लेख/आलेख -14/04/2026 “deeapak pandey “
अक्सर लोग यह कहते सुनाई देते हैं कि “समय खराब चल रहा है” या “अच्छा वक्त पता नहीं कब आएगा।” लेकिन गहराई से सोचें तो क्या समय की अपनी कोई परिभाषा है? समय तो महज एक निर्जीव इकाई है; उसे सजीव और सार्थक बनाते हैं हमारे भाव, हमारे विचार और हमारी तैयारी। सच तो यह है कि समय अच्छा नहीं आता, हम अच्छे होते हैं तो समय अनुकूल लगने लगता है।हम बदलेंगे युग बदलेगा।
प्रकृति का दर्पण और सावन का संदेश
लेखक ने सावन का जो उदाहरण दिया है, वह अद्भुत है। सावन अकेलेपन का उत्सव नहीं, बल्कि जुड़ाव का प्रतीक है। जब पुरवाई चलती है और काली घटाएं छाती हैं, तो प्रकृति खुद को ‘सोलह श्रृंगार’ से सजाती है। यह श्रृंगार केवल सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि सृजन के लिए है। सूखे ताल-सरोवर का जल से भरना इस बात का प्रमाण है कि प्रकृति खुद को तैयार करती है।
यही नियम मनुष्य पर भी लागू होता है। हम मौसम नहीं बदल सकते, लेकिन मौसम का आनंद लेने के लिए खुद को तैयार तो कर सकते हैं। यदि मन में भीगने की इच्छा और स्वीकार्यता न हो, तो सावन की फुहारें भी कष्टदायक लग सकती हैं।
मन की आजादी और बंदिशों का द्वंद्व
इंसानी मन एक आजाद पंछी की तरह है जो अनंत आकाश में उड़ना चाहता है। लेकिन हम अक्सर सामाजिक बंदिशों और अपनी ही उलझनों के पिंजरे में कैद रहते हैं। हम खुशियों की तलाश बाहर करते हैं, जबकि:
इच्छाएं मन के भीतर हैं।
तृप्ति मन के भीतर है।
आजादी का अहसास भी मन के भीतर है।
जब हम खुद को ‘अच्छा’ बना लेते हैं—यानी जब हमारे विचार सकारात्मक और नियत साफ हो जाती है—तो हमें समझ आता है कि जिसे हम ढूंढ रहे थे, वह तो हमारे आसपास ही था।
कर्म का फलसफा है बबूल और आम
एक पुरानी कहावत है, “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय।“ यह जीवन का सबसे सरल लॉजिक है। हम जैसा बोएंगे, वैसा ही काटेंगे। यदि हमने अपने भीतर कड़वाहट और शिकायतें बोई हैं, तो समय का कोई भी दौर हमें मीठा फल नहीं दे सकता। लेकिन यदि हम आनंद को अपना स्वभाव बना लें, तो ‘बाबू मोशाय’ की तरह हम समझ पाएंगे कि आनंद कभी मरता नहीं।
अब क्या!आनंद ही शाश्वत है
जीवन अगर शरीर का उत्सव है, तो मृत्यु आत्मा का विश्राम। इस पूरे सफर में केवल एक ही चीज स्थायी है—आपका आंतरिक आनंद। समय कभी आपके पक्ष में होगा, कभी विपक्ष में, लेकिन यदि आप खुद में ‘भले’ और ‘सक्षम’ हैं, तो आप हर मौसम का आनंद ले पाएंगे।
अब सोचिए मत अच्छा समय आता नहीं है, उसे अपनी पात्रता अच्छाई से बुलाना पड़ता है। आप स्वयं में पूर्ण हैं, खुद को किसी से कम न समझें। जब आप खुद को जीत लेते हैं, तो पूरा संसार आपके लिए एक सुहावना सावन बन जाता है।
क्या करना है फिर
तैयारी: प्रकृति की तरह खुद को आने वाले सुखों के लिए तैयार करें।
दृष्टिकोण: समय बुरा नहीं होता, हमारी मानसिक स्थिति उसे वैसा बनाती है।
स्वामित्व: अपने आनंद पर अपना अधिकार रखें, इसे बाहरी परिस्थितियों के हाथ में न सौंपें।


