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लहरों का अनसुना शोर: प्रकृति का आदिम व्याकरण

लेख – 07 जून 2026

मेरा जीवन मेरा दर्शन’ की शैली में एक बेहद प्रभावशाली और मुकम्मल लेख में लहरों के शोर को सीधे ईश्वर, मानव चेतना, प्रकृति की मूक भाषा और जल संरक्षण से जोड़ कर देखा गया है।

इस लेख का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि मनुष्य अपनी ही बनाई भाषा और शोर में इतना खो गया है कि वह प्रकृति (लहरों, जीव-जंतुओं, जल) की अनंत और रहस्यमयी भाषा को भूल चुका है।

सागर का शांत होना और लहरों का बार-बार किनारे पर आकर शोर मचाना, दरअसल प्रकृति की एक अनसुनी पुकार है, जिसे न समझ पाने के कारण ही आज असंतुलन पैदा हो रहा है।

सागर की यात्रा लगभग हर किसी ने की होगी। हम उसके विशाल विस्तार को देखते हैं, पैरों को छूकर गुजरती लहरों के साथ अठखेलियां करते हैं और लौट आते हैं।

लेकिन क्या कभी आपने ठहरकर उन लहरों के शोर को गहराई से पहचाना है? क्या कभी उस गूंज को डिकोड करने की कोशिश की है? वह सिर्फ पानी की हलचल नहीं है, वह ब्रह्मांड का एक आदिम संवाद है। लहरें कुछ कहती हैं, उनकी अपनी एक चीख है, एक भाषा है—वही लहरों का असल शोर है।

चलिए, आज इसी शोर का एक सिरा पकड़ते हैं और सत्य के कुछ छिपे हुए द्वारों को खटखटाते हैं।

ईश्वर, क्षीर सागर और अलगाव का रहस्य
भगवान को संसार का कण-कण जानता है, पूजता है और उनका अनुकरण करता है। लेकिन क्या कभी इस दार्शनिक पहलू पर विचार किया कि क्या वह परम चेतना भी इस सांसारिक शोर में हमें व्यक्तिगत रूप से पहचानती है? सनातन दर्शन में ईश्वर का वास ‘क्षीर सागर’ (दूध के समुद्र) में माना गया है। वह वहां शेषनाग की शय्या पर परम शांत मुद्रा में विराजमान हैं।

सवाल उठता है कि क्या भगवान क्षीर सागर में इसलिए रहते हैं ताकि वे इस सृष्टि के मूल शोर और उसकी तड़प को सीधे महसूस कर सकें? सागर की लहरों के बीच बैठकर कभी ध्यान से सुनिए। वे लहरें बार-बार उठती हैं और पूरी ताकत से किनारे की तरफ भागती हैं। ऐसा क्यों? क्या वे समुद्र के साथ नहीं रहना चाहतीं? या फिर वे लहरें उस महासागर के देखे गए अंतहीन सपने हैं, जो बार-बार साकार होने के लिए छटपटाते हैं? वे किनारों से टकराकर लगातार जो शोर मचाती हैं, वह अलगाव की पीड़ा है या मिलन की तड़प?

एक गहरा प्रश्न: क्या लहरों की इस चीख को समुद्र नहीं सुनता? और जब यह अनसुनी पराकाष्ठा पर पहुंचती है, तभी शायद समुद्र में तूफान उठते हैं और बवंडर का जन्म होता है। समुंदर भीतर से शांत है, पर उसकी सतह पर लहरों का एक शाश्वत शोर है।

इंसानी व्याकरण बनाम प्रकृति की मूक भाषा
मनुष्य ने अपनी बुद्धि के बल पर तरकीबें निकालीं। हमने अपने भीतर के शोर को शब्द दे दिए, उन शब्दों को व्याकरण के नियमों में बांधा और भाषा की रचना कर डाली। आज हम खुद को बहुत अभिव्यक्त पा रहे हैं। लेकिन याद कीजिए, जब हम इस प्रकृति की गोद में पहली बार जनमे थे, क्या तब हमारे पास ये शब्द थे? क्या हम एक-दूसरे की भाषा समझ पाते थे? नहीं। तब हम भी इसी मूक प्रकृति का हिस्सा थे।
सागर का शांत होना और लहरों का बार-बार किनारे पर आकर शोर मचाना, दरअसल प्रकृति की एक अनसुनी पुकार है, जिसे न समझ पाने के कारण ही आज असंतुलन पैदा हो रहा है।

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जीवन सत्य ,अध्यात्म का खोखलापन और अनदेखा बवंडर

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मेरा विचार मेरा दर्शन – 05 जून 2026

भगवान को संसार का कण-कण जानता है, पूजता है और उनका अनुकरण करता है लेकिन वह किसे जानता है किसे पहचानता है?! फिर सनातन दर्शन कहता है कि ईश्वर ‘क्षीर सागर’ (महासागर) में वास करते हैं। लेकिन मनुष्य ने ईश्वर को भी अपने बनाए शोर की तरह मंदिरों और कर्मकांडों में सीमित कर दिया। वह यह भूल गया कि ईश्वर जिस महासागर में रहते हैं, उसकी लहरों की चीख को सुनना ही वास्तविक अध्यात्म था।

