रंग तरंग: छत्तीसगढ़ की लोक विरासत और आधुनिक सुरों का संगम —
रायपुर – 31 अगस्त 2026
“रंग तरंग” छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। इसकी वास्तविक सफलता कार्यक्रम की प्रस्तुति की गुणवत्ता, दर्शकों की भागीदारी और परंपरा-आधुनिकता के संतुलन पर निर्भर करेगी — जिसका आकलन आयोजन के बाद ही संभव होगा।
रायपुर के मुक्ताकाशी मंच पर 1 से 3 सितंबर 2026 तक आयोजित होने वाला “रंग तरंग” कार्यक्रम संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन की एक उल्लेखनीय पहल है, जो राज्य की समृद्ध लोक-संस्कृति को समकालीन संगीत के साथ जोड़ने का प्रयास करती है।
आयोजन की खासियत
तीन दिवसीय इस आयोजन का केंद्रबिंदु छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र और उनसे जुड़े कलाकार हैं। हर शाम 7 बजे से शुरू होने वाला यह कार्यक्रम महंत घासीदास संग्रहालय परिसर, सिविल लाइंस में होगा — एक ऐसा स्थान जो पहले से ही सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है।
सकारात्मक पहलू
स्थानीय कलाकारों को मंच मिलना: ऐसे आयोजन ग्रासरूट स्तर के कलाकारों के लिए बड़ा अवसर बनते हैं
युवा पीढ़ी से जुड़ाव: परंपरा और आधुनिकता के फ्यूजन से युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका
सांस्कृतिक संरक्षण: लुप्त होती लोक धुनों और वाद्ययंत्रों को नया जीवन
समीक्षात्मक दृष्टिकोण से विचारणीय बिंदु
प्रेस विज्ञप्ति में कार्यक्रम का उद्देश्य और भावना स्पष्ट है, लेकिन कुछ व्यावहारिक जानकारियों की कमी खलती है — जैसे किन विशिष्ट कलाकारों या दलों की प्रस्तुति होगी, प्रवेश निःशुल्क है या नहीं, और दर्शक क्षमता कितनी है। इस तरह के विवरण दर्शकों की उपस्थिति और आयोजन की पहुंच को प्रभावित कर सकते हैं।
साथ ही, “फ्यूजन” की अवधारणा — पारंपरिक वाद्यों को आधुनिक संगीत के साथ मिलाना — संतुलन की मांग करती है। यदि आधुनिकता पर अधिक जोर दिया गया तो मूल लोक परंपरा कहीं पीछे छूट सकती है, जबकि उद्देश्य ठीक इसके विपरीत — परंपरा को नई पहचान देना — बताया गया है।
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