कलाकार बनाम राजनीति: एक दुविधा या विडंबना
रविवारीय -10/05/2026
जब एक कलाकार समाज के दुखों को पर्दे पर जीवंत कर सकता है, तो वह समाज को चला क्यों नहीं सकता?
तमिलनाडु की राजनीति में विजय (थलपति विजय) के प्रवेश और उन्हें ‘सिर्फ एक कलाकार’ कहकर कम आंकने की कोशिश पर नजरिया एक गहरी बहस के साथ।
दोहरा मापदंड: यह बड़ी विडंबना है कि जब एक नेता मंच पर खड़े होकर झूठे वादे और अभिनय करता है, तो उसे ‘चाणक्य नीति‘ कहा जाता है। लेकिन जब एक कलाकार, जो भावनाओं और जनता की नब्ज को समझता है, व्यवस्था सुधारने आता है, तो उसे ‘महज एक अभिनेता‘ कहकर खारिज करने की कोशिश की जाती है।
भावशून्यता बनाम संवेदनशीलता: जैसा कि हमने समझा, अभिनय वही कर सकता है जिसके अंदर मानवता के भाव हों। एक राजनेता को अक्सर कठोर और कूटनीतिक होना पड़ता है, जबकि एक कलाकार ‘संवेदनशील‘ होता है। शायद व्यवस्था इसी संवेदनशीलता से डरती है।
इतिहास का गवाह: तमिलनाडु की भूमि तो खुद इस बात की गवाह रही है कि कलाकारों ने ही वहां की राजनीति को दिशा दी है। एम.जी. रामचंद्रन (MGR) और जयललिता इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। उन्होंने साबित किया कि एक कलाकार की संवेदनशीलता जब सत्ता के साथ मिलती है, तो वह जन-कल्याण का बड़ा माध्यम बनती है।
सत्ता का मंच और कलाकार की चुनौती
नेताओं को लगता है कि राजनीति उनका ‘मंच’ है, लेकिन वे भूल जाते हैं कि जनता जनार्दन ही इस नाटक की असली निर्णायक है। अगर विजय को एक कलाकार कहकर रोका जा रहा है, तो यह उनकी कला का अपमान नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की उम्मीदों का अपमान है जो उस कलाकार में अपना अक्स देखते हैं।
“जिसने हर किरदार को जिया हो, वह जनता के दर्द के किरदार को सबसे बेहतर निभा सकता है।”
यह देश कोई “मंच” या ‘रंगमंच’ नहीं है जिसे बर्बाद किया जाए। यह एक जिम्मेदारी है। अगर एक कलाकार इस जिम्मेदारी को उठाने की ‘कोशिश’ कर रहा है, तो उसे मौका मिलना ही चाहिए, क्योंकि हर इंसान के अंदर एक कला है हर आदमी कलाकार है।
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