लेख/आलेख – 25/04/2026
आज जब हम ईरान, इज़राइल और अमेरिका जैसे देशों को सागर की लहरों और सीमाओं के लिए टकराते हुए देखते हैं, तो हमारी भूमिका एक ‘साक्षी’ की होनी चाहिए। यह तटस्थता उदासीनता नहीं, बल्कि एक गहरी समझ है। जैसे हम ब्रह्मांड के अनंत विस्तार को देखते हैं—जहाँ तारे जन्म लेते हैं और गैलेक्सियाँ नष्ट हो जाती हैं—वहाँ हमारा कोई अधिकार नहीं होता, हम केवल एक दर्शक होते हैं।
जब हम तटस्थ होकर युद्ध या संसार की हलचलों को देखते हैं, तो हम उस दर्शक की तरह होते हैं जो आकाश में तारों को टूटते हुए तो देखता है, पर उन्हें रोकने या उन पर अधिकार जताने की कोशिश नहीं करता।
युद्ध की ये लहरें ‘अहंकार’ की उपज हैं। जब हम इन सीमाओं की जंग को तटस्थ होकर देखते हैं, तब हमें समझ आता है कि मनुष्य कितनी व्यर्थ की कोशिशों में लगा है। सागर की एक-एक बूंद पर अपना नाम लिखने की चाहत में वह पूरे महासागर की शांति को दांव पर लगा रहा है।
एक ‘साक्षी’ के रूप में हम देखते हैं कि जीवन की सीमाएं उन नक्शों से कहीं अधिक कीमती हैं जिन्हें इंसान ने बनाया है। जो तटस्थ है, वही देख पाता है कि हर मिसाइल के साथ न केवल एक शरीर मरता है, बल्कि उस ‘मौन’ का भी अपमान होता है जिससे हम सब आए हैं। ब्रह्मांड की तरह, जीवन भी अपने आप में पूर्ण है; इसे किसी अधिकार या सरहद की जरूरत नहीं।
लेख में एक ‘तटस्थ दृष्टिकोण’ प्रस्तुत है:
“मैं केवल एक दृष्टा हूँ, जो लहरों के संघर्ष को देख रहा है, पर मेरी आत्मा उस अथाह गहराई के मौन में सुरक्षित है जहाँ कोई सीमा नहीं पहुँच सकती।”


