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Friday, October 30, 2026
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रंग तरंग: छत्तीसगढ़ की लोक विरासत और आधुनिक सुरों का संगम —

रायपुर – 31 अगस्त 2026

“रंग तरंग” छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। इसकी वास्तविक सफलता कार्यक्रम की प्रस्तुति की गुणवत्ता, दर्शकों की भागीदारी और परंपरा-आधुनिकता के संतुलन पर निर्भर करेगी — जिसका आकलन आयोजन के बाद ही संभव होगा।

रायपुर के मुक्ताकाशी मंच पर 1 से 3 सितंबर 2026 तक आयोजित होने वाला “रंग तरंग” कार्यक्रम संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन की एक उल्लेखनीय पहल है, जो राज्य की समृद्ध लोक-संस्कृति को समकालीन संगीत के साथ जोड़ने का प्रयास करती है।

आयोजन की खासियत

तीन दिवसीय इस आयोजन का केंद्रबिंदु छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र और उनसे जुड़े कलाकार हैं। हर शाम 7 बजे से शुरू होने वाला यह कार्यक्रम महंत घासीदास संग्रहालय परिसर, सिविल लाइंस में होगा — एक ऐसा स्थान जो पहले से ही सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है।

सकारात्मक पहलू
स्थानीय कलाकारों को मंच मिलना: ऐसे आयोजन ग्रासरूट स्तर के कलाकारों के लिए बड़ा अवसर बनते हैं
युवा पीढ़ी से जुड़ाव: परंपरा और आधुनिकता के फ्यूजन से युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका
सांस्कृतिक संरक्षण: लुप्त होती लोक धुनों और वाद्ययंत्रों को नया जीवन

समीक्षात्मक दृष्टिकोण से विचारणीय बिंदु

प्रेस विज्ञप्ति में कार्यक्रम का उद्देश्य और भावना स्पष्ट है, लेकिन कुछ व्यावहारिक जानकारियों की कमी खलती है — जैसे किन विशिष्ट कलाकारों या दलों की प्रस्तुति होगी, प्रवेश निःशुल्क है या नहीं, और दर्शक क्षमता कितनी है। इस तरह के विवरण दर्शकों की उपस्थिति और आयोजन की पहुंच को प्रभावित कर सकते हैं।

साथ ही, “फ्यूजन” की अवधारणा — पारंपरिक वाद्यों को आधुनिक संगीत के साथ मिलाना — संतुलन की मांग करती है। यदि आधुनिकता पर अधिक जोर दिया गया तो मूल लोक परंपरा कहीं पीछे छूट सकती है, जबकि उद्देश्य ठीक इसके विपरीत — परंपरा को नई पहचान देना — बताया गया है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत – राष्ट्रीय पटल पर छत्तीसगढ़ की नारी शक्ति का परचम

रायपुर – 30 अगस्त 2026

राष्ट्रीय अध्यक्ष महिला मोर्चा रूपकुमारी चौधरी के कंधों पर अब केवल एक राज्य का नहीं, बल्कि पूरे देश की महिला कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा से जोड़े रखने का दायित्व है।

रायपुर में गूंजे ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ के नारे केवल एक स्वागत समारोह का हिस्सा नहीं थे, बल्कि यह उस संकल्प की गूंज थे जिसके तहत छत्तीसगढ़ की नारी शक्ति अब देश भर में संगठन का मार्गदर्शन करने जा रही है।

भाजपा केंद्रीय नेतृत्व द्वारा सांसद श्रीमती रूपकुमारी चौधरी को राष्ट्रीय महिला मोर्चा का अध्यक्ष नियुक्त किया जाना केवल एक संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में छत्तीसगढ़ की बढ़ती धमक का स्पष्ट संकेत है।

रायपुर में आयोजित गरिमामय अभिनंदन समारोह में छत्तीसगढ़ भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती विभा अवस्थी और बिलासपुर शहर भाजपा महिला मोर्चा की सह-प्रभारी एवं प्रदेश कार्यकारिणी की वरिष्ठ सदस्य श्रीमती ज्योति पांडेय सहित प्रदेश पदाधिकारियों ने पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका आत्मीय स्वागत किया। इस अवसर पर कार्यकर्ताओं में दिखा उत्साह और भारत माता की जय व वंदे मातरम के उद्घोष ने कार्यक्रम को संगठनात्मक एकजुटता का प्रतीक बना दिया।

दो दिन पूर्व रायपुर की धरती पर उनका हुआ भव्य और ऐतिहासिक नागरिक अभिनंदन इसी राजनीतिक और सामाजिक संदेश की एक जीवंत तस्दीक है।

यह घटनाक्रम तीन प्रमुख दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी है।