ईश्वर बहुत ही गहरी और दार्शनिक बात है। जब हम ईश्वर को ‘अपना’ घर या ‘पराया’ घर मान लेते हैं, तब हम अद्वैत और सर्वव्यापकता के भाव से दूर हो जाते हैं।

ईश्वर को किसी विशेष दायरे, धर्म या संप्रदाय में बाँधने के बजाय, उन्हें सर्वव्यापी और अपने भीतर अनुभव करना ही आध्यात्मिकता का मूल है। इस विषय पर विभिन्न संतों और विचारकों ने भी यही कहा है कि ईश्वर प्रेम और शुद्ध चेतना का नाम है, जो किसी एक का नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि का आधार है।

ईश्वर कहां है क्या एक योनि में_
यदि हम पूरी सृष्टि के संदर्भ में देखें, तो जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की तुलना में मानव का प्रतिशत आटे में नमक के बराबर भी नहीं है। शास्त्रों में ८४ लाख योनियों का वर्णन है, जिसमें मानव महज एक योनि है। बाकी की योनियां और यह पूरी प्रकृति हमारे चारों तरफ बिखरी है। हम उनके साथ रहते हैं, उन्हीं की हवा में सांस लेते हैं, उन्हीं का दिया खाते हैं; फिर हम प्रकृति के इन बाकी सह-यात्रियों की भाषा और उनके शोर को पहचानने की कोशिश क्यों नहीं करते?

प्रजनन और सृजन_
हमने मनुष्य के प्रजनन के विज्ञान को समझ लिया, पौधों के प्रजनन को जान लिया। लेकिन एक गहरा रहस्य देखिए—मनुष्य को सृजन के लिए बाह्य सहयोग और समाज की आवश्यकता होती है, लेकिन इन पेड़-पौधों और मूक जीवों को देखिए, वे बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी बाहरी आडंबर के प्रकृति के मौन नियम से अपना सृजन कर जाते हैं। यह सामर्थ्य उन्हें कहां से मिलता है??

प्रकृति ही परमेश्वर है_
धर्मों के बीच टकराव का मुख्य कारण ईश्वर पर एकाधिकार जमाने की कोशिश है।जब हम ईश्वर को केवल मंदिर, मस्जिद या चर्च तक सीमित कर देते हैं, तो हम अपने भीतर की चेतना खो देते हैं।
“मेरा मार्ग ही सही है” महा अंहकार का भाव है जो व्यक्ति में आध्यात्मिक अहंकार पैदा करता है।

महाप्रलय_
जब मनुष्य प्रकृति के उस संवाद को, उस अलगाव की पीड़ा को नहीं सुनता, तो वही अनसुनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर तूफान और बवंडर का रूप ले लेती है। सागर भीतर से शांत है, पर उसकी सतह का शोर मनुष्य को चेतावनी देता है कि आंतरिक विज्ञान को समझो, बाहरी दिखावे को नहीं।

मेरा विचार मेरा दर्शन ___ना कोई दार्शनिक, ना कोई कवि, ना कोई आध्यात्मिक प्रणेता…”दीपक पांडेय







मानवी शोर से प्रकृति आवरण का फटना: जल और हमारा कल

डिजीटल डेस्क 05 जून 2026

जब हम प्रकृति के इस भाषाई और आध्यात्मिक आवरण को पूरी तरह फाड़ देते हैं, तब हम उस क्रूर धरातल पर पहुँचते हैं जहाँ हम अपने ही जीवन के आधार को नष्ट करने लगते हैं।

जल का महा-रहस्य: अथाह सागर की पुकार
हम जन सभा में आख्यान माला में कहते हैं “जल है तो कल है।” (Save water 💦 save life)पर क्या यह केवल एक उद्बोधन है या हमारे भीतर की कोई गंभीर चेतना? जो हमें जगाने की कोशिश करती है।हमने जल संरक्षण की दिशा में वास्तव में कितना आत्मिक काम किया है?


हम मंचों पर चिल्लाते हैं—”जल है तो कल है।” पर यह केवल एक नारा बनकर रह गया है। हमने जल संरक्षण की दिशा में वास्तव में कितना आत्मिक काम किया है? सागर के पास अथाह जल राशि है, पर वह खारा है। प्रकृति उस खारे पानी को भी अपनी तड़प से मीठा बनाकर बादलों के रूप में हमें सौंपती है, ताकि हमारा अस्तित्व बचा रहे। यह प्रकृति का वह आवरण है जो हमें जीवन देता है।

लेकिन जब मनुष्य इस आवरण को फाड़कर जल स्रोतों को नष्ट करता है, प्रकृति को प्रदूषित करता है, तो वह वास्तव में खुद को आत्मघाती रूप से नग्न कर रहा होता है।

