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Friday, June 5, 2026

आखिर हम इंसान कब बनेंगे:महायुद्ध टैंकों में तेल है, पर इंसान का गला सूखा है!

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मानव या मशीन डिजिटल डेस्क -14/04/2026

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस ‘ब्लैक गोल्ड’ (पेट्रोलियम) के लिए दुनिया की महाशक्तियाँ—अमेरिका, ईरान और इज़रायल—मिसाइलें तानकर खड़ी हैं, क्या वह प्यास लगने पर एक घूँट पानी का विकल्प बन पाएगा? हम एक ऐसी अंधी दौड़ में शामिल हैं जहाँ हम मशीनों का पेट भरने के लिए तो अरबों डॉलर फूंक रहे हैं, लेकिन इंसान के गले की प्यास की हमें फिक्र नहीं।

कंक्रीट का कफ़न और तड़पती धरती
हमने तरक्की के नाम पर धरती को हर तरफ से कंक्रीट से ढंक दिया है। यह कंक्रीट विकास नहीं, बल्कि धरती का ‘कफ़न’ है। जब आसमान से सावन बरसता है, तो धरती की मिट्टी उसे सोखने के लिए तड़पती है, लेकिन हमारी सीमेंट की सड़कों ने उस मिट्टी का मुँह बंद कर दिया है।
कड़वा सच: समुद्र 11 किमी गहरा है, पृथ्वी का व्यास 12,750 किमी है, लेकिन हमारे काम का मीठा पानी सतह से मात्र कुछ सौ मीटर नीचे है। अगर हमने ऊपरी परत को ही पत्थरों से पाट दिया, तो नीचे की हज़ारों किमी की गहराई हमारे किस काम की?

तेल के लिए सेना, पर पानी के लिए सन्नाटा?
आज हॉर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz) में युद्धपोत खड़े हैं ताकि तेल के टैंकर न रुकें। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि हमें ‘वॉटर आर्मी’ की ज़रूरत है?
हमें ऐसी मिलिट्री चाहिए जो सरहद पर गोली न चलाए, बल्कि जल-स्रोतों पर पहरा दे।
जो यह सुनिश्चित करे कि कोई फैक्ट्री नदी को ज़हर न बनाए और कोई बिल्डर ज़मीन को कंक्रीट से न मारे। अगर आज हमने पानी बचाने के लिए कड़े अनुशासन (Martial Law) जैसी सख्ती नहीं दिखाई, तो कल हमारे पास चमचमाती गाड़ियाँ और बम-मिसाइलें तो होंगी, पर उन्हें चलाने वाला इंसान पानी की एक बूंद के लिए तरस कर दम तोड़ देगा।

मशीनी संसाधन बनाम मानव अस्तित्व
हम इलेक्ट्रिक गाड़ियां बना लेंगे, हम सौर ऊर्जा ले आएंगे, हम तेल का विकल्प ढूंढ लेंगे। लेकिन पानी और हवा का कोई विकल्प नहीं है। इंसान ने भौतिक संसाधनों को तो ‘स्मार्ट’ बना दिया, पर मानव संसाधन (Human Resource) आज सबसे ज़्यादा खतरे में है। हम उस मूर्ख लकड़हारे की तरह हैं जो उसी डाल को काट रहा है जिस पर बैठा है। तेल खत्म होगा तो दुनिया रुक जाएगी, पर पानी खत्म हुआ तो दुनिया ही खत्म हो जाएगी।

बाबू मोशाय, आनंद तभी तक है जब तक जीवन है!
“आनंद कभी नहीं मरता”—यह सच है, लेकिन आनंद को महसूस करने के लिए शरीर का जीवित रहना ज़रूरी है। आज हम जिस बारूद और धुएं में ‘सुपरपावर’ बनने का सपना देख रहे हैं, वह सपना कल एक सूखे कुएं के पास दम तोड़ता नज़र आएगा।

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