राजनीतिक संतुलन और प्रतिनिधित्व-
केंद्रीय राजनीति में छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की महिला नेत्री को देश भर के महिला संगठन की कमान सौंपना, पार्टी की दूरगामी रणनीति को दर्शाता है। इससे न केवल राज्य के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है, बल्कि यह केंद्रीय नेतृत्व का छत्तीसगढ़ के प्रति प्रगाढ़ विश्वास भी रेखांकित करता है।

संगठनात्मक ऊर्जा का नया संचार-
श्रीमती रूपकुमारी चौधरी का जमीनी स्तर से उठकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद तक पहुँचना यह संदेश देता है कि निष्ठा और कार्यकुशलता का सम्मान हमेशा होता है। उनके नेतृत्व से आगामी चुनावों और सांगठनिक अभियानों में महिला मोर्चा की सक्रियता दोगुनी होना तय है।

जनकल्याणकारी योजनाओं का अंतिम छोर तक विस्तार-
केंद्र सरकार की आधी आबादी से जुड़ी योजनाओं—जैसे उज्जवला, महतारी वंदन, लखपति दीदी और स्व-सहायता समूहों का सशक्तिकरण—को धरातल पर उतारने में यह नया नेतृत्व एक मजबूत सेतु का काम करेगा।




मन की बात’ का स्पष्ट संदेश: नशा मुक्त युवा और आत्मनिर्भर भारत ही देश की दिशा तय करेंगे

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मन की बात- 30 अगस्त 2026

मन की बात में प्रधानमंत्री का संबोधन स्पष्ट संकेत देता है कि भारत की विकास यात्रा केवल सरकारी योजनाओं से तय नहीं होगी,इसमें जनभागीदारी, स्वदेशी अपनाने का संकल्प और युवाओं को सही दिशा में ले जाने की सामाजिक जिम्मेदारी सबसे अहम स्तंभ हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ केवल एक संबोधन मात्र नहीं, बल्कि देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक बदलावों की एक महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करता है।

हालिया संबोधन में प्रधानमंत्री ने इतिहास की डिजिटल पहुँच से लेकर स्वास्थ्य, पर्यावरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था तक—देश की प्रगति के विभिन्न आयामों को रेखांकित किया।इतिहास की नई डिजिटल दृष्टि और नशामुक्त युवा भारतइतिहास को रुचिपूर्ण बनाने के प्रयासों की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री ने ‘bharatrajya.com’ जैसी पहलों का जिक्र किया, जो देशवासियों को यह समझने में मदद करती हैं कि अतीत में भारत के किस भू-भाग पर किसका शासन था।

सामाजिक सरोकार के तहत उन्होंने ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत‘ अभियान पर विशेष बल दिया। युवा पीढ़ी को नशे से दूर रखना एक विकसित राष्ट्र की पहली शर्त है। यह अभियान तभी सफल हो सकता है जब संपूर्ण समाज एकजुट होकर इस दिशा में अपनी भूमिका निभाए।

महिला सशक्तिकरण और आस्था के साथ स्वच्छता’PM स्वनिधि योजना’ के आंकड़ों से सामाजिक समावेश की स्पष्ट झलक मिलती है, जहाँ लगभग 46 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएँ हैं। यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर आर्थिक आत्मनिर्भरता में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है।

आस्था और पर्यावरण के संतुलन को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने अमरनाथ यात्रा का उल्लेख किया। जहाँ कठिन परिस्थितियों के बावजूद हजारों स्वच्छता कर्मियों ने 400 मीट्रिक टन से अधिक कचरे को इकट्ठा कर प्रोसेस किया। यह पहल साबित करती है कि स्वच्छता भी सेवा और आस्था का ही एक रूप है।

प्रकृति, नवाचार और महानायक को नमनपर्यावरण संरक्षण के साथ आजीविका के नए रास्ते तलाशने में मैथिली और देबरीगढ़ की बहनों का प्रयास एक अनुकरणीय उदाहरण बना है। वहीं कर्नाटक के चिक्कमगलुरु के किसानों ने कॉफी प्लांटेशन के बीच एवोकाडो उगाने का नवाचार कर अपनी आय बढ़ाने का नया मार्ग खोजा है।

संबोधन में कला और संस्कृति के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए महान अभिनेता उत्तम कुमार को श्रद्धांजलि दी गई। उनके सहज अभिनय और परोपकारी स्वभाव को याद करते हुए उनके योगदान को नमन किया गया।त्योहारों का मौसम और ‘वोकल फॉर लोकल’ का विजनआगामी पर्वों—जन्माष्टमी, विश्वकर्मा पूजा और दीपावली—की शुभकामनाएँ देते हुए प्रधानमंत्री ने समाज का निर्माण करने वाले कारीगरों और शिल्पकारों के सम्मान का आह्वान किया।