खारा ही तो सहारा है
सागर जीवन का आदि-स्रोत है। लेकिन वह जल खारा है, जिसे हम सीधे ग्रहण नहीं कर सकते। प्रकृति उस खारे पानी को भी अपनी तड़प (धूप और वाष्पीकरण) से मीठा बनाकर बादलों के रूप में हमें सौंपती है।

लहरों का शोर नहीं ,भविष्य की चेतावनी
सागर की लहरों का वह शोर दरअसल हमें यह चेतावनी दे रहा है कि यदि हमने जल के इस चक्र को, प्रकृति के इस आदिम व्याकरण को नहीं समझा, तो शांत दिखने वाला यह महासागर जब बवंडर बनेगा, तो मानव का यह कृत्रिम शोर हमेशा के लिए शांत हो जाएगा।
लहरों को सिर्फ देखिए मत, उन्हें सुनिए। उनके शोर में ही सृष्टि के संरक्षण का सबसे बड़ा रहस्य छिपा है।

प्रकृति आदमी और अंहकार
विचार की शुरुआत में ही हमने ‘आवरण‘ और ‘मानव के अहंकार’ की बात रख दी थी, जिससे अध्यात्म, भाषा और पर्यावरण—तीनों उसी अहंकार के अलग-अलग रूप में लगने लगे हैं।भाषा के अहंकार से अध्यात्म का खोखलापन और उससे पर्यावरण की तबाही को एक स्वाभाविक कड़ियों में जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

निष्कर्ष
यह लेख न केवल अध्यात्म पर है, न केवल पर्यावरण पर और न केवल भाषा पर यह एक स्व विचार पर है एक दृष्टांत है जिसमें चलने के लिए दो पग जमीन और मुट्ठी भर हिस्से का आमसान जो “बंद मुट्ठी लिए पैदा हुआ था वही शामिल है।

यह लेख मनुष्य के उस अहंकार पर है जो प्रकृति के सुंदर आवरण को नष्ट कर रहा है। सागर की लहरों का वह शोर दरअसल हमें यह चेतावनी दे रहा है कि यदि हमने समय रहते इस आदिम व्याकरण को नहीं समझा, तो शांत दिखने वाला यह महासागर जब अपना रुद्र रूप दिखाएगा, तो मानव का यह कृत्रिम शोर हमेशा के लिए शांत हो जाएगा।

लेख डेस्क 5 जून 2026

प्राकृतिक आवरण और युद्धक शोर: प्रकृति के वस्त्र को तार-तार करता मानव

जीवन और प्रकृति – 05/06/2026

जीवन एक मुकम्मल दर्शन है जहां “प्रकृति जीवन का पूर्ण आवरण है, लेकिन मानव इस आवरण को फाड़ कर नंगा होना चाहता है।यह लेख उस “जीवन और युद्ध उलझन को सुलझाने की एक मजबूत चाबी (Master Key) हो सकती है।

संपूर्ण आवरण और मनुष्य का नंगापन
एक विचार (आवरण और मनुष्य की अज्ञानता) के तहत आपस में जोड़ना होगा तभी संसार नहीं भटकेगा, जब तक हम इंसान को प्रकृति की देयता समझ नहीं रहेगा तब तक हम यूं ही विनाश करते रहेंगे।हमने क्या दिया यह महत्वपूर्ण नहीं है हमने किसी से क्या लिया इसका आभार प्रकट करना चाहिए।

प्रकृति इस जीवन का पूर्ण आवरण है। वह हमें अपने भीतर समेटे हुए है, हमारा पोषण करती है और एक शाश्वत सुरक्षा कवच की तरह हमें ढके रहती है। लेकिन विडंबना देखिए, आधुनिक मानव अपनी तथाकथित बुद्धि के अहंकार में इस पवित्र आवरण को फाड़ कर नंगा हो जाना चाहता है। वह समझ नहीं पा रहा है कि इस आवरण के हटते ही उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

इस आवरण के फटने की शुरुआत तब होती है, जब मनुष्य प्रकृति के संवाद को सुनना बंद कर देता है और केवल अपने बनाए कृत्रिम शोर में जीने लगता है।


भाषा का अहंकार और मूक चेतना से अलगाव

जब हम इस प्रकृति में पैदा हुए थे, तब हमारे पास कोई शब्द नहीं था, कोई भाषा नहीं थी। फिर भी हम जीवित थे। मनुष्य ने तरकीबें निकालीं, अपने भीतर के शोर को शब्द दिए, व्याकरण रचा और बोलने लग गया। हमें लगा कि हम समृद्ध हो गए, लेकिन वास्तव में यहीं से हमने प्रकृति के आवरण को फाड़ना शुरू किया।

हम अपनी बनाई भाषा के जाल में ऐसे कैद हुए कि ८४ लाख योनियों वाली इस विशाल सृष्टि की आदिम भाषा को ही भूल गए। हम सागर तट पर जाते हैं, लहरों के शोर को सुनते हैं, पर उसे केवल पानी का टकराना मान लेते हैं। हम यह नहीं समझ पाते कि वह शोर दरअसल एक भाषा है।

सपने
क्या लहरें समुद्र के देखे गए अंतहीन सपने हैं, जो बार-बार साकार होने के लिए छटपटाते हैं? क्या वे किनारों से टकराकर लगातार जो शोर मचाती हैं, वह इस मूक सृष्टि का संवाद है जिसे सुनने वाला कोई नहीं है?

