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Friday, June 5, 2026

सबरीमाला विवाद: “न्यायालय तय नहीं कर सकता क्या सही है और क्या गलत” – देवस्वोम बोर्ड की तीखी दलील

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डिजिटल डेस्क/नई दिल्ली /16 अप्रैल 2026
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ के समक्ष चल रही सुनवाई ने एक नया मोड़ ले लिया है। बुधवार को त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धर्म किसी कानूनी परिभाषा का मोहताज नहीं है, बल्कि यह एक पूरे समुदाय की सामूहिक आस्था का प्रतिबिंब है।

प्रमुख दलीलें: आस्था बनाम संवैधानिक हस्तक्षेप

सुनवाई के दौरान सिंघवी ने तर्क दिया कि किसी समुदाय की परंपराओं की वैधता उस समुदाय के विश्वास के आधार पर तय होनी चाहिए, न कि बाहरी कानूनी मानकों पर। उन्होंने मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु रखे:

  • सामूहिक अधिकार सर्वोपरि: सिंघवी ने कहा कि धर्म एक समूह की पहचान है। कुछ व्यक्तियों के व्यक्तिगत अधिकारों (महिलाओं की एंट्री) को पूरे समुदाय की सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
  • अदालत की सीमाएं: बोर्ड की ओर से दलील दी गई कि संविधान के तहत कोर्ट को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी धार्मिक प्रथा की व्याख्या करे या उसे ‘सही या गलत’ की कसौटी पर परखे। उन्होंने राम जन्मभूमि मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि न्यायपालिका को धार्मिक आस्थाओं के विश्लेषण से बचना चाहिए।
  • अनुच्छेद 25 की सुरक्षा: दलील दी गई कि संविधान का अनुच्छेद 25 केवल पूजा की ही नहीं, बल्कि उन प्रथाओं की भी रक्षा करता है जिन्हें समुदाय अपने धर्म का अभिन्न हिस्सा मानता है।

तार्किकता और भेदभाव पर बहस

सुनवाई के दौरान जब मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने धर्म और धर्मनिरपेक्षता (Secularism) के बीच की रेखा पर सवाल किए, तो सिंघवी ने ‘हिंदू जीवन शैली’ का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में ‘नास्तिक दर्शन’ (चार्वाक) को भी जगह दी गई है, जो इसे केवल ईश्वर से संबंध तक सीमित न रखकर एक व्यापक जीवन पद्धति बनाता है।
भेदभाव का सवाल: सिंघवी ने स्पष्ट किया कि यदि कोई संस्थान कहता है कि “केवल हिंदू प्रवेश कर सकते हैं,” तो यह उसकी धार्मिक पहचान है। हालांकि, यदि वह क्षेत्र (जैसे केवल उत्तर भारतीय) के आधार पर प्रतिबंध लगाता है, तो वह भेदभाव की श्रेणी में आएगा।

सामाजिक सुधार बनाम धार्मिक स्वतंत्रता

जस्टिस सुंदरेश द्वारा ‘सामाजिक सुधार’ (जैसे हिंदू उत्तराधिकार कानून) के संदर्भ में पूछे गए सवाल पर सिंघवी ने बचाव करते हुए कहा कि राज्य को धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को विनियमित करने का अधिकार तो है, लेकिन इस प्रक्रिया में ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ का मूल तत्व नष्ट नहीं होना चाहिए। उन्होंने नागा साधुओं और दिगंबर जैन मुनियों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन परंपराओं को ‘सामान्य सामाजिक नैतिकता’ के तराजू पर नहीं तौला जा सकता।

खबर सारांश: वर्तमान सुनवाई इस जटिल सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है कि क्या व्यक्तिगत समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-15) किसी धार्मिक समुदाय के अपने रीति-रिवाजों को संरक्षित करने के अधिकार (अनुच्छेद 25-26) से बड़ा है। केंद्र सरकार ने भी पहले ही संकेत दिया है कि कई मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश भी वर्जित है, अतः परंपराओं का सम्मान अनिवार्य है।

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