युवा वर्ग इंस्टाग्राम-योग्य डाइनिंग टेबल पर त्वरित और दिखावटी खाने-पीने में व्यस्त है।
इसी आधुनिकता के बीच एक बदलाव जो चुपचाप घरों, होटल्स और रेस्टोरेंट्स की डाइनिंग टेबल पर अपना स्थान बना चुका है—वह है नमक की शीशी। दरअसल, पश्चिमी संस्कृति में सब्जियों को उबालकर बिना नमक के परोसा जाता है, इसलिए खाने के बाद अतिरिक्त नमक डालने की आदत वहां आम है। भारतीय व्यंजनों में तो पकाते समय ही मसालों के साथ नमक डाला जाता है, फिर भी आधुनिकता की नकल में यहां भी हर खाने की टेबल पर नमक और काली मिर्च की शीशी रखी जाने लगी है, जिससे लोग कई बार बिना ज़रूरत के भी खाने में अतिरिक्त नमक मिला लेते हैं।
सेहत की दृष्टि से देखा जाए तो अनावश्यक रूप से नमक की मात्रा बढ़ा लेना तमाम स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है, जैसे उच्च रक्तचाप और हृदय रोग। भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि भोजन ‘आसनयुक्त’ होकर, ध्यान व संतुलन से करना चाहिए—न कि दिखावे या पश्चिमी शैली के अंधानुकरण में। समय की मांग है कि हम परंपरा और सेहत दोनों का संतुलन साधें और गैर-ज़रूरी आदतों पर पुनर्विचार करें, ताकि स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली को अपनाया जा सके।
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