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Friday, June 5, 2026

जीवन का दूसरा सिरा: भूख या रूह का सुकून?रोटी खाता बच्चा या अध्यात्म में डूबा आदमी

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लेख/आलेख/रविवारीय -12/04/2026

अक्सर समाज हमें सिखाता है कि ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ मिल जाए तो जीवन सफल है। लेकिन क्या कभी आपने गौर किया है कि आलीशान महलों में रहने वाले भी अक्सर उदासी की दवाइयां ढूंढते फिरते हैं? इसका अर्थ स्पष्ट है: इंसान सिर्फ पेट भरने के लिए पैदा नहीं हुआ है, वह तो अपने भीतर के शून्य को भरने के लिए पैदा हुआ है।

भौतिकता बनाम सार्थकता
रोटी शरीर को जिंदा रखती है, लेकिन एक ‘उद्देश्य’ (Purpose) आत्मा को जिंदा रखता है। बिना किसी लक्ष्य के जीना वैसा ही है जैसे बिना पतवार की नाव, जो पानी पर तैर तो रही है पर कहीं पहुँच नहीं रही।
जरूरत: भूख मिटाना मजबूरी हो सकती है।
जुनून: कुछ ऐसा रचना जिससे दुनिया में आपके होने का प्रमाण मिले, वह गर्व का अहसास है।

आत्म-सम्मान: सुकून की पहली सीढ़ी
जीने के लिए सिर्फ सांसें काफी नहीं हैं; उन सांसों में ‘गर्व’ की महक होनी चाहिए। जब आप अपनी मेहनत से अपनी तकदीर बदलते हैं, तो वह जो सुकून मिलता है, वह किसी भी महंगे रिसॉर्ट की शांति से बड़ा होता है।
“भीख में मिले महलों से बेहतर है, अपनी मेहनत से बनाई गई झोपड़ी।”

भीतर की इच्छा: वह आग जो बुझनी नहीं चाहिए
हर इंसान के अंदर एक ‘छोटा बच्चा’ और एक ‘कलाकार’ होता है। जब हम दुनिया की भेड़चाल में फंसकर अपनी इच्छाओं का गला घोंट देते हैं, तभी ‘तल्खियां’ और ‘उदासी’ जन्म लेती हैं।
जिज्ञासा: नया सीखने की ललक।
अभिव्यक्ति: अपने मन की बात कहने या उसे किसी हुनर (कला, लेखन, काम) में ढालने की आजादी। यही वो तत्व हैं जो इंसान को मशीन बनने से बचाते हैं।

सुकून का असली पता
सुकून किसी सहारे में नहीं, बल्कि ‘स्वयं की तलाश’ में है। जब आप अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर लेते हैं और अपनी खूबियों पर काम करना शुरू करते हैं, तो जिंदगी बोझ नहीं, एक उत्सव लगने लगती है।

निष्कर्ष: हौसलामंदों की ही होती है दुनिया।याद रखिए दुनिया तब तक है जब तक आप हैं
जिंदगी गुमसुम और गुमनाम तब तक है जब तक आप अंधेरे कमरे की खिड़की नहीं खोलते। उजाला बाहर खड़ा आपका इंतजार कर रहा है, बस आपको एक कदम बढ़ाने की हिम्मत जुटानी है।

याद रखिए, जिंदगी हौसलामंद और हुनरमंद इंसान को ही सलाम करती है। हारना तब नहीं होता जब आप गिर जाते हैं, हारना तब होता है जब आप उठने से इनकार कर देते हैं। तो उठिए, अपनी कश्ती को तूफानों की ओर मोड़िए और दिखा दीजिए इस कायनात को कि आप केवल ‘गुजरने’ के लिए नहीं, बल्कि दुनिया को अपनी मौजूदगी से ‘जीतने’ के लिए पैदा हुए हैं।

एक आखिरी विचार: होंगे वो कोई और जो थक कर बैठ जाते हैं,हमें तो लहरों की सरकशी में ही घर बनाना आता है।

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