30.1 C
Raipur
Friday, October 23, 2026
Home Blog Page 5

रामलीला के दौरान भड़की आग, हनुमान का किरदार निभा रहा युवक समेत 3 लोग झुलसे

 धमतरी। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में दशहरा उत्सव के दौरान आयोजित रामलीला में बड़ा हादसा हो गया। नगरी क्षेत्र के छिपली गांव में आग के करतब के दौरान अचानक लपटें भड़क उठीं, जिसकी चपेट में आकर हनुमान की भूमिका निभा रहे युवक समेत तीन लोग झुलस गए। घायलों को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इनमें हेमंत ध्रुव की हालत गंभीर बताई जा रही है।

आग की लपटों ने मचाई अफरा-तफरी

जानकारी के अनुसार, छिपली गांव में दशहरा के अवसर पर रामलीला का मंचन किया जा रहा था। इसी दौरान आग से जुड़े करतब के बीच अचानक लपटें तेज हो गईं। देखते ही देखते आग ने मंचन में शामिल कलाकारों को अपनी चपेट में ले लिया।इस घटना में हनुमान का किरदार निभा रहे हेमंत ध्रुव सहित तीन लोग झुलस गए। अचानक आग भड़कने से कार्यक्रम स्थल पर मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई। वहां मौजूद लोगों ने खुद को बचाने के लिए इधर-उधर भागना शुरू कर दिया।

फ्लेमेबल स्प्रे बना हादसे की वजह

प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, रावण दहन के दौरान कुछ लोग ज्वलनशील स्प्रे का इस्तेमाल कर आग का करतब दिखा रहे थे। इसी दौरान स्प्रे से निकली आग अनियंत्रित हो गई और रामलीला में शामिल कलाकार इसकी चपेट में आ गए।हालांकि, हादसे की पूरी परिस्थितियों और आग लगने के सटीक कारणों की पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही हो सकेगी।

हेमंत ध्रुव की हालत गंभीर, अस्पताल में उपचार जारी

हादसे में घायल तीनों लोगों को इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। हनुमान की भूमिका निभा रहे हेमंत ध्रुव को गंभीर हालत में सिविल अस्पताल नगरी में भर्ती कराया गया है। अन्य घायलों का भी उपचार किया जा रहा है।

घटना का वीडियो सामने आने के बाद सुरक्षा पर सवाल

इस हादसे का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें आग की लपटें तेजी से फैलती दिखाई दे रही हैं। कुछ ही पलों में कई लोग आग की चपेट में आ जाते हैं और बचने के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं। घटना के बाद मौके पर मौजूद लोगों के बीच भगदड़ जैसी स्थिति बन गई।इस हादसे ने धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में ज्वलनशील पदार्थों के इस्तेमाल तथा सुरक्षा इंतजामों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे कार्यक्रमों में आग से जुड़े करतब दिखाते समय पर्याप्त दूरी, अग्निशमन उपकरण और प्रशिक्षित कर्मियों की मौजूदगी सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।

मीना बाजार में दर्दनाक हादसा, आकाश झूले से गिरकर युवक की मौत, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

 रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के खरसिया स्थित मीना बाजार में एक दर्दनाक हादसे में युवक की जान चली गई। परिवार के साथ मेला घूमने पहुंचे युवक की आकाश झूले से गिरने के बाद उपचार के दौरान मौत हो गई। मृतक की पहचान पठान पारा निवासी नकुल निषाद के रूप में हुई है। घटना के बाद परिजनों और मेले में मौजूद लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। हादसे ने मेले में संचालित झूलों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

झूले में अचानक लगा झटका, नीचे गिरा युवक

यह घटना खरसिया थाना क्षेत्र की बताई जा रही है। जानकारी के मुताबिक, नकुल अपने परिवार के साथ मीना बाजार घूमने पहुंचा था। इसी दौरान आकाश झूले में अचानक झटका लगा, जिसके बाद वह नीचे गिर गया। गिरने से युवक को गंभीर चोटें आईं।