मानव जन्म
मनुष्य का प्रजनन और विकास बाह्य सहयोग और सामाजिक शोर पर टिका है, जबकि पेड़-पौधे और जीव-जंतु बिना किसी शोर-शराबे के, प्रकृति के मौन नियम से अपना सृजन कर जाते हैं। मनुष्य इस मौन आवरण को समझ ही नहीं पा रहा है।

विश्व पर्यावरण दिवस के इस मोड़ पर आज जब ईरान, इजरायल और अमेरिका जैसी महाशक्तियां युद्ध की आग में झुलस रही हैं और समुद्र के सीने पर बारूद बरसाया जा रहा है, तब यह साफ हो जाता है कि युद्ध और प्राकृतिक विनाश दोनों ही मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को गहरे स्तर पर निगल रहे हैं। बमबारी और सैन्य गतिविधियों के कारण जहां एक तरफ जान-माल की भारी हानि और इंसानी विस्थापन हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ ‘इकोसाइट’ (पर्यावरण की क्रूर हत्या) जैसी भयावह स्थिति पैदा हो रही है; यह तबाही चीख-चीख कर कह रही है कि मनुष्य अपनी ही बनाई सरहदों के शोर में प्रकृति के उस जीवनदायी आवरण को तार-तार कर खुद को नग्न और असहाय कर रहा है।

मेरा विचार मेरा दर्शनना कोई दार्शनिक, ना कोई कवि, ना कोई आध्यात्मिक प्रणेता…”
— दीपक पांडेय



खबर बेमेतरा: बच्चों और महिलाओं के लिए कानून बना ढाल,ओटेबंद में लगा विधिक जागरूकता कैंप

बेमेतरा – 04 जून 2026

बाल यातना और मानव तस्करी के खिलाफ दुनिया भर में मनाए जा रहे अंतरराष्ट्रीय दिवस के मौके पर बेमेतरा जिले के छोटे से गांव ओटेबंद में बुधवार को कानून की बड़ी पाठशाला लगी। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने यहां एक दिवसीय विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन किया और ग्रामीणों को सीधे बताया कि संकट में कानून कैसे उनका सबसे बड़ा हथियार बन सकता है।

शिविर में सहायक प्रतिरक्षा अधिवक्ता देवेंद्र साहू ने ग्रामीणों को नालसा की 2015 वाली योजना का मतलब समझाया। उन्होंने कहा कि मानव तस्करी, जबरन देह व्यापार या यौन शोषण के शिकार महिलाओं और बच्चों को अब अकेले लड़ाई नहीं लड़नी पड़ेगी। इस योजना के तहत पीड़ितों को मुफ्त वकील, सुरक्षा, पुनर्वास और कोर्ट-कचहरी की पूरी मदद सरकार कराएगी।
प्रतिरक्षा अधिवक्ता अमन दुबे ने जोड़ा कि पीड़ितों को सिर्फ कानूनी मदद ही नहीं, बल्कि मानसिक और आर्थिक सहारा देकर उन्हें दोबारा सम्मान की जिंदगी तक पहुंचाना भी नालसा का मकसद है। वहीं आयुष शुक्ला ने एसिड अटैक पीड़ितों के लिए बनी विशेष योजना की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एसिड हमले के बाद इलाज, मुआवजा, मुफ्त वकील और अपराधी को सजा दिलाने तक की पूरी जिम्मेदारी विधिक सेवा प्राधिकरण उठाता है।

बच्चों के लिए माहौल बदलने की बात करते हुए अधिवक्ता पी. राजेश्वरी ने नालसा की 2024 की बाल-मित्र कानूनी सेवा योजना खोली। इस योजना के तहत बाल अपराधी हो या बाल पीड़ित, अनाथ हो या संरक्षण मांगने वाला बच्चा — कानूनी प्रक्रिया के दौरान उसे डर नहीं, दोस्त जैसा माहौल मिलेगा और उसके हर अधिकार की रक्षा होगी।

अधिवक्ता गीता दास और दुर्गा साहू ने ग्रामीणों को बताया कि गांव-गांव में खुलने वाले विधिक क्लीनिक ही अब सबसे नजदीक की अदालत हैं। यहां कानूनी सलाह से लेकर आवेदन लिखवाने तक हर काम मुफ्त होता है। स्कूल, कॉलेज, जेल और कोर्ट परिसर में भी ये क्लीनिक चल रहे हैं ताकि जरूरतमंद को वकील तलाशने दूर न जाना पड़े।

शिविर में मौजूद मजदूरों और ग्रामीणों ने कानून की इन बारीकियों को गौर से सुना और खुलकर सवाल भी पूछे। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव के निर्देश पर लीगल एड डिफेंस काउंसिल की पूरी टीम ने इस कैंप को अंजाम तक पहुंचाया। गांव वालों की भीड़ और उनकी जिज्ञासा बता रही थी कि कानून की जानकारी अब सिर्फ किताबों में नहीं, चौपाल तक पहुंच रही है।

