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Wednesday, October 28, 2026

तोता, ज्ञान और पायदान: इंद्रप्रस्थ अब जनता देख रही

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28 अक्टूबर 2026/ व्यंग्य लेख

जब वोट देना नागरिक का कर्तव्य है, तो देश के हक में बोलना भी तो नागरिक धर्म है ना?

मंच पर दो दोस्त—ज्योतिपति और ज्वाला—बैठे हैं। ज्योतिपति गंभीर मुद्रा में अखबार पढ़ रहे हैं और ज्वाला हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए टहल रहा है। माहौल में थोड़ी राजनीतिक गरमाहट है।)

ज्वाला: (चाय की चुस्की लेते हुए, अचानक रुककर) ज्योतिपति जी, एक बात बताइए… वो जो सामने पायदान रखा है, उसे देखकर आपको क्या लगता है?

ज्योतिपति: (अखबार से चश्मा नीचे करते हुए) यही कि जूते साफ़ करके अंदर आओ! इसमें क्या रॉकेट साइंस है?

ज्वाला: अरे हुज़ूर! यथार्थ के धरातल पर आइए। आजकल जमाना बदल गया है! समाज में ज्ञान और विचार वाला ‘मस्तिष्क’ तो पीछे छूट गया है, लोग पायदान को सिर पर उठाकर घूम रहे हैं! अब मेरी समझ में यह जटिलता नहीं आ रही कि जो चीज़ पैरों के नीचे होनी चाहिए, वो सिर का ताज कैसे बन गई?

ज्योतिपति: (हँसते हुए) अरे ज्वाला, इसे ही तो आज की ‘कुशल कारीगरी’ कहते हैं! पायदान बनाने के लिए ज्ञान और कुशलता दोनों चाहिए। पर आज का ‘ज्ञान कुमार’ असमंजस में है कि वो कारीगर है या पायदान!

ज्वाला: ज्ञान कुमार? अरे ज्योतिपति जी, ज्ञान कुमार अब रहा कहाँ!

ज्योतिपति: सही पकड़े हो! राजनीति आज की वो षोडशी कन्या है, जिसके धन और धर्म दोनों गुलाम हैं। याद करो, पुरानी राष्ट्रीय सरकार के समय आरोप लगता था—’कोई तोता है, तो कोई पुतला!’ अब ज़रा अपने छत्तीसगढ़ में ही देख लो… सरकार खुद खुलेआम शराब बेच रही है! यहाँ ज्ञान कुमार किधर बैठा है? कहीं वो खुद ही तो दो पैग मारकर नशे में धुत नहीं पड़ा है?

ज्वाला: (नाटकीय अंदाज़ में गाते हुए) बिल्कुल! बोलोगे तो कह देगा—“मुझको यारों माफ करना, मैं नशे में हूँ!” भाई साहब, चारों तरफ नशे का ही तो आलम है! अब किसे होश है, ज़रा मेरे सामने तो लाओ! जगह-जगह सरकारी संरक्षण में दुकानें खुल रही हैं, बार-बार बार खुल रहे हैं, और बार-बालाएँ नचाई जा रही हैं।

ज्योतिपति: और जो शिखर पर बैठे देश के रखवाले हैं—चाहे चुनाव आयोग हो या सुप्रीम कोर्ट—सब समंदर की गहराई नापना भूलकर सिर्फ राजनीति की लहरों में छपाक-छपाक खेल रहे हैं! कभी-कभी तो लहरों का मज़ा भी ले रहे हैं। छई छपा छई/छपाक छई।

ज्वाला: (तपाक से) लहरों से याद आया ज्योतिपति जी! हमारे पूर्व सेना प्रमुख साहब को अब जाकर याद आ रहा है कि चीन अरुणाचल के रास्ते 5-6 किलोमीटर अंदर घुस आया है!

