शिक्षक सम्मान का मंच, शिक्षा के सवालों पर खामोशी क्यों?
हास्य-व्यंग्य – 12 सितंबर 2026
13 सितंबर को बेमेतरा छत्तीसगढ़ में शिक्षक सम्मान समारोह होगा। मंच सजेगा, अतिथि आएंगे, भाषण होंगे, शिक्षक सम्मानित होंगे और विकास कार्यों का भूमिपूजन-शिलान्यास भी होगा। निमंत्रण पत्र देखकर लगता है कि शिक्षा और विकास दोनों ने मिलकर छुट्टी के दिन शादी कर ली है।
अब सवाल यह है कि क्या साल में एक दिन शिक्षक को सम्मानित कर देने से शिक्षा व्यवस्था का सम्मान हो जाता है?
जिस शिक्षक को मंच पर सम्मान मिलेगा, वही अगले दिन स्कूल में संसाधनों, शिक्षकों और व्यवस्थाओं की कमी से जूझ सकता है। दूसरी तरफ विद्यार्थी डिग्री लेकर रोजगार की तलाश में भटक रहा है।
विकसित भारत में आज विकास की तस्वीर बड़ी शानदार है—5G है, एक्सप्रेस-वे हैं, स्मार्ट सिटी है, डिजिटल इंडिया है। लेकिन उसी तस्वीर का दूसरा हिस्सा भी है—कहीं साफ पानी के लिए कतार, कहीं रोजगार के लिए लाइन और कहीं अच्छी शिक्षा के लिए महंगी फीस।
देखते हैं मोबाइल स्मार्ट हो गया, शहर स्मार्ट हो गया, सवाल जस का तस—इंसान कब स्मार्ट जीवन जिएगा?
सरकारें जनता को राहत देने के लिए फ्रीबीज योजनाएं चलाती हैं, यह जरूरी भी है। गरीब को सहायता मिलनी चाहिए।अब सवाल खड़ा हो जाता है जब ‘मुफ्त’ राजनीति का स्थायी चुनावी झुनझुना बन जाता है।
जनता यह कभी नहीं पूछेगी—
“साहब, मुफ्त में सब कुछ देने की बजाय ऐसा रोजगार दे दीजिए कि अगली बार हमें मुफ्त मांगने की जरूरत ही न पड़े।”
फिर मुद्दे पर आइए,,
शिक्षा का असली उद्देश्य सिर्फ डिग्री बांटना नहीं, बल्कि हुनर और रोजगार की तरफ रास्ता खोलना है। अगर डिग्री बढ़ रही है और बेरोजगारी भी बढ़ रही है, तो कहीं न कहीं शिक्षा और रोजगार के बीच का पुल टूट चुका है।और सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने पर अगर स्कूल या शिक्षक ‘एडजस्ट’ करने की बात होती है, तो सवाल यह भी होना चाहिए कि बच्चे सरकारी स्कूल से दूर क्यों हुए? गुणवत्ता सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है?
छत्तीसगढ़ में एक और उलट पलट पर बहस जरूरी है—एक तरफ बच्चों को संस्कार, शिक्षा और नशामुक्त भविष्य देने की बात, दूसरी तरफ शराब से राजस्व जुटाने की व्यवस्था। समाज पूछ सकता है—हम युवा को अवसर दे रहे हैं या बाजार?
इसलिए शिक्षक सम्मान समारोह में तालियां जरूर बजाइए, लेकिन सवाल भी पूछिए।
विकास सिर्फ चौड़ी सड़क नहीं, बेहतर जिंदगी है।
शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं, रोजगार की राह है।
और सम्मान सिर्फ मंच पर माला नहीं, व्यवस्था में शिक्षक और विद्यार्थी की गरिमा है।
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