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Tuesday, October 20, 2026

धर्म और राजनीति का द्वंद्व — धर्म बनाम कानून (एक चर्चा)

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धर्म, राजनीति और कानून — न्याय की कसौटी पर आस्था है या राजनीति का जलवा!?यह एक जनता के लिए यक्ष प्रश्न है।

डिजिटल डेस्क, रविवारीय विशेष_ 22/02/2026

जन चौपाल’ 36 की ताजा कड़ी में ज्योतिपति और ज्वाला के बीच हुई चर्चा इसी कश्मकश को उजागर करती है।वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में धर्म और सत्ता के बीच का संघर्ष एक नए मोड़ पर खड़ा है। जहाँ एक ओर आस्था का प्रश्न है तो दूसरी ओर कानून और राजनीति की बिसात।

राजनीति का ‘चूल्हा’ और धर्म का ‘बवंडर’ किसकी आंच होगी तेज।

चर्चा की शुरुआत करते हुए ज्वाला ने राजनीति और धर्म की तुलना बड़े ही सटीक रूपकों से की। ज्वाला का मानना है कि राजनीति वह ‘गर्म चूल्हा‘ है जिस पर हर कोई अपने स्वार्थ की रोटियां सेंक रहा है और ‘भ्रष्टाचार के घी’ लगा लगा कर खा रहा है।यह विसंगतियों की ओर इशारा करता है जो व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रही हैं।

दूसरी ओर, ज्योतिपति ने स्पष्ट किया कि धर्म एक ऐसा ‘बवंडर’ है जो इस राजनीतिक आग को शांत भी कर सकता है और भड़का भी। उनका तर्क है कि धर्म जन्म से जुड़ा संस्कार है, जबकि राजनीति वयस्क होने (18 वर्ष) के बाद का चुनाव। इस अंतर के कारण ही धर्म का प्रभाव राजसत्ता से कहीं अधिक गहरा और व्यक्तिगत होता है।

असली बनाम नकली: पहचान का संकट
संवाद में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान का भी उल्लेख हुआ जिसमें उन्होंने भारत के सभी नागरिकों को सांस्कृतिक रूप से ‘हिंदू’ बताया था।

ज्योतिपति और ज्वाला के बीच इस बात पर सहमति दिखी कि आज के सूचना क्रांति और विज्ञापनों के युग में असली और नकली की पहचान करना कठिन हो गया है। सूचनाओं की बाढ़ में सत्य अक्सर कहीं दब जाता है।

ज्योतिपति का कहना है कि,
“राजसत्ता से बड़ी धर्म सत्ता है और धर्म सत्ता से बड़ी ईश्वरीय सत्ता, लेकिन अंततः दोनों ही ईश्वरीय सत्ता न्याय के अधीन हैं।” —

न्यायिक प्रक्रिया और वर्तमान विवाद
चर्चा का मुख्य केंद्र ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के विरुद्ध हालिया अदालती आदेश रहा। विदित हो कि जिला अदालत (एडीजे पॉक्सो एक्ट) ने उनके और उनके शिष्य के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।

ज्वाला का तर्क: उन्होंने इस कार्रवाई के ‘समय’ पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि मामला पुराना है, तो अब सक्रियता दिखाना राजनीतिक प्रतिशोध जैसा प्रतीत हो सकता है। उन्होंने शंकराचार्य के उस पक्ष को भी रखा जिसमें शिकायतकर्ता की पृष्ठभूमि पर सवाल उठाए गए हैं।

ज्योतिपति का रुख: उन्होंने तटस्थता बरतते हुए कहा कि न्यायालय साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर चलता है। जो सत्य होगा, वह कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सामने आएगा ही।

लेकिन,
बटुकों के साथ दुर्व्यवहार: एक अनुत्तरित प्रश्न
संवाद के अंत में ज्वाला ने एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दे को उठाया—मेला क्षेत्र में बटुकों (बालकों) और बुजुर्गों के साथ कथित दुर्व्यवहार चोटी पकड़ घसीटना।

ज्वाला ने प्रश्न किया कि जब सनातन परंपरा के वाहक छोटे बच्चों के साथ अमानवीय व्यवहार होता है, तो वह व्यवस्था और समाज की चुप्पी पर सवाल खड़े करता है। क्या कानून का तराजू सबके लिए बराबर है? क्या धर्म की रक्षा की बात करने वाले इन मासूमों के अधिकारों पर मौन रहेंगे?

चर्चा का अंतिम निष्कर्ष
धर्म और राजनीति का यह युद्ध नया नहीं है, लेकिन 78 वर्षों की संवैधानिक यात्रा के बाद भी हम वहीं खड़े हैं जहाँ आस्था और कानून के बीच की लकीर धुंधली पड़ जाती है। देश का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि राजसत्ता और धर्म सत्ता अपने अंतर्विरोधों को सुलझाकर लोक-कल्याण के मार्ग पर कैसे साथ चलती हैं।

न्याय की प्रतीक्षा सबको है, क्योंकि अंततः ‘सत्यमेव जयते’ ही हमारा राष्ट्रीय आदर्श है।



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