हादसे के बाद घायल नकुल को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। घटना की खबर मिलते ही परिवार में मातम छा गया। मेले में मौजूद लोगों के बीच भी हादसे को लेकर चर्चा और आक्रोश का माहौल बन गया।

झूले की सुरक्षा को लेकर पहले भी उठे थे सवाल

घटना के बाद झूले के संचालन और सुरक्षा इंतजामों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, झूले की व्यवस्था को लेकर पहले भी आपत्ति जताई गई थी। ऐसे में हादसे के बाद यह जांच करना महत्वपूर्ण हो गया है कि झूले का संचालन निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप हो रहा था या नहीं।

दूसरी ओर, पुलिस का कहना है कि युवक शराब के नशे में था और झूले पर नाच रहा था। पुलिस के मुताबिक, इसी दौरान संतुलन बिगड़ने से वह नीचे गिर गया। हालांकि, हादसे के वास्तविक कारणों और सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों का निर्धारण जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगा।

परिजनों ने झूला संचालक पर लगाए आरोप

घटना के बाद मृतक के परिजनों ने झूला संचालक के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। मामले की शिकायत खरसिया चौकी में दर्ज कराई गई है। परिजन हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। जांच में हादसे की परिस्थितियों, झूले के संचालन और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े पहलुओं की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।

हादसे ने मेले की सुरक्षा व्यवस्था पर खड़े किए सवाल

मीना बाजार में हुई इस घटना ने मनोरंजन के लिए लगाए जाने वाले झूलों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ऐसे आयोजनों में झूलों की तकनीकी जांच, संचालन के दौरान निगरानी और सुरक्षा नियमों का पालन बेहद जरूरी है। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि युवक की मौत किन परिस्थितियों में हुई और इस मामले में किसकी जिम्मेदारी बनती है।

छत्तीसगढ़ में धूमधाम से मना दशहरा, कहीं 50 फीट के रावण का दहन तो कहीं हादसे ने फीकी की खुशियां

 धमतरी/बलरामपुर/बेमेतरा/एमसीबी। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में विजयादशमी का पर्व उत्साह और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। धमतरी में पहली बार एकलव्य मैदान में 50 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया, जबकि बलरामपुर के रामानुजगंज में भी भव्य आतिशबाजी के बीच रावण दहन हुआ। एमसीबी जिले के चिरमिरी स्थित कोरिया कॉलरी में तालाब के बीच बने टापू पर रावण जलाया गया। वहीं, बेमेतरा जिले में दशहरा देखकर लौट रहे ग्रामीणों से भरा ट्रैक्टर पलट गया। हादसे में 12 लोग घायल हो गए, जिनमें कुछ को गंभीर चोटें आई हैं।

धमतरी में पहली बार एकलव्य मैदान में हुआ रावण दहन

धमतरी में इस बार दशहरा उत्सव के आयोजन स्थल में बदलाव देखने को मिला। नगर निगम की ओर से पहले विंध्यवासिनी मंदिर के पीछे स्थित गौशाला मैदान में रामलीला और रावण दहन कराया जाता था। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा से शहरवासियों की गहरी भावनाएं जुड़ी हुई हैं। हर साल बड़ी संख्या में लोग परिवार के साथ यहां पहुंचकर रामलीला देखते और रावण दहन के साक्षी बनते थे।

इस बार आयोजन स्वर्गीय विष्णु हिरवानी एकलव्य खेल मैदान में किया गया। यहां 50 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन हुआ। स्थान बदलने के बावजूद लोगों का उत्साह बरकरार रहा और हजारों की संख्या में शहरवासी कार्यक्रम में शामिल हुए।

तीन दशक से रामलीला की परंपरा को आगे बढ़ा रही अछोटा की मंडली

धमतरी के दशहरा उत्सव में रामलीला का मंचन भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा। अछोटा की भूले-बिसरे रामलीला मंडली करीब 30 वर्षों से इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ा रही है। मंडली के कलाकार भगवान श्रीराम के जीवन, उनके आदर्शों और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश मंचन के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते हैं।

आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते विकल्पों के बीच पारंपरिक रामलीला का लगातार आयोजन क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का महत्वपूर्ण प्रयास है। स्थानीय कलाकारों की भागीदारी से नई पीढ़ी को भी धार्मिक कथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है।

महापौर रामू रोहरा ने जताया उत्साह, अगले साल होंगे सांस्कृतिक कार्यक्रम

दशहरा आयोजन के दौरान धमतरी के महापौर रामू रोहरा भी उत्साह में नजर आए। उन्होंने कार्यक्रम को लेकर खुशी जाहिर की और बताया कि इस बार उनका उत्साह इतना अधिक था कि वे खुद आतिशबाजी करने लगे।

महापौर ने अगले वर्ष आयोजन को और व्यापक रूप देने की योजना भी साझा की। उन्होंने कहा कि आने वाले साल से नवरात्र के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। इस पहल से धार्मिक उत्सव के साथ शहर की सांस्कृतिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

रामानुजगंज में प्रतिमा विसर्जन के बाद हुआ रावण दहन

बलरामपुर जिले के रामानुजगंज में विजयादशमी पर धार्मिक उत्साह के बीच रावण दहन का आयोजन किया गया। शारदीय नवरात्र के समापन पर मां दुर्गा की प्रतिमाओं को विदाई देने के बाद आतिशबाजी के साथ रावण के पुतलों का दहन किया गया।

शहर में हाई स्कूल मैदान और कन्हर नदी के तटवर्ती क्षेत्र में रावण दहन की तैयारियां की गई थीं। प्रतिमा विसर्जन के बाद निर्धारित स्थलों पर आयोजन संपन्न हुआ। इस दौरान शहर के साथ आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। आतिशबाजी और रावण दहन देखने के लिए दोनों स्थानों पर लोगों की भीड़ जुटी रही।

एमसीबी में तालाब के बीच बने टापू पर जलाया जाता है रावण

एमसीबी जिले के चिरमिरी स्थित कोरिया कॉलरी में दशहरा उत्सव की एक खास परंपरा देखने को मिलती है। यहां तालाब के बीच बने ऊंचे टापूनुमा स्थान पर रावण का पुतला स्थापित किया जाता है और फिर उसका दहन किया जाता है।

इस अनोखे दृश्य को देखने के लिए दूर-दराज के इलाकों से भी लोग पहुंचते हैं। करीब 50 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने यहां के दशहरा उत्सव को विशिष्ट पहचान दी है। तालाब के बीच ऊंचाई पर स्थापित रावण के पुतले का दहन लोगों के लिए खास आकर्षण बना रहता है।

बेमेतरा में दशहरा देखकर लौट रहे ग्रामीणों का ट्रैक्टर पलटा, 12 घायल

बेमेतरा जिले में दशहरा उत्सव से लौट रहे ग्रामीणों के लिए घर वापसी का सफर हादसे में बदल गया। नवागढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम साल्हेघोरी में दशहरा देखकर लौट रहे लोगों से भरा ट्रैक्टर अचानक पलट गया। हादसे के बाद घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई।

प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, ट्रैक्टर में करीब 40 लोग सवार थे। दुर्घटना में 12 लोग घायल हुए, जिनमें कुछ को गंभीर चोटें आई हैं। सभी घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उनका इलाज जारी है।

घटना के बाद अस्पताल में उपचार की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि नवागढ़ अस्पताल में कुछ घायलों को जमीन पर लिटाकर इलाज किया गया। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी के आधार पर नहीं की जा सकती।

खुशियों के पर्व पर सुरक्षा और बेहतर व्यवस्थाओं की जरूरत

छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में दशहरा उत्सव ने धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और पारंपरिक आयोजनों की जीवंत तस्वीर पेश की। कहीं रामलीला और रावण दहन ने लोगों को आकर्षित किया, तो कहीं वर्षों पुरानी परंपराओं ने उत्सव को खास बनाया। लेकिन बेमेतरा में हुआ हादसा सार्वजनिक आयोजनों के दौरान सुरक्षित परिवहन और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था की अहमियत भी सामने लाता है। ऐसे आयोजनों में लोगों की सुरक्षित आवाजाही और समय पर उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी है।