धान उत्पादन में छत्तीसगढ़ अब बासमती खुशबू की ओर, किसानों की जेब होगी डबल

रायपुर – 4 जून 2026

धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में अब बासमती धान की खेती का रास्ता साफ हो गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सुगंधित चावल की बढ़ती डिमांड और किसानों की आमदनी दोगुनी करने के टारगेट को लेकर राज्य सरकार ने बड़ा दांव चला है। बुधवार को कृषि मंत्री राम विचार नेताम ने नवा रायपुर स्थित अपने निवास कार्यालय में इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन के साथ हाईलेवल बैठक की और बासमती धान मिशन पर पायलट प्रोजेक्ट की नींव रख दी।

बैठक में कृषि उत्पादन आयुक्त सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी, कृषि संचालक राहुल देव, अनुसंधान संचालक डॉ संजय त्रिपाठी के साथ बीज निगम और इंदिरा गांधी कृषि विवि के वैज्ञानिक भी मौजूद रहे। कृषि मंत्री नेताम ने दो टूक कहा कि किसानों का हित सबसे ऊपर है और उनकी आय बढ़ाने के लिए बासमती की खेती को मिशन मोड में बढ़ाया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को साफ निर्देश दिए कि इस योजना में कोई ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी और जो भी कदम जरूरी हों, उन्हें तुरंत जमीन पर उतारा जाए।

कृषि उत्पादन आयुक्त परदेशी ने बताया कि छत्तीसगढ़ में सामान्य धान तो खूब होता है, लेकिन असली खेल अब बासमती का है। यूरोप से लेकर खाड़ी देशों तक बासमती और सुगंधित चावल के दाम सामान्य धान से कई गुना ज्यादा मिलते हैं। इसी को देखते हुए पहले चरण में पायलट प्रोजेक्ट शुरू होगा। इसके लिए प्रदेश में उन इलाकों की पहचान की जाएगी जहां का तापमान और जलवायु बासमती के लिए मुफीद है। चुने गए क्षेत्रों में बासमती का रकबा बढ़ाकर सीधे किसानों को इंटरनेशनल मार्केट से जोड़ा जाएगा।

इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन ने भी भरोसा दिया है कि वे किसानों से बासमती की फसल बायबैक करेंगे। यानी किसान को बाजार तलाशने की टेंशन नहीं होगी। फेडरेशन ने मार्केटिंग से लेकर एक्सपोर्ट तक हर कदम पर मदद का वादा किया है। बैठक में तय हुआ कि खेत से लेकर विदेशी बंदरगाह तक एक पूरी चेन बनाई जाएगी ताकि छत्तीसगढ़ का बासमती सीधे दुबई, यूरोप और अमेरिका की थाली तक पहुंचे और किसान को उसकी उपज का सबसे बेहतर दाम मिले।

सरकार की नजर अब फसल विविधीकरण पर है। सामान्य धान के साथ-साथ बासमती को बढ़ावा देकर छत्तीसगढ़ को सुगंधित चावल के नए हब के तौर पर पहचान दिलाने की तैयारी है।

कालाबाजारी पर एक्शन: खाद माफिया पर आधी रात रेड, बिलासपुर में दो गोदाम सील

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रायपुर- 04 जून 2026


खरीफ सीजन शुरू होते ही खाद की कालाबाजारी करने वालों पर कृषि विभाग ने सर्जिकल स्ट्राइक शुरू कर दी है। बिलासपुर जिले में उड़नदस्ता दलों ने आधी रात को मल्हार और सेन्दरी में एक साथ छापेमारी की।

मस्तूरी के मल्हार स्थित अग्रवाल खाद भण्डार में यूरिया, एनपीके और एसएसपी का अवैध भण्डारण पकड़ा गया और पूरा स्टॉक जब्त कर मामला सीधे जिला दण्डाधिकारी न्यायालय भेज दिया गया। इसके कुछ घंटों बाद ही सेन्दरी के मेसर्स बंसल फर्टिलाइजर में छिपाकर रखी गई खाद को टीम ने बरामद किया और मौके पर ही गोदाम सील कर दिया। दोनों मामलों में आवश्यक वस्तु अधिनियम तथा उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985 के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

किसानों को राहत देने के लिए जिला प्रशासन ने सभी सहकारी समितियों को शनिवार और रविवार समेत हर दिन खोलने के आदेश दे दिए हैं ताकि खाद के लिए कोई लाइन या परेशानी न हो। खरीफ के लिए जिले को 68 हजार 950 मीट्रिक टन उर्वरक का लक्ष्य मिला है जिसके खिलाफ अब तक 46 हजार 780 मीट्रिक टन से ज्यादा भण्डारण हो चुका है और 19 हजार 913 मीट्रिक टन खाद किसानों को बांटी भी जा चुकी है।

