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Saturday, March 7, 2026

चेतना का श्रृंगार नहीं: पूर्णिमा के प्रकाश में साक्षी भाव का रहस्य

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श्रृंगार तो जड़ का होता है चेतना का नहीं,चेतना ही ईश्वर का स्वरूप है:

कार्तिक पूर्णिमा विशेष/लेख

चेतना का श्रृंगार कोई नहीं कर सकता, क्योंकि चेतना स्वयं पूर्ण है। श्रृंगार तो अपूर्णता की खोज है, और जो पूर्ण है उसे किसी सजावट की आवश्यकता नहीं। जब हम किसी वस्तु, रूप या देह को सजाते हैं—वह आत्मा का नहीं, जड़ का स्पर्श है। चेतना न तो रूप मांगती है, न आभूषण; वह निर्लिप्त, निराकार, और प्रकाशमान है। उसमें कोई जोड़-घटाव नहीं, केवल साक्षी भाव है।

यह साक्षी भाव ही ईश्वर का प्रतिबिंब है। जब देह इच्छाओं से भारी होती है—तब सूक्ष्म चेतना उसके भीतर बंधन अनुभव करती है। परंतु इच्छाओं के मिटते ही चेतना फिर स्वतंत्र उड़ान भरती है। शरीर मिटता है, चेतना नहीं। वह तो मौन के पार की एक अनहद ध्वनि है, जो स्वयं को और ब्रह्मांड को एक साथ जानती है। देह जहां समाप्त होती है, वहां से चेतना का नृत्य आरंभ होता है।

विज्ञान देह का विश्लेषण करता है; धर्म चेतना का। दोनों अपने-अपने मार्गों से सत्य की खोज करते हैं, पर उस क्षण जब अनुभव की सीमा से पार जाना होता है, वहां दोनों रुक जाते हैं। चेतना की अनुभूति किसी प्रमाण की मोहताज नहीं—वह स्वयं प्रमाण है। तत्व चाहे पांच कहो या सौ, चेतना उन्हें प्रत्यक्ष करती है, और स्वयं अछूती रहती है। यही उसका परम रहस्य है।

जब सूर्य उगता है, चेतना जागृत होती है। जब रात उतरती है, वह सुषुप्ति में चली जाती है। क्या यह नहीं दर्शाता कि हमारी चेतना का संबंध किसी सार्वभौमिक प्रकाश से है? शायद सूर्य, ईश्वर का वह दृश्यमान रूप है जो चेतना को ऊर्जा देता है। वह भीतर भी है, बाहर भी—और जब उसकी किरण भीतर उतरती है, तब मनुष्य तत्व नहीं, तेज बन जाता है—जड़ नहीं, जागरण।

अस्वीकरण:यह लेख विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक, दार्शनिक और अनुभव-आधारित चिंतन पर आधारित है। इसे किसी भी धार्मिक या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

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