पीएम मोदी ने ‘वोकल फॉर Local’ के विचार को व्यापक रूप में अपनाने का पुनः आग्रह किया।उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ केवल मिट्टी के दीये खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा बेहद विस्तृत है। भारत के आत्मनिर्भर बनने की राह तभी प्रशस्त होगी जब देशवासी अपने दैनिक उपयोग के सामान में भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देंगे और स्वदेशी पर गर्व करेंगे।

नए भोर के साक्षी: अबूझमाड़ में लौटता विश्वास और घोटुल की थाप

बस्तर न्यूज – 30 अगस्त 2026

कुछ समय पहले तक नक्सल भय के कारण जहाँ शाम होते ही सन्नाटा पसर जाता था और लोग घरों में दुबकने को मजबूर थे, वहाँ अब मांदर की गूंज और कर्मा-रेलो के सुरीले बोल हवाओं में तैर रहे हैं। घोटुलों में लौटती यह रौनक महज़ सांस्कृतिक गतिविधियों का पुनरुत्थान नहीं है; यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि शांति और सुरक्षा के बल पर कैसे एक समाज अपना खोया हुआ आत्मविश्वास पुन: हासिल कर सकता है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का अबूझमाड़—

जो कभी अपने सघन जंगलों और नक्सली हिंसा के साए के कारण मुख्यधारा से अलग-थलग महसूस करता था—आज एक नए भोर का साक्षी बन रहा है। क्षेत्र के अंदरूनी गांवों में सुरक्षा और विश्वास का माहौल बेहतर होने से आदिवासी संस्कृति की रीढ़ मानी जाने वाली सदियों पुरानी ‘घोटुल’ परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी है।

स्थानीय ग्रामीण स्वयं आगे आकर प्राकृतिक सामग्रियों से पारंपरिक घोटुल का पुनर्निर्माण कर रहे हैं। यह घोटुल केवल एक मिट्टी-पुआल का ढांचा भर नहीं है, बल्कि जनजातीय जीवन का सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक केंद्र है। शाम ढलते ही यहाँ ‘चेलिक’ (युवक) और ‘मोटियारिन’ (युवतियाँ) एकत्र होते हैं। बुजुर्गों की छत्रछाया में युवा पीढ़ी अपने लोकगीतों, पारंपरिक नृत्यों, जीवन के संस्कारों, नैतिक मूल्यों और सामाजिक अनुशासन का पाठ सीख रही है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बस्तर में सुरक्षा और विकास का एक नया संतुलन देखने को मिल रहा है। सरकार न केवल हिंसा पर अंकुश लगाने में सफल हो रही है, बल्कि समृद्ध आदिवासी धरोहर के संरक्षण और संवर्धन को भी प्राथमिक एजेंडे में शामिल किया है। बुनियादी ढाँचे के सुदृढ़ीकरण के साथ-साथ पारंपरिक संस्थानों का पुनर्जीवन बस्तर के दूरस्थ अंचलों में सुशासन का असली अर्थ रेखांकित करता है। अबूझमाड़ के घोटुलों से उठती मांदर की थाप यह संदेश दे रही है कि भय का अंधकार छँट रहा है और आशा का सवेरा बस्तर के भविष्य को रोशन कर रहा है।

समय की धारा और उपस्थिति का सत्य: ‘वर्तमान’ की एक दार्शनिक खोज- वीर नारायण सिंह

बेमेतरा- 30 अगस्त 2026

कल बेमेतरा कॉलेज के सामने एक कार वर्क शॉप पर कुछ युवा साथी और मैं बैठे थे। सामने शहीद वीर नारायण सिंह जी की मूर्ति स्थापित की जा रही थी और उसका अनावरण होना है।

मूर्तिकार प्रतिमा पर तांबे का रंग चढ़ा रहे थे।
रंग को देखकर मुझे कुछ समय पुरानी वह बात याद आ गई, जब स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी की मूर्ति के लिए दावा तो तांबे का किया गया था, लेकिन बाद में खुलासा हुआ कि वह सीमेंट की बनी थी।

जब मैंने इस बात का ज़िक्र किया, तो पास बैठे एक युवा ने मुझे टोकते हुए कहा— “रिपोर्टर अंकल, प्रेजेंट की बात करिए।”
शायद उसके कहने का आशय ‘आज’ से था। लेकिन उसकी इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या हम वास्तव में प्रेजेंट की असलियत को समझ पाए हैं?

