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Saturday, March 7, 2026

4_भाग/मौन के उस पार(वापसी अतीत की ओर)

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यह दृश्य जैसलमेर के एक प्राचीन किले के प्रांगण में घटता है, जहाँ पत्थरों की खामोशी में सदियों की कहानियाँ बंद हैं — और उन्हीं के बीच दो रूहें पहली बार एक-दूसरे की आत्मा से बातें करती हैं।

किले की ऊँचाइयों से नीचे फैले रेत के समंदर को देखती विनीता चुप थी।
वो बोलती कम थी, लेकिन उसकी निगाहें पूछती बहुत कुछ थीं।
अनिमेष, जो अब तक केवल ऐतिहासिक तथ्यों और स्थापत्य की बारीकियाँ बताता आया था, आज पहली बार मनुष्य के भीतर के स्थापत्य को पढ़ने की कोशिश कर रहा था।
“आप यहाँ अकेली आई हैं?”
उसने सावधानी से पूछा।और नजर भर विनीता को देखने लगा,
आज विनीता कुछ अलग ही लग रही थी…
जवां, खिला-खिला बदन, गोरे मुखड़े पर ताजगी की बौछार थी।
मानो सुबह की ओस से भीगी कोई कश्मीरी कली…
सफेद शर्ट में उसका निखरा चेहरा और भी उजला लग रहा था — जैसे धूप में चमकती बर्फ।
नीली जींस और पांवों में सफेद सैंडिल ने उसके पूरे व्यक्तित्व को एक सहज, आधुनिक आभा दे दी थी।
शर्ट की आस्तीनें कोहनी तक मोड़ी हुई थीं — एक सलीकेदार अंदाज़,और कलाई पर बंधी एक क्लासिक रिस्टवॉच जैसे वक्त भी थम कर उसे निहार रहा हो।
एक बार बस जी भर के देख लो…
तो दिल बाग़-बाग़ हो जाए, और मन कहे —
“यही है वो लम्हा, जिसे आंखों में कैद कर लिया जाए।”
विनीता ने गर्दन झुका कर एक पल की चुप्पी के बाद कहा —
“हाँ। कुछ खोया है… उसे ढूँढ़ने आई हूँ।”
उसके स्वर में कश्मीर की ठंडी हवाओं की सी उदासी थी,उसने अनिमेष से नजर मिलाती बोली।

“इतिहास से कुछ खोजती हैं?”
अनिमेष ने सहजता से पूछा।

“शायद…” — विनीता ने किले की दीवारों को हाथ से छूते हुए कहा,
“यहाँ की दीवारें बोलती हैं… बहुत कुछ।
ये सिर्फ किले नहीं हैं, ये इंसानों के भीतर के किले हैं।
कुछ टूट चुके हैं, कुछ अब भी खड़े हैं — वीरान मगर ज़िंदा।”

अनिमेष मौन हो गया।
विनीता की आँखों में उसे किसी पहाड़ी झील की सी गहराई दिखी —
शांत, लेकिन उसमें डूब जाने का मन करे।
इसी का फायदा उठाते हुए विनीता ने बड़े प्रेम और आदर की नजरों से अनिमेष को देखा।
जवानी, आकर्षण, सलीका और गहराई को उभारता है — विनीता की नजरों से, एक हल्के रोमांटिक भावना से:
अनिमेष…
नाम जितना शांत, व्यक्तित्व उतना ही गहरा।
वह कोई शोर मचाने वाला लड़का नहीं था —
वो तो उन शांत झीलों की तरह था, जो अपने भीतर गहराइयों का रहस्य समेटे रहती हैं।
गौर वर्ण तेजस्वी चेहरा —

“क्या आप मानते हैं कि इंसानों की आत्माएँ भी कहीं किसी कालखंड में अटक जाती हैं?”
विनीता ने पूछा।

अनिमेष ने धीरे से उत्तर दिया —
“हाँ। और शायद कभी-कभी दो आत्माएँ किसी पुराने युद्धक्षेत्र में टकराती हैं,
सिर्फ इसलिए नहीं कि वे एक-दूसरे को जानती हैं,
बल्कि इसलिए कि वे एक-दूसरे की अधूरी कहानी को पूरा करना चाहती हैं।”

उस पल दोनों के बीच एक गहरा मौन छा गया।
रेत उड़ रही थी, हवाएँ चल रही थीं, लेकिन उनके भीतर जैसे वक़्त ठहर गया था।
दो अलग-अलग दिशाओं से आए मुसाफ़िर — जिनकी आत्माएँ अनजाने में एक पुराने अध्याय की ओर लौट रही थीं।

शाम ढल रही थी।सूरज अस्ताचल की ओर बढ़ गया था
अब किले की छाया लंबी होती जा रही थी।
और उसी छाया में दो परछाइयाँ पहली बार साथ चली थीं —किले के सबसे ऊपरीला मंजिल से।

आज दोनों सोनार गढ़ को अकेले ही देखने निकले थे साथ में कोई पर्यटक नहीं लिया था अनिमेष।
अनिमेष मन ही मन से कहा_पर यहां तो पूरा इतिहास ही है जिसकी खोज में विनीता है।
दोनों में काफी समानताएं भी दिख रही ,एक रेत में रहता है दूसरा रेत में कुछ देखने आई है ।

अब यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रेत यहां बंजर है पर पूरा आशियाना महल इसी रेत के दम से खड़ा किया जाता है।

विनिता और अनिमेष दोनों वर्तमान में थे एक विचार एक व्यवहार।
अब सोनार गढ़ का इतिहास तो खुद को थाम कर धरोहर बचा लिया था किंतु यह दोनों कैसे बचा पाएंगे दो जवां जिस्म और दो धड़कते दिल ,क्या?
वैसे ही जैसे इतिहास और वर्तमान ने एक-दूसरे को थाम लिया हो लेकिन जब दो दिल मिलते हैं तो इतिहास बना ही लेते है ।रेगिस्तान हो या कश्मीर भावनाएं तो बूंद बन बरसेंगी ही क्या वन ,क्या उपवन जब साथ हो दो जीवन तो रेगिस्तान में बहारों के सपने खिलेंगे ही.!!.


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