यूरिया, डीएपी, पोटाश, एनपीके और एसएसपी का भरपूर स्टॉक मौजूद है और पिछले साल की तुलना में इस बार 10 हजार 711 मीट्रिक टन ज्यादा खाद पहले ही डंप कर ली गई है।

कृषि विभाग ने साफ किया है कि किसान सिर्फ पंजीकृत सहकारी समितियों और लाइसेंसी दुकानों से ही खरीदारी करें और रसीद जरूर लें। विभाग ने खाद की कमी की अफवाहों को खारिज करते हुए किसानों से नैनो यूरिया, नैनो डीएपी, हरी खाद और नील हरित काई जैसे विकल्प अपनाने की अपील की है जिससे खेत की उर्वरा शक्ति बढ़े और केमिकल पर निर्भरता घटे। उड़नदस्ता टीमें पूरे प्रदेश में 24×7 एक्टिव हैं और जहां भी कालाबाजारी या ज्यादा रेट की शिकायत मिलेगी, अगली रेड वहीं होगी।

आत्म चेतना – चेतना मौन है या मुखर, मौन’ का चक्रव्यूह में प्रवेश करना ही चेतना की गुप्त यात्रा है

लेख – 04 जून 2026

अंतहीन संघर्षों में आज के मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष किसी दृश्य युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि उसके भीतर के एक अदृश्य, शांत अंधेरे मानसिक अंतर्द्वंद्व में चल रहा है। वह बाहर से जितना सुव्यवस्थित दिखता है, भीतर से उतना ही खंडित है। वह हर रोज दुनिया के सामने मुस्कुराता है, जिम्मेदारियों को कंधा देता है, और ‘धैर्य’ का मुखौटा पहने रहता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि लगातार सहते-सहते उस धैर्य के पीछे क्या घटित हो रहा है?

धैर्य का अभ्यास करते-करते, बिना किसी शोर के, उसकी चेतना भीतर ही भीतर थकने लगती है। एक समय था जब मन में आकांक्षाओं की एक चंचल, उफनती हुई नदी बहती थी। सब कुछ मुट्ठी में कर लेने का साहस था, आसमान को छूने की जिद थी।

पर अचानक, न जाने किस मोड़ पर, उस जीवंतता की जगह एक गहरा, रहस्यमयी मौन उतर आया। नदी का वेग अचानक एक ठहरे हुए, डरावने जलाशय में बदल गया।

अब ऐसा लगता है मानो हम जीवन को जी नहीं रहे, बल्कि एक भारी, अदृश्य बोझ को धीरे-धीरे ढो रहे हैं। जो धैर्य कभी हमारा सबसे बड़ा आत्मबल था, वह परिस्थितियों के सामने निरंतर झुकते-झुकते एक मूक पीड़ा में बदल चुका है।

मनुष्य अपने ही बनाए इस चक्रव्यूह में फंसकर, अपने भीतर की उस दिव्य उजास (प्रकाश) को खोता चला जाता है।

टूटन से रूपांतरण: महाविज्ञान का रहस्य

लेकिन ठहरिए! क्या यह अंत है? या किसी बहुत बड़े रहस्य की शुरुआत?

दर्शन – हमें केवल इस पीड़ा का अंधेरा नहीं दिखाता, बल्कि उस अंधेरे को चीरने वाली एक गुप्त दृष्टि देता है। जीवन की कठोरताओं के सामने घुटने टेककर सब कुछ सह जाना अंतिम सत्य हो ही नहीं सकता।

असली रहस्य इस प्रश्न में छिपा है कि—सहने के इस अत्यंत गहरे अनुभव से हमारी चेतना भीतर ही भीतर क्या सीख रही है? क्या वह सचमुच टूट रही है, या किसी नए स्वरूप में ढलने के लिए पिघल रही है?

यही वह बिंदु है जहाँ गीता की ‘समता-बुद्धि’ का रहस्यमयी विज्ञान काम आता है। यह बुद्धि हमें सिखाती है कि सुख-दुःख, अनुकूल-प्रतिकूल, प्रिय-अप्रिय—इन सबको एक साधारण मनुष्य की तरह नहीं, बल्कि एक द्रष्टा की व्यापक दृष्टि से देखा जाए।

जब आप परिस्थितियों से ऊपर उठकर उन्हें देखना शुरू करते हैं, तो मन उनका दास बनना बंद कर देता है।

जो भीषण चोट आज आपको बाहर से तोड़ती हुई प्रतीत हो रही है, वह वास्तव में आपको नष्ट नहीं कर रही। यदि उसे गहरे आत्मनिरीक्षण और आंतरिक विज्ञान के साथ जिया जाए, तो वही टूटन अंततः आपके भीतर एक ऐसी अभेद्य, वज्र जैसी दृढ़ता को जन्म देती है, जिसे संसार की कोई भी परिस्थिति कभी दोबारा हिला नहीं सकती। आप टूटते नहीं हैं, आप रूपांतरित हो जाते हैं!

होशियारी की दुनिया में मासूमियत की ढाल: कैसे जीएँ आज की ज़िंदगी?