बुनियाद कभी प्रेजेंट नहीं होती
अगर आपका आशय प्रेजेंट से ‘आज’ या समय से है, तो मेरे विचार से समय कभी प्रेजेंट होता ही नहीं। क्योंकि जो ‘आज’ खड़ा है, वह ‘कल’ की बुनियाद पर टिका है।

हम भव्य इमारत को देखते हैं, मंजिल दर मंजिल सुंदर अति सुंदर संरचना को सराहते हैं, लेकिन उसकी बुनियाद को नहीं देख पाते। बुनियाद में बहुत सुंदरता नहीं होती, पर वह सबसे ज्यादा मजबूत होती है। वह बुनियाद ‘कल’ (अतीत) थी, इसीलिए दिखाई नहीं देती।

समय का आने वाला एक-एक मिनट, एक-एक घंटा आता है और चला जाता है। आने वाले और जाने वाले के बीच की स्थिति को ही लोग प्रेजेंट समझ बैठते हैं। लेकिन समय तो बस पास हो रहा है और लगातार ‘पास्ट’ (अतीत) बनता जा रहा है। हमें यह भी नहीं पता कि कल क्या होगा, इसीलिए हम इसी में उलझे रहते हैं कि कल क्या हुआ था।

उपस्थिति ही वर्तमान है
मैंने कहीं पढ़ा था— “ना भूतकाल होता है, ना भविष्य काल… केवल होता है तो वर्तमान।”
लोग ‘वर्तमान’ के इस असली अस्तित्व को शायद ही स्वीकार कर पाएं। धर्म हमारा कल था, भगवान हमारे कल थे; हम ‘आज’ का नाम लेकर ‘कल’ पर ही तो जी रहे हैं।

अंग्रेजी के शब्द ‘Present’ का असली अर्थ केवल समय नहीं, बल्कि ‘उपस्थित होना’ है। समय कल भी था और कल भी रहेगा, लेकिन हमारी उपस्थिति कल नहीं थी और कल भी नहीं रहेगी। इसीलिए, आपकी उपस्थिति ही वर्तमान है। और जब आप यहाँ उपस्थित हैं, तो अपनी उस उपस्थिति को सर्वश्रेष्ठ बनाना ही ‘परफेक्ट प्रेजेंटेशन’ है।
समय खुद में कुछ नहीं है, यह तो बस गणना के लिए बनाया गया एक सूचना तंत्र है। घड़ी महज एक मशीन है।

WATCH का व्यापक व्याकरण
घड़ी को हम ‘वॉच’ (Wrist Watch) भी कहते हैं। यह वॉच हमें केवल समय देखना नहीं, बल्कि अपने कर्मों को देखना सिखाती है। ‘Watch’ का व्यापक व्याकरण और जीवन का दर्शन यही है:

W – Watch your Words (अपने शब्दों पर नज़र रखें)
A – Watch your Actions (अपने कर्मों को देखें)
T – Watch your Tongue (अपनी वाणी को संभालें)
C – Watch your Character (अपने चरित्र पर ध्यान दें)
H – Watch your Honesty and Hard work (अपनी ईमानदारी और मेहनत को परखें)

जनचौपाल-36 निष्कर्ष
गया हुआ वक्त ठहरता नहीं, बस चलता रहता है। इसलिए न अतीत का कोई स्वतंत्र अस्तित्व बचा है, न भविष्य का कोई आकार है— होता है तो केवल वर्तमान। और यह वर्तमान कुछ और नहीं, बस आपकी इस क्षण में सजग उपस्थिति (Presence) है।

सोशल जानकारी अनुसारअनावरण छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव द्वारा किया जाना प्रस्तावित है और इसकी तैयारियां जारी हैं।

सोशल मीडिया की चिंगारी, पथराव हुआ भारी -टीआई समेत कई पुलिसकर्मी घायल

बिलासपुर- 29 अगस्त 2026

बिलासपुर में सोशल मीडिया की चिंगारी से सड़क पर संग्राम: दो गुटों में पथराव।

शुक्रवार रात कहासुनी और गाली-गलौज से शुरू हुआ विवाद मारपीट और फिर जमकर ईंट-पत्थरबाजी में बदल गया। देखते ही देखते सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए।

सोशल मीडिया पर की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी ने छत्तीसगढ़ के बिलासपुर को शुक्रवार देर रात हिंसा की आग में झोंक दिया। सिटी कोतवाली थाना क्षेत्र के खपरगंज और मसानगंज इलाके में दो पक्ष आमने-सामने आ गए और देखते ही देखते विवाद ने हिंसक झड़प का रूप ले लिया।

कैसे भड़की हिंसा?
पुलिस के मुताबिक मामला सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट का नहीं है।

सोशल मीडिया पर कथित तौर पर हिंदू विरोधी और गाय को लेकर आपत्तिजनक कमेंट किया गया था। इसके साथ ही दोनों पक्षों में पहले से पुरानी रंजिश चली आ रही थी।

उपद्रवियों ने सिटी कोतवाली थाने के साथ-साथ आसपास के घरों और दुकानों में भी तोड़फोड़ की।

पुलिस पर भी हमला, आंसू गैस छोड़नी पड़ी

हालात बेकाबू होते देख पुलिस ने मोर्चा संभाला। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग और लाठीचार्ज करना पड़ा। जब भीड़ नहीं मानी तो आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।