ज्योतिपति: (चुटकी लेते हुए) वाह भाई वाह! जब पद पर थे, तब ‘सब चंगा सी!’ पद से हटते ही देशभक्ति का गिटार बजने लगा! यह देशभक्ति का कौन सा नया मापदंड है भाई? पद पर रहो तो देशभक्त गायब, और रिटायर्ड हुए नहीं कि राग मल्हार शुरू!

ज्वाला: और सुनिए, पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी भी अब खुलासा कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति सरकार की मर्जी से होती रही है!

ज्योतिपति: (गंभीर होकर) अब सोचो ज्वाला… न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका—सब जब एक ही हथेली में समा जाएँ, और वो हाथ भी ढीला पड़ जाए, तो जनता क्या करेगी? लेकिन भैया, यह भारत की पब्लिक है, सब जानती है! सोई ज़रूर दिखती है, पर देश को बचाना इसी को आता है।

ज्वाला: सही बात है ज्योतिपति जी। अगर बात देश पर आए, तो पार्टी-वार्टी सब किनारे! देश रहेगा तभी तो पार्टियाँ रहेंगी। पूर्व प्रधानमंत्री जी ने भी संसद में यही कहा था कि ‘सरकारें आएँगी-जाएँगी, मगर देश रहना चाहिए।’

ज्योतिपति: अरे ज्वाला, वो दौर अलग था! आज के नेताओं के लिए सत्ता ही वो चमचमाता रास्ता है जो सीधा ‘इंद्रप्रस्थ’ की ओर जाता है! जहाँ इंद्र का दरबार है, मखमली गलीचे हैं, ऊँची-ऊँची मीनारें हैं और अप्सराओं का नाच है!

ज्वाला: (हँसते हुए) वैसे एक बात है… पौराणिक कथाओं में इंद्र लक्ष्मी को नहीं खरीद पाए थे, इसलिए लक्ष्मी जी विष्णु जी के पास चली गईं। पर आज की लक्ष्मी ने विष्णु जी को त्याग दिया है और सीधे इन राजनेताओं की तिजोरियों में आकर सिमट गई है! कब होगा अवतार।

ज्योतिपति: क्या ज्वाला देख नहीं नेता अपने आपको अवतार बताने लग गए और जनता? बेचारी चुप है! देश कर्ज के बोझ तले दबा है, मीडिया कहती है कि हम मांस निर्यात में दूसरे नंबर पर हैं… सब बातें चल रही हैं, पर जनता मौन है।

ज्वाला: पर चुप क्यों रहें? जब वोट देना नागरिक का कर्तव्य है, तो देश के हक में बोलना भी तो नागरिक धर्म है ना?

ज्योतिपति: बात तो पते की है ज्वाला, लेकिन ये राष्ट्रीय मुद्दे हैं। हमें मूकदर्शक भी नहीं बनना और ‘अंधभक्त’ भी नहीं बनना! अंधभक्त बनते ही आदमी का विवेक मर जाता है, और ‘ज्ञान कुमार’ घटकर ‘ज्ञान दास’ बन जाता है!

ज्वाला: (ठंडी सांस भरते हुए) और आज इसी ‘ज्ञान दास’ का बोलबाला है। जो ज्ञान कभी सिर का ताज था, वो आज चौखट पर पड़ा धूल खा रहा है और अपने स्वामी का इंतज़ार कर रहा है।

ज्योतिपति: (सहानुभूति से मुस्कुराते हुए) बिल्कुल सही समझे ज्वाला। एक कुशल कारीगर अपने ज्ञान से पायदान तो बना सकता है, पर व्यवस्था की बदनसीबी देखिए कि वो पायदान को सिर पर लादकर घूम रही है! सरकार और समाज को उस कारीगर यानी ‘ज्ञान’ की इज़्ज़त करनी चाहिए, न कि पैरों तले कुचले जाने वाले पायदान की!

(दोनों एक-दूसरे को देखते हैं, चाय का आखिरी घूँट पीते हैं और ज्ञान का पर्दा गिरता है।)
👉लेखक: दीपक पाण्डेय 📞9826157101
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