लेख आलेख 04 जून 2026

सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालो कि हम हैं अनाड़ी…”
साल 1959 में शैलेंद्र के लिखे ये बोल आज 2026 में भी हमारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच बनकर खड़े हैं। इसके साथ ही जब हम चारों तरफ नज़र दौड़ाते हैं, तो शायर शौक़ बहराइची की ये पंक्तियाँ ज़हन में गूँजने लगती हैं— “बर्बाद-ए-गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था, हर शाख़ पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा।”

एक तरफ सीधापन और मासूमियत खोने का दर्द है, तो दूसरी तरफ हर मोड़ पर स्वार्थ और चालाकी का पहरा। ऐसे माहौल में एक बुनियादी सवाल उठता है: जब हर शाख़ पर चालाकी बैठी हो, तो एक सीधा और सच्चा इंसान अपनी अच्छाई के साथ ज़िंदा कैसे रहे?. ‘होशियारी’ बनाम ‘समझदारी’ का बारीक अंतर

गीत में जिस ‘होशियारी’ को न सीखने की बात कही गई है, वह दरअसल नकारात्मक चालाकी, कपट और दूसरों का इस्तेमाल करने की कला है। आज की दुनिया में जीने के लिए आपको इस तरह की ‘घटिया होशियारी’ सीखने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।

ज़रूरत है तो सिर्फ ‘समझदारी’ (Alertness) की। समझदारी का मतलब दूसरों को धोखा देना नहीं, बल्कि खुद को धोखेबाज़ों से बचाना है। आप दिल के साफ़ बने रह सकते हैं, बशर्ते आप आँखें खुली रखें।

जब हर डाल पर ‘उल्लू’ बैठा हो, तब क्या करें?

शायर का यह कहना बिल्कुल सही है कि जब तंत्र और समाज के हर हिस्से में स्वार्थी लोग बैठ जाएँ, तो व्यवस्था बिखरने लगती है। लेकिन इस कड़वी सच्चाई के बीच दो रास्ते बचते हैं: या तो हम भी उन्हीं की तरह बनकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाएँ, या फिर अपनी सीमाएं (Boundaries) तय करना सीखें।

  • अपेक्षाओं का बोझ उतारें: जब आप यह मान लेते हैं कि सामने वाला व्यक्ति स्वार्थी हो सकता है, तो उसका वैसा व्यवहार आपको मानसिक चोट नहीं पहुँचाता।
  • ‘ना’ कहना सीखें: शराफ़त का मतलब कमज़ोरी नहीं है। अगर कोई आपकी अच्छाई का फायदा उठाने की कोशिश करे, तो बिना किसी अपराध बोध (Guilt) के दृढ़ता से ‘ना’ कहिए।

पूरी दुनिया को सुधारना या बदलना किसी एक इंसान के बस में नहीं है। अगर हम पूरे गुलिस्ताँ (संसार) के अंजाम की चिंता में घुले रहेंगे, तो अपनी मानसिक शांति खो बैठेंगे। इसकी जगह, अपनी ऊर्जा को अपनी छोटी सी दुनिया पर केंद्रित करें। आपके परिवार, आपके गिने-चुने सच्चे दोस्त और आपकी अपनी ईमानदारी—यही आपका छोटा सा बाग़ है। इसे ‘होशियारी’ के ज़हर से बचाकर रखें।

अंजाम-ए-गुलिस्ताँ की चिंता छोड़ें, अपना कोना महकाएँ

निष्कर्ष: अनाड़ी बने रहने में ही समझदारी है

ज़िंदगी का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि चालाक लोग सब कुछ हासिल करके भी अंत में अकेलापन और अविश्वास पाते हैं। वहीं, जिसे दुनिया ‘अनाड़ी’ कहती है, वह भले ही कुछ भौतिक चीज़ों में पीछे रह जाए, लेकिन रात को सुकून की नींद सोता है।

इस दौर में सबसे बड़ी बहादुरी यह नहीं है कि आप कितने चालाक बन सकते हैं, बल्कि सबसे बड़ी बहादुरी यह है कि इस बेहद चालाक दुनिया में रहते हुए भी आप अपनी अंदर की अच्छाई और मासूमियत को मरने न दें।

स्वविचार स्वलेख कोइ विवाद के लिए नहीं है🙏

अनाड़ी से खिलाड़ी तक: आज के ‘कुरुक्षेत्र’ में अर्जुन की रणनीति

लेख आलेख 04 जून 2026(दीपक पाण्डेय)

श्रीमद्भगवद्गीता और आज के सामाजिक ताने-बाने को जोड़कर जो विश्लेषण प्रस्तुत है, वह अद्भुत है और इस पूरी चर्चा का सबसे व्यावहारिक और ठोस सिरा है।

हाँ, कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध की शुरुआत में अर्जुन निश्चित रूप से उसी ‘अनाड़ीपन’ (भावुकता और व्यावहारिक अज्ञानता) के शिकार थे, जिसे भगवान कृष्ण ने अपने ज्ञान और रणनीतिक दृष्टिकोण से एक ‘महारथी खिलाड़ी’ में बदला।