79 साल का इंतजार खत्म, रावघाट पहुंची ट्रेन, बस्तर के विकास को मिलेगी नई रफ्तार

 नारायणपुर: बस्तर संभाग के दूरस्थ इलाकों में रेल संपर्क का सपना अब हकीकत में बदलता दिखाई दे रहा है। कांकेर और नारायणपुर क्षेत्र के लोगों का दशकों पुराना इंतजार उस समय खत्म हुआ, जब रायपुर से रवाना हुई पैसेंजर ट्रेन रावघाट पहुंची। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव भी वर्चुअल माध्यम से कार्यक्रम में शामिल हुए। ट्रेन के पहुंचने पर स्थानीय ग्रामीणों ने तालियों और उत्साह के साथ उसका स्वागत किया।

मुख्यमंत्री ने दिखाई हरी झंडी, ग्रामीणों ने किया भव्य स्वागत

रावघाट रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के पहुंचने का दृश्य स्थानीय लोगों के लिए यादगार बन गया। फूलों से सजी पैसेंजर ट्रेन जैसे ही स्टेशन पर पहुंची, वहां मौजूद लोगों ने तालियां बजाकर इस ऐतिहासिक पल का स्वागत किया। यात्रियों का भी ग्रामीणों ने गर्मजोशी से अभिनंदन किया।

इस आयोजन में क्षेत्र के लोगों की खुशी साफ नजर आई। लंबे समय से रेल सेवा शुरू होने की उम्मीद लगाए बैठे ग्रामीणों के लिए यह केवल एक ट्रेन का पहुंचना नहीं, बल्कि बेहतर आवागमन और विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

फूलों से सजा स्टेशन, उत्सव में बदला माहौल

नारायणपुर जिले की सीमा के निकट ग्राम सरंगीपाल स्थित नवनिर्मित रेलवे स्टेशन को इस खास अवसर के लिए सजाया गया था। स्टेशन परिसर में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला। पैसेंजर ट्रेन की बोगियों को गेंदे के फूलों से सजाया गया था। ट्रेन के पहुंचने के साथ ही लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था।

स्थानीय निवासियों के अनुसार, उन्होंने अपने बुजुर्गों से इस क्षेत्र में रेल सेवा शुरू होने की चर्चा सुनी थी। अब जब ट्रेन उनके इलाके तक पहुंची है, तो वर्षों से देखा जा रहा सपना पूरा होने की खुशी उनके चेहरों पर दिखाई दी। युवाओं ने भी ट्रेन की बोगियों में जाकर इस नई सुविधा को करीब से देखा।

कम किराये में रायपुर पहुंचना होगा आसान

रेल सेवा शुरू होने से स्थानीय लोगों को आवागमन के खर्च में राहत मिलने की उम्मीद है। क्षेत्र के कई युवा रोजगार की तलाश में रायपुर और दूसरे शहरों का रुख करते हैं। अब तक उन्हें यात्रा के लिए अधिक किराया खर्च करना पड़ता था। ट्रेन की सुविधा से उनकी यात्रा अपेक्षाकृत सस्ती और सुविधाजनक हो सकती है।

इसका लाभ छात्रों, छोटे कारोबारियों और रोजमर्रा के काम से बाहर जाने वाले लोगों को भी मिलने की संभावना है। कम खर्च में यात्रा कर पाने से लोगों का समय और पैसा दोनों बच सकते हैं। शिक्षा, नौकरी और व्यापार से जुड़े कामों के लिए बड़े शहरों तक पहुंचना भी पहले के मुकाबले आसान हो सकता है।

