कवच का तेज नहीं आत्म बल चाहिए- जब समर भूमि में जागा त्रेता का महातेज
पौराणिक कथा 14 अगस्त 2026
कुरुक्षेत्र का मैदान… जहाँ रक्त की नदियाँ बह रही थीं, जहाँ लोहे से लोहा टकरा रहा था और जहाँ हर क्षण मृत्यु का अट्ठाहास गूँज रहा था। पर उस विशाल युद्धक्षेत्र में एक ऐसा सच भी था जिसे देख कौंतेय और कौरव, दोनों ही थर्रा उठते थे।
गांडीवधारी अर्जुन के दिव्य रथ के ध्वज पर विराजित थे स्वयं पवनपुत्र हनुमानजी। जब भी युद्ध के मध्य महाबली हनुमान खड़े होकर कौरव सेना की ओर अपने आग्नेय नेत्रों से घूरकर देखते, तो सेना में ऐसा हाहाकार मचता मानो कोई प्रचंड जलजला आ गया हो। कौरव सैनिक प्रलयकारी तूफ़ान की गति से रणभूमि छोड़कर भाग खड़े होते। किसी भी योद्धा में इतना साहस न था जो कपिध्वज पर विराजमान महातेज की दृष्टि का भी सामना कर सके।
फिर वह क्षण आया जब नियति का सबसे भीषण संग्राम छिड़ा—कर्ण और अर्जुन का युद्ध।
कर्ण उस दिन रुद्र रूप धारण किए हुए था। उसके धनुष से बाणों की ऐसी प्रलयंकारी वर्षा हो रही थी कि स्वयं जगदाधार भगवान श्रीकृष्ण भी उससे अछूते न रहे। बाणों की तीखी बौछार से माधव का दिव्य कवच कटकर भूमि पर गिर पड़ा। कर्ण के तीक्ष्ण शर पुरुषोत्तम के अत्यंत कोमल, श्री-अंगों को बिंधने लगे।
रथ की छत पर शांत बैठे महावीर हनुमान एकटक अपने आराध्य स्वामी की ओर ही देख रहे थे।
जब उन्होंने देखा कि उनके स्वामी, उनके प्रभु का कवच छिन्न-भिन्न हो चुका है और कर्ण का बाण निरंतर उनके श्री-अंगों को क्षत-विक्षत कर रहा है, तो त्रेतायुग के महाबली का धैर्य टूट गया। भक्ति का बांध क्रोध के ज्वार में बह गया।
अचानक… ब्रह्मांड को कँपा देने वाली एक उग्रतर गर्जना गूंजी!
हनुमानजी अपने दोनों हाथों को उठाकर, कर्ण को क्षण मात्र में भस्म कर देने के लिए रथ की ध्वजा पर खड़े हो गए। उनकी वह हुंकार ऐसी थी मानो सहस्रों बिजलियां एक साथ कौंध गई हों, मानो दसों दिशाएं फट पड़ी हों।
जो कौरव सेना पहले ही सहमी हुई थी, वह तो भागी ही, परंतु हनुमानजी के इस विकराल रूप को देखकर पांडव पक्ष के योद्धा भी थर-थर कांपते हुए समर भूमि छोड़कर भागने लगे। हनुमानजी के इस कल्पान्तकारी क्रोध को देखकर कर्ण के हाथों से उसका धनुष छूटकर गिर पड़ा।
यह दृश्य देखते ही भगवान श्रीकृष्ण तुरंत उठे। उन्होंने अपना दाहिना हाथ बढ़ाया और महाबली हनुमान का स्पर्श करते हुए अत्यंत गंभीर स्वर में कहा—
“रुक जाओ पवनपुत्र! संभलो! यह तुम्हारे क्रोध का समय नहीं है।”
प्रभु के स्पर्श मात्र से हनुमानजी रुक तो गए, परंतु उनका क्रोध शांत न हुआ। उनकी विशाल पूंछ आकाश में तनी हुई लहरा रही थी। दोनों हाथों की मुट्ठियाँ कस चुकी थीं, दांत कटकटा रहे थे और उनकी जलती हुई लाल आँखें कर्ण पर टिकी थीं। त्रेतायुग के उस अमर महावीर का ऐसा प्रलयंकर रूप देखकर कर्ण और उसका सारथि थर-थर कांप रहे थे।
हनुमानजी को शांत न होते देख, श्रीकृष्ण ने कड़े और आदेशात्मक स्वर में कहा—
“हनुमान! मेरी ओर देखो! यदि तुमने कुछ क्षण और कर्ण की ओर इस दृष्टि से देख लिया, तो वह तुम्हारे तेजोबल से ही भस्म हो जाएगा। यह त्रेतायुग नहीं, द्वापर है। यहाँ तुम्हारे पराक्रम को तो छोड़ो, तुम्हारे तेज की एक झलक भी सहने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। मैंने तुम्हें इस महासमर में शांत रहकर केवल साक्षी बनने को कहा है।”
प्रभु के इन शब्दों को सुनते ही महाबली ने अपने आग्नेय नेत्रों को नीचे मोड़ा, अपने आराध्य परमेश्वर के श्रीचरणों की ओर देखा और चुपचाप, शांत होकर पुनः ध्वजपट पर विराजमान हो गए।
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