जब ज़िंदगी की ज़मीनी हकीकत क्रूर हो जाए, तो खोखली दार्शनिक बातें मरहम नहीं बन पातीं। आज का युवा, आज का नागरिक ठीक उसी कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़ा है जहाँ कभी अर्जुन खड़े थे। जब अर्जुन ने अपनों के खिलाफ हथियार उठाने से मना कर दिया और कहा कि “मैं नहीं लड़ूँगा”, तो वह उनकी शराफ़त नहीं, बल्कि उनकी व्यावहारिक मूर्खता (अनाड़ीपन) थी। वे युद्ध के मैदान में खड़े होकर संन्यासियों जैसी बातें कर रहे थे।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कोई खोखली तसल्ली नहीं दी, बल्कि उन्हें जीवन का विराट स्वरूप दिखाकर ‘अनाड़ी’ से ‘खिलाड़ी’ बनाया। आज का समाज, आज की व्यवस्था भी एक कुरुक्षेत्र है, और यहाँ का हर आम इंसान एक असमंजस में फंसा हुआ अर्जुन है।

आज का कुरुक्षेत्र: आरक्षण, बेकारी और जनसंख्या का चक्रव्यूह
आज का अर्जुन (आम नागरिक या युवा) व्यवस्था को बदलना नहीं चाहता, वह बस किसी तरह इस व्यवस्था के साथ सामंजस्य बिठाकर गरिमा से जीना चाहता है। लेकिन चुनौतियाँ पहाड़ जैसी हैं:
आरक्षण और बेकारी (Unemployment): योग्यता होने के बावजूद अवसरों की कमी और प्रतियोगिता का गलाकाट माहौल।
जनसंख्या का दबाव: सीमित संसाधन और असीमित दावेदार। हर एक डाल पर अवसर कम और चुनौतियाँ ज़्यादा हैं।
गिरता नैतिक स्तर: जहाँ ईमानदारी को मूर्खता और चालाकी को ‘स्मार्टनेस’ मान लिया गया है।
इस चक्रव्यूह में फंसा हुआ आज का इंसान जब निराश होकर बैठ जाता है, तो वह अर्जुन की तरह ‘नैराश्य’ (Depression) को गले लगा लेता है।

कृष्ण का संदेश: पलायन नहीं, ‘रणनीति’ अपनाओ
कृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा कि दुनिया बहुत अच्छी है या सब ठीक हो जाएगा। उन्होंने कहा कि परिस्थितियाँ कड़वी हैं, सामने खड़े लोग अनैतिक हैं, लेकिन मैदान छोड़कर भागना (अनाड़ीपन) कोई विकल्प नहीं है।
व्यवस्था को समझो, खिलाड़ी बनो: यदि व्यवस्था जटिल है, तो रोने या खोखले आदर्शों का सहारा लेने के बजाय उसके नियमों को सीखो। आज के समय में शिक्षा, कौशल (Skills), कानूनी समझ और मानसिक दृढ़ता ही आपके गांडीव (हथियार) हैं।
भावनाओं पर विवेक की विजय: अर्जुन मोह में फंसे थे। आज के इंसान को भी निराशा और विक्टिम कार्ड (Victim Card) खेलने की भावना से बाहर निकलकर व्यावहारिक रणनीति (Strategy) बनानी होगी।

‘अंजाम’ को स्वीकार कर कर्म करना
कृष्ण का ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का सिद्धांत कोई खोखली बात नहीं है, बल्कि वह मानसिक तनाव से बचने की सबसे बड़ी तकनीक है। जब चारों तरफ ‘गिरता नैतिक स्तर’ हो, तो आप पूरी दुनिया को एक दिन में नहीं बदल सकते। लेकिन आप उस व्यवस्था के भीतर अपने हिस्से की लड़ाई पूरी ताकत, समझदारी और चालाकी (कौशल) के साथ लड़ सकते हैं।

निष्कर्ष: आज के अर्जुन को कृष्ण (रणनीति) की ज़रूरत है
आज की दुनिया में केवल ‘अनाड़ी’ या सीधा बने रहने का परिणाम शोषण और बर्बादी है। आपको चालाक या धोखेबाज़ नहीं बनना है, लेकिन आपको अजेय (Invincible) और चतुर खिलाड़ी बनना होगा। कुरुक्षेत्र का नियम साफ है—यहाँ कमज़ोर और असमंजस में रहने वालों के लिए कोई जगह नहीं है। अपनी आँखें खोलिए, व्यवस्था के क्रूर नियमों को समझिए, और अपनी योग्यता के दम पर इस खेल को जीतिए।

इस गहरे संदर्भ को जोड़ते हुए, लेख का दूसरा भाग जरूर पढ़ें-
होशियारी की दुनिया में मासूमियत की ढाल: कैसे जीएँ आज की ज़िंदगी?


अस्वीकरण (Disclaimer):इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत और वैचारिक हैं। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, समाज, जाति या व्यक्तिगत मान्यताओं को ठेस पहुँचाना बिल्कुल नहीं है।