इस पथराव में तारबाहर थाना प्रभारी (TI) रवि तिवारी समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। घायल पुलिसकर्मियों और दोनों पक्षों के 3 लोगों को इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया है।

प्रशासन ने संभाला मोर्चा

घटना की गंभीरता देखते हुए कलेक्टर संजय अग्रवाल और एसएसपी रजनीश सिंह देर रात तक सिटी कोतवाली में डटे रहे और खुद हालात का जायजा लिया।

एसएसपी रजनीश सिंह ने बताया – “दो लोगों में निजी विवाद हुआ, पुराने विवाद में एक व्यक्ति ने दूसरे को पत्थर मारा, जिसके बाद दोनों पक्षों ने अपने लोगों को बुला लिया और पथराव शुरू कर दिया। पुलिस ने तत्काल नियंत्रित किया।”

स्थिति को देखते हुए 300 से 400 जवानों ने पूरे इलाके को घेर लिया है। मुंगेली और जांजगीर-चांपा से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया है। पूरा इलाका छावनी में तब्दील है और संवेदनशील इलाकों में लगातार पेट्रोलिंग चल रही है।

प्रशासन की अपील और आगे की कार्रवाई

कलेक्टर और एसएसपी ने लोगों से अपील की है कि अफवाहों पर ध्यान न दें। कलेक्टर ने कहा – “बिलासपुर की पहचान आपसी भाईचारे और सौहार्द से है, इसे खराब करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी।”

पुलिस ने साफ किया है कि उपद्रवियों की पहचान वीडियो फुटेज और CCTV से की जा रही है। एसएसपी ने चेतावनी दी है – “जो भी आरोपी होगा, सबकी गिरफ्तारी होगी, किसी को बख्शा नहीं जाएगा।” साथ ही भड़काऊ पोस्ट करने वालों पर भी कार्रवाई होगी।

— जनचौपाल_36 की टिप्पणी:
बिलासपुर की यह घटना बताती है कि कैसे सोशल मीडिया की एक छोटी सी टिप्पणी सड़क पर बड़ा बवाल बन जाती है। पुरानी रंजिश में सोशल मीडिया ने पेट्रोल का काम किया। जरूरत है कि युवा सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी समझें और प्रशासन भी ऐसे भड़काऊ कंटेंट पर तुरंत एक्शन ले।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नेपाल बाढ़ में सहयोग के लिए बढ़ाया हाथ

न्यूज डेस्क 29 अगस्त 2026

नेपाल बाढ़ संकट के इस समय में भारत की यह त्वरित और व्यापक सहायता नेपाल के राहत प्रयासों को बड़ी मजबूती प्रदान कर रही है।

नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ और प्राकृतिक आपदा ने पड़ोसी देश में जीवन-संपत्ति को गहरा आघात पहुंचाया है। संकट की इस भीषण घड़ी में अंतरराष्ट्रीय समुदायों और पड़ोसी देशों की त्वरित प्रतिक्रिया ने मानवीय संवेदनाओं और सहयोग की भावना को मजबूती दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा नेपाल में राहत और बचाव कार्यों के लिए वित्तीय व चिकित्सीय मदद का दायरा बढ़ाना और भारत द्वारा अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर सहायता सामग्री भेजना, इस आपदा से निपटने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम हैं।

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने आपदा के शुरुआती घंटों में ही तत्काल 150,000 अमेरिकी डॉलर की आपातकालीन धनराशि जारी करने की घोषणा की है। इसके साथ ही, लगभग 10,000 लोगों की 3 महीने की जरूरतों को पूरा करने वाली अंतर-एजेंसी आपातकालीन स्वास्थ्य आपूर्ति, टेंट, मास्क, दस्ताने और हैंड सैनिटाइजर जैसी जरूरी वस्तुएं प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचाई जा चुकी हैं।

डब्ल्यूएचओ का यह कदम न केवल तात्कालिक राहत प्रदान करेगा, बल्कि बाधित स्वास्थ्य सेवाओं को बहाल करने और संक्रामक बीमारियों के खतरे को रोकने में भी सहायक सिद्ध होगा।
भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से नेपाल के सबसे करीब होने के नाते भारत ने एक जिम्मेदार पड़ोसी का धर्म पूरी निष्ठा से निभाया है।

भारत सरकार द्वारा राहत सामग्री और विशेषज्ञों की टीम के साथ विशेष उड़ानों को काठमांडू भेजना दोनों देशों के गहरे संबंधों को दर्शाता है। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, भारत ने पोर्टेबल जनरेटर, डिग्निटी किट, खाद्य सामग्री और जल शोधन गोलियों जैसी आवश्यक वस्तुओं के साथ-साथ 11 सदस्यीय डॉक्टरों व पैरामेडिकल कर्मियों की टीम और सुरंग बचाव अभियान के लिए रेकी टीम को रवाना किया है।

