जीवन का महा-रंगमंच:नेता और अभिनेता दोनों समाज की दिशा तय करते हैं
रविवारीय – 10/05/2026
इस सृष्टि का कण-कण एक दिव्य लीला का हिस्सा है। जिसे हम संसार कहते हैं, वह वास्तव में आत्मा और परमात्मा का एक अद्भुत खेल है। जैसे प्रकृति अपने मौसमों के जरिए अपना खेल दिखाती है, वैसे ही यह जीवन एक वृहद रंगमंच है जहाँ हम सब अपनी भूमिका निभाने आए हैं।
जीवन को एक रंगमंच और मनुष्य को एक कलाकार के रूप में देखना न केवल प्राचीन भारतीय दर्शन का हिस्सा है, बल्कि यह जीवन की जटिलताओं को समझने का एक सुंदर दृष्टिकोण भी है।
अभिनय: मानवता का रस और कलाकार का कौशल
अभिनय करना कोई बुरी बात नहीं है। वास्तव में, अभिनय वही कर सकता है जिसके भीतर मानवता के सभी भाव जीवंत हों और जो जीवन के सभी नौ रसों को आत्मसात कर चुका हो। एक सच्चा कलाकार ही भावनाओं की गहराइयों को छू सकता है।
“दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई…”
यह पंक्तियाँ उस विधाता की ओर संकेत करती हैं जो पर्दे के पीछे रहकर इस रंगमंच का संचालन कर रहा है। हम सब उस ऊपर वाले के हाथ की कठपुतलियां हैं। यदि हमारा यह ‘अभिनय’ एक ‘अभिनव’ (नया और श्रेष्ठ) रूप ले ले, तो जीवन सफल हो जाता है। स्वयं ईश्वर भी जब धरती पर अवतार लेते हैं, तो वे एक रूप बदलकर आते हैं—वह भी तो परमात्मा का एक दिव्य अभिनय ही है।
इतिहास और कलाकार का सम्मान
इतिहास गवाह है कि समाज में कलाकारों का स्थान सदैव ऊंचा रहा है। मुगल काल में सम्राट अकबर के नवरत्नों में शामिल तानसेन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। वे संगीत के ऐसे सम्राट थे जिन्हें राजा के समतुल्य सम्मान प्राप्त था। भाव-वेदना को सुरों में पिरोना कोई तानसेन से सीखे। कलाकार अपनी कला से निर्जीव भावों में भी जान फूँक देता है।
राजनीति, अभिनय और आज का परिवेश
आज के दौर में ‘नेता’ और ‘अभिनेता’ के बीच की रेखा धुंधली पड़ती जा रही है। जहाँ एक को मंच चाहिए, तो दूसरे को रंगमंच।
चुनाव का अभिनय: राजनेता जनता के बीच आकर वादे करते हैं, लेकिन अक्सर उन वादों के पीछे की सच्चाई और जनता के दर्द से उनका नाता टूट जाता है।
कोशिश और वादे: जैसा कि कहा गया है—”वादे अक्सर टूट जाया करते हैं, कोशिशें कामयाब रहती हैं।”
इसलिए इंसान को सदैव नेक कोशिश करनी चाहिए।
एक श्रेष्ठ अभिनेता वही है जो समाज के दुख-दर्द को समझे और अपने किरदार के माध्यम से उसमें जान डाल दे। चार्ली चैपलिन जैसे महान कलाकार, जिन्होंने महात्मा गांधी से मुलाकात की थी, उन्होंने बिना शब्दों के संसार के दर्द और हंसी को पर्दे पर उतारा।
निष्कर्ष: मेरी दृष्टि
जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक “दीप प्रवाह’ में लिखा है कि नेता और अभिनेता को यह समझना होगा कि यह देश न कोई साधारण मंच है और न ही महज मनोरंजन का रंगमंच। यह करोड़ों संवेदनाओं का घर है।
जनचौपाल 36
“मेरा नाम राजू (कोई सियासत का राजा नहीं), घराना अनाम, बहती है गंगा जहाँ (दुनिया) मेरा धाम।”
- Advertisement -
- Advertisement -