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Friday, June 5, 2026

जनचौपाल36: आस्था, परंपरा और संविधान की चौखट

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लेखआलेख-22/04/2026

(दृश्य: शाम का समय, चौपाल पर सन्नाटा है। ज्योतिपति पुरानी फाइल देख रहे हैं, ज्वाला चाय लेकर आते हैं।)

ज्वाला: दादा, आज चारों तरफ ‘सबरीमाला’ की चर्चा है। अखबारों में भी है और टीवी पर भी बहस चल रही है। ये मामला आखिर सुलझ क्यों नहीं रहा?

ज्योतिपति: (लंबी सांस लेकर) देख ज्वाला, यह मामला दो धाराओं के बीच का है। एक तरफ हमारी सदियों पुरानी आस्था और परंपरा है, तो दूसरी तरफ आज का संविधान, जो कहता है कि सब बराबर हैं। अदालत इसी पर सुनवाई कर रही है कि क्या कोई परंपरा ‘संवैधानिक मर्यादा’ से ऊपर हो सकती है?

ज्वाला: लेकिन दादा, लोग कहते हैं कि ये तो हमारे धर्म का मामला है, इसमें कानून की क्या जरूरत?

ज्योतिपति: यही तो असली पेच है, ज्वाला। धर्म इंसान को बेहतर जीने का रास्ता दिखाता है। लेकिन जब धर्म के नाम पर किसी के साथ ‘भेदभाव’ की बात आती है, तो संविधान का काम शुरू होता है। सुनवाई में अदालत यही देख रही है कि क्या ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ के नाम पर किसी को पूजा के अधिकार से रोका जा सकता है, या परंपरा का अपना एक अलग न्याय है जिसे छेड़ा नहीं जाना चाहिए।

ज्वाला: यानी मामला सिर्फ मंदिर के दरवाजे खुलने या न खुलने का नहीं है?

ज्योतिपति: बिल्कुल नहीं। यह मामला ‘लिंग समानता’ (Gender Equality) का है। क्या भगवान के दरबार में इंसान-इंसान में फर्क किया जा सकता है? अदालत एक तरफ लोगों की भावना देख रही है, तो दूसरी तरफ ‘समानता का अधिकार’। मामला इसलिए पेचीदा है क्योंकि आस्था का कोई तार्किक पैमाना नहीं होता, और कानून बिना तर्क के नहीं चलता।

ज्वाला: तो फिर हल क्या है दादा? कोई जीत जाएगा तो कोई हार जाएगा, क्या समाज में कड़वाहट नहीं बढ़ेगी?

ज्योतिपति: असली जीत उसकी होगी जो यह समझ पाएगा कि समय के साथ परंपराओं का परिष्कार (Refinement) जरूरी है। पुरानी परंपराएं समाज को जोड़ने के लिए थीं, तोड़ने के लिए नहीं। अदालत का फैसला जो भी हो, हमें यह समझना होगा कि ‘संविधान’ देश का आधार है और ‘आस्था’ इंसान का सुकून। ये दोनों टकराने नहीं, बल्कि साथ चलने चाहिए।

ज्वाला: सही कह रहे हैं आप दादा। ‘जनचौपाल36’ का काम शायद यही है कि हम लोगों को बिना उत्तेजित हुए यह समझाएं कि न्याय क्या है और परंपरा का सही अर्थ क्या है।

ज्योतिपति: सही पकड़ा है, ज्वाला। खबर तो हर कोई देता है, लेकिन खबर की ‘आत्मा’ को समझना पत्रकारिता का असल धर्म है।


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