प्राकृतिक आपदाएं किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं होतीं; इनका सामना केवल एकजुटता और साझा प्रयासों से ही संभव है। वर्तमान स्थिति में नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित समुदायों तक निर्बाध स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना और बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण करना है।

डब्ल्यूएचओ और भारत की यह साझा पहल यह संदेश देती है कि जब कोई देश मानवीय संकट से जूझता है, तो वैश्विक और क्षेत्रीय साझेदारों का निरंतर सहयोग ही पुनर्वास और बहाली की राह आसान बनाता है।

आने वाले दिनों में आवश्यकता आकलन के आधार पर सहायता के इस सिलसिले को और मजबूत करने की जरूरत बनी रहेगी।

खेलो इंडिया: युवा प्रतिभाओं को निखारने का जन-आन्दोलन_पीएम मोदी

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न्यूज डेस्क – 29 अगस्त 2026

खेलो इंडिया कार्यक्रम अब केवल एक योजना नहीं रहा — यह भारतीय खेल प्रतिभा को देशभर में निखारने का महत्वपूर्ण मंच बन गया है। हाल के दिनों में इस पहल ने युवा खिलाड़ियों को न केवल प्रतिस्पर्धा का अवसर दिया है बल्कि उन्हें अपने सपनों को वास्तविकता में बदलने का समर्थन भी उपलब्ध कराया है। सरकार की सक्रिय भागीदारी और व्यापक नीति दखल ने इसे सिर्फ खिलाड़ी विकास तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि यह राष्ट्रीय युवा शक्ति और खेलशक्ति को जोड़ने का एक अभियान बन गया है।

प्रधानमंत्री ने सत्र के दौरान कहा कि खेलों की सार्थकता केवल पदक तक सीमित नहीं; यह चरित्र निर्माण, लचीलापन और राष्ट्र निर्माण में योगदान का माध्यम है। उन्होंने स्क्रीन और आभासी खेलों की तुलना में मैदान और खेल केंद्रों की बढ़ती अहमियत पर विशेष जोर दिया। प्रधानमंत्री के मुताबिक, प्लेस्टेशन से ज्यादा मैदानों की जरूरत है — यही वह स्थल है जहाँ युवा उठना, गिरना और फिर से खड़ा होना सीखते हैं।

नयी रणनीति यह भी सुझाती है कि हम उन खेलों में भी महारत हासिल करें जिनमें अभी तक हमारी भागीदारी सीमित है — अन्य देश ऐसे खेलों में मेडल जीतते हैं जिनमें हम हिस्सा ही नहीं लेते। यही वैश्विक परिप्रेक्ष्य भारत को बहु-विविध खेलों में प्रतिस्पर्धी बनाएगा।

एक ऐतिहासिक संदर्भ जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने भारतीय सेना की हॉकी टीम के शताब्दी पूर्व न्यूजीलैंड दौरे और मेजर ध्यानचंद की द्विपक्षीय खेल कूटनीति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ध्यानचंद द्वारा स्थापित संबंधों को आगे बढ़ाना आज भी हमारी प्राथमिकता है और हाल की न्यूजीलैंड यात्रा ने इसी प्रतिबद्धता को पुष्ट किया।

खेलो इंडिया संवाद को प्रधानमंत्री ने महज बातचीत नहीं, बल्कि राष्ट्र के खेल दृष्टिकोण को आकार देने वाला मंच बताया, जहाँ युवाओं की आवाज़ नीति और प्रतिभा विकास को सीधे प्रभावित करेगी। यह पहल केवल खेल नहीं, विकसित भारत के निर्माण का एक सक्रिय हिस्सा बन चुकी है।

धन-दौलत और विशाल साम्राज्य होने के बाद भी इंसान क्यों खाली हाथ और दुखी रहता है?

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लेख विशेष – 28 अगस्त 2026

राजा की बात सुनते ही ब्राह्मण ने अपनी पोटली से वही ₹1 का सिक्का निकाला और राजा की हथेली पर रख दिया।

आज की दुनिया में हर व्यक्ति अधिक से अधिक पाने की अंधी दौड़ में शामिल है। लेकिन विचार करने योग्य विषय यह है कि आखिर जीवन में सबसे ज्यादा आवश्यकता किस चीज की है? क्या अपार धन-संपदा इंसान को अमीर बनाती है, या फिर असंतोष उसे सबसे बड़ा भिखारी बना देता है? इस सत्य को उजागर करती हुई यह एक मार्मिक कथा है।

