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Tuesday, July 21, 2026

सबरीमाला मामला: सुप्रीम कोर्ट बोला — अंधविश्वास की आड़ में भेदभाव नहीं चलेगा

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डिजिटल डेस्क नई दिल्ली,09/04/2026

केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने अहम सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई धार्मिक प्रथा अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दे, तो उस पर न्यायिक समीक्षा पूरी तरह संभव है।

पीठ ने कहा कि जादू-टोना, नरबलि और सती जैसी प्रथाएं भी कभी धर्म के नाम पर प्रचलित थीं, लेकिन उन्हें असंवैधानिक मानकर समाप्त किया गया। अदालत ने यह भी साफ किया कि किसी मामले में सरकार का निर्णय अंतिम नहीं माना जा सकता।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय करने में सक्षम नहीं है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि सबरीमाला में प्रतिबंध लैंगिक भेदभाव नहीं, बल्कि भगवान अयप्पा को नित्य ब्रह्मचारी मानने की धार्मिक मान्यता पर आधारित है।

जस्टिस अमानुल्लाह और जस्टिस बागची ने पूछा कि यदि विधानमंडल चुप रहे और जादू-टोने को धर्म बताया जाए, तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी? जस्टिस नागरत्ना ने यह भी सवाल उठाया कि मूल याचिकाकर्ता ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, तो क्या वे इस परंपरा को चुनौती दे सकते हैं?

फिलहाल सुनवाई जारी है और पूरे देश की निगाहें इस ऐतिहासिक फैसले पर टिकी हैं।

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