कहानी: रास्ते का सिक्का और राजा की दरिद्रता

एक समय की बात है, एक ज्ञानी ब्राह्मण तड़के उठकर पूजा-पाठ के लिए मंदिर की ओर जा रहे थे। मार्ग में उनकी नज़र ज़मीन पर पड़े ₹1 के एक सिक्के पर पड़ी। ब्राह्मण ने सिक्का उठाया और सोचा— “यह धन मेरा नहीं है। मैं इसे किसी ऐसे दरिद्र व्यक्ति को दान करूँगा, जिसे इसकी वास्तव में आवश्यकता हो।”

ब्राह्मण ने पूरे नगर में भ्रमण किया, लेकिन उन्हें कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो वास्तव में दरिद्र लगे। नगर का हर नागरिक अपनी स्थिति में प्रसन्न और संतुष्ट था। दिन बीतते गए, ब्राह्मण वह सिक्का अपनी पोटली में बांधकर रोज दरिद्र की खोज करते रहे।

एक सुबह, जब ब्राह्मण मंदिर की ओर बढ़ रहे थे, तो उन्होंने देखा कि राज्य के राजा अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ किसी पड़ोसी राज्य पर आक्रमण करने जा रहे हैं।

सबसे बड़ा दरिद्र: एक रुपये का महासत्य

राजा की नज़र जैसे ही ब्राह्मण पर पड़ी, उन्होंने अपना रथ रुकवाया। राजा ने रथ से उतरकर ब्राह्मण के चरण स्पर्श किए और नम्रता से कहा—
“हे महात्मा! मैं दूसरे नगर पर विजय प्राप्त करने और उसके राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाने युद्ध पर जा रहा हूँ। कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मेरी जीत हो।”

राजा की बात सुनते ही ब्राह्मण ने अपनी पोटली से वही ₹1 का सिक्का निकाला और राजा की हथेली पर रख दिया।

राजा आश्चर्यचकित रह गया। उसने अचंभित होकर पूछा— “महात्मा! आप यह क्या कर रहे हैं? एक विशाल सेना के स्वामी और राजा को आप आशीर्वाद के स्थान पर यह एक रुपये का सिक्का क्यों दे रहे हैं?”

ब्राह्मण ने अत्यंत शांत और गंभीर स्वर में उत्तर दिया—
“राजन्! मुझे कुछ दिन पहले यह ₹1 का सिक्का मिला था। मैंने संकल्प लिया था कि इसे किसी अत्यंत दरिद्र और भिक्षुक को ही दूँगा। मैंने पूरे नगर में तलाश की, पर मुझे कोई दरिद्र नहीं मिला। आज जब मैंने आपको देखा, तो मुझे अहसास हुआ कि इस पूरी सृष्टि में आपसे बड़ा दरिद्र कोई नहीं है।

विशाल साम्राज्य, अपार धन-दौलत और सेना होने के बावजूद आपकी तृष्णा शांत नहीं हुई है। सब कुछ होते हुए भी आप दूसरों का राज्य छीनने जा रहे हैं। जिसके पास असंतोष का अभाव है, वही सबसे बड़ा भिखारी है। इसीलिए यह सिक्का आपके ही योग्य है।”

ब्राह्मण के यह शब्द सीधे राजा के हृदय में तीर की तरह चुभे। राजा की आँखें खुल गईं और उसका मस्तक लज्जा से झुक गया। उसे समझ आ गया कि भौतिक वस्तुओं का संग्रह इंसान को अमीर नहीं बनाता। उसने तुरंत अपनी सेना को वापस लौटने का आदेश दिया और युद्ध का विचार सदा के लिए त्याग दिया।

कहानी का मूल बोध
अतृप्त इच्छा ही दरिद्रता है–इंसान के पास कितना धन या पद है, इससे उसकी संपन्नता तय नहीं होती। अगर मन में और पाने का लालच भरा है, तो व्यक्ति सब कुछ होते हुए भी दरिद्र ही रहेगा।

स्वार्थ और असंतोष का चक्र-
जीवन में आगे बढ़ने का लक्ष्य होना अच्छी बात है, लेकिन जब इच्छाएँ इस हद तक बढ़ जाएँ कि मन में यह विचार आने लगे कि “दूसरे की जेब का पैसा मेरी जेब में कैसे आए”, तो इंसान अपना मानसिक संतुलन और शांति खो देता है।

संतोष ही असली धन है-
इंसान को खुश रहने के लिए परिग्रह (संग्रह) की नहीं, बल्कि संतोष की आवश्यकता होती है। जब तक ‘तृष्णा’ का अंत नहीं होगा, तब तक जीवन में सच्चे ‘आनंद’ का आरंभ नहीं हो सकता।

अतुलित बल धामम: जब समर भूमि में जागा त्रेता का महातेज

किस्सा कुरुक्षेत्र का -28 अगस्त 2026

गांडीवधारी अर्जुन के दिव्य रथ के ध्वज पर विराजित थे स्वयं पवनपुत्र हनुमानजी।

जब भी युद्ध के मध्य महाबली हनुमान खड़े होकर कौरव सेना की ओर अपने आग्नेय नेत्रों से घूरकर देखते, तो सेना में ऐसा हाहाकार मचता मानो कोई प्रचंड जलजला आ गया हो। कौरव सैनिक प्रलयकारी तूफ़ान की गति से रणभूमि छोड़कर भाग खड़े होते। किसी भी योद्धा में इतना साहस न था जो कपिध्वज पर विराजमान महातेज की दृष्टि का भी सामना कर सके।

कुरुक्षेत्र का मैदान… जहाँ रक्त की नदियाँ बह रही थीं, जहाँ लोहे से लोहा टकरा रहा था और जहाँ हर क्षण मृत्यु का अट्ठाहास गूँज रहा था। पर उस विशाल युद्धक्षेत्र में एक ऐसा सच भी था जिसे देख कौंतेय और कौरव, दोनों ही थर्रा उठते थे।

फिर वह क्षण आया जब नियति का सबसे भीषण संग्राम छिड़ा—कर्ण और अर्जुन का युद्ध।
कर्ण उस दिन रुद्र रूप धारण किए हुए था। उसके धनुष से बाणों की ऐसी प्रलयंकारी वर्षा हो रही थी कि स्वयं जगदाधार भगवान श्रीकृष्ण भी उससे अछूते न रहे। बाणों की तीखी बौछार से माधव का दिव्य कवच कटकर भूमि पर गिर पड़ा। कर्ण के तीक्ष्ण शर पुरुषोत्तम के अत्यंत कोमल, श्री-अंगों को बिंधने लगे।

रथ की छत पर शांत बैठे महावीर हनुमान एकटक अपने आराध्य स्वामी की ओर ही देख रहे थे।

जब उन्होंने देखा कि उनके स्वामी, उनके प्रभु का कवच छिन्न-भिन्न हो चुका है और कर्ण का बाण निरंतर उनके श्री-अंगों को क्षत-विक्षत कर रहा है, तो त्रेतायुग के महाबली का धैर्य टूट गया। भक्ति का बांध क्रोध के ज्वार में बह गया।

अचानक… ब्रह्मांड को कँपा देने वाली एक उग्रतर गर्जना गूंजी!

हनुमानजी अपने दोनों हाथों को उठाकर, कर्ण को क्षण मात्र में भस्म कर देने के लिए रथ की ध्वजा पर खड़े हो गए। उनकी वह हुंकार ऐसी थी मानो सहस्रों बिजलियां एक साथ कौंध गई हों, मानो दसों दिशाएं फट पड़ी हों।

जो कौरव सेना पहले ही सहमी हुई थी, वह तो भागी ही, परंतु हनुमानजी के इस विकराल रूप को देखकर पांडव पक्ष के योद्धा भी थर-थर कांपते हुए समर भूमि छोड़कर भागने लगे। हनुमानजी के इस कल्पान्तकारी क्रोध को देखकर कर्ण के हाथों से उसका धनुष छूटकर गिर पड़ा।

यह दृश्य देखते ही भगवान श्रीकृष्ण तुरंत उठे। उन्होंने अपना दाहिना हाथ बढ़ाया और महाबली हनुमान का स्पर्श करते हुए अत्यंत गंभीर स्वर में कहा—
“रुक जाओ पवनपुत्र! संभलो! यह तुम्हारे क्रोध का समय नहीं है।”

प्रभु के स्पर्श मात्र से हनुमानजी रुक तो गए, परंतु उनका क्रोध शांत न हुआ। उनकी विशाल पूंछ आकाश में तनी हुई लहरा रही थी। दोनों हाथों की मुट्ठियाँ कस चुकी थीं, दांत कटकटा रहे थे और उनकी जलती हुई लाल आँखें कर्ण पर टिकी थीं। त्रेतायुग के उस अमर महावीर का ऐसा प्रलयंकर रूप देखकर कर्ण और उसका सारथि थर-थर कांप रहे थे।

हनुमानजी को शांत न होते देख, श्रीकृष्ण ने कड़े और आदेशात्मक स्वर में कहा—
“हनुमान! मेरी ओर देखो! यदि तुमने कुछ क्षण और कर्ण की ओर इस दृष्टि से देख लिया, तो वह तुम्हारे तेजोबल से ही भस्म हो जाएगा। यह त्रेतायुग नहीं, द्वापर है। यहाँ तुम्हारे पराक्रम को तो छोड़ो, तुम्हारे तेज की एक झलक भी सहने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। मैंने तुम्हें इस महासमर में शांत रहकर केवल साक्षी बनने को कहा है।”

प्रभु के इन शब्दों को सुनते ही महाबली ने अपने आग्नेय नेत्रों को नीचे मोड़ा, अपने आराध्य परमेश्वर के श्रीचरणों की ओर देखा और चुपचाप, शांत होकर पुनः ध्वजपट पर विराजमान हो गए।