किसानों और कारोबारियों को मिलेगा फायदा

रावघाट तक रेल संपर्क पहुंचने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है। किसान अपनी उपज को बड़े बाजारों तक पहुंचाने के बेहतर विकल्प तलाश सकेंगे। वहीं, कृषि उपकरण, खाद, बीज और दूसरी जरूरी वस्तुओं की खरीदारी के लिए रायपुर जाने वाले किसानों को भी राहत मिल सकती है।

पहले खरीदारी और आवागमन में काफी समय लग जाता था। बेहतर रेल सुविधा उपलब्ध होने से यात्रा की योजना बनाना आसान होगा। छोटे व्यापारियों के लिए भी सामान लाने-ले जाने और नए बाजारों तक पहुंच बनाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

दूरस्थ गांवों तक जरूरी सुविधाएं पहुंचने की उम्मीद

रेल संपर्क का महत्व केवल यात्रियों की आवाजाही तक सीमित नहीं है। इसके विस्तार से दवाओं, दैनिक उपयोग की वस्तुओं और अन्य जरूरी सामानों की आपूर्ति को भी लाभ मिल सकता है। बेहतर परिवहन व्यवस्था दूरस्थ इलाकों को बड़े शहरों से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकती है।

हालांकि, इन लाभों को व्यापक स्तर पर हासिल करने के लिए रेल सेवा के साथ सड़क संपर्क, स्थानीय बाजार और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विकास भी जरूरी होगा। इन व्यवस्थाओं के बेहतर होने से क्षेत्र के अधिक गांवों तक विकास के अवसर पहुंच सकते हैं।

बस्तर में रेल विस्तार से विकास की नई उम्मीद

लंबे समय तक नक्सलवाद और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण बस्तर के कई इलाकों में बुनियादी ढांचे का विकास कठिन रहा। अब क्षेत्र में रेल संपर्क के विस्तार से स्थानीय लोगों को भविष्य में बेहतर कनेक्टिविटी और आर्थिक प्रगति की उम्मीद है।

रेल नेटवर्क के विस्तार से लोगों की आवाजाही के साथ व्यापार, कृषि और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को भी प्रोत्साहन मिल सकता है। इससे दूरस्थ इलाकों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में मदद मिलेगी।

जनप्रतिनिधियों ने बताया क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि

कांकेर के सांसद भोजराज नाग और अंतागढ़ के विधायक विक्रम उसेंडी ने रेल परियोजना को क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने इस पहल के लिए केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त किया।

जनप्रतिनिधियों के अनुसार, रेल संपर्क से कांकेर जिले के अंतागढ़ क्षेत्र और नारायणपुर जिले की सीमा से लगे गांवों को बड़े शहरों तक पहुंचने में सुविधा मिल सकती है। इससे स्थानीय लोगों के लिए शिक्षा, रोजगार और व्यापार के नए रास्ते खुलने की संभावना है।

79 साल का इंतजार बना विकास की नई उम्मीद

रावघाट तक पैसेंजर ट्रेन का पहुंचना स्थानीय लोगों के लिए लंबे समय से देखे जा रहे सपने के पूरा होने जैसा है। इस रेल सुविधा से क्षेत्र में आवागमन के नए विकल्प उपलब्ध होंगे और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की उम्मीद बढ़ेगी।

अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि इस रेल संपर्क का लाभ कितने व्यापक स्तर पर स्थानीय आबादी तक पहुंचता है। यदि परिवहन के साथ दूसरी बुनियादी सुविधाओं का भी विस्तार होता है, तो रावघाट और आसपास के दूरस्थ इलाकों में विकास की नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।

किसान परिवार के देवव्रत सिन्हा ने चुनी अलग राह, घर में बनाई AI लैब, अब धमतरी के बच्चों को सिखा रहे भविष्य की तकनीक

 धमतरी : छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के मगरलोड निवासी देवव्रत सिन्हा ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद नौकरी की पारंपरिक राह के बजाय तकनीकी नवाचार को अपना लक्ष्य बनाया। किसान परिवार से आने वाले देवव्रत ने घर पर ही आधुनिक तकनीक सीखी और अपनी मेहनत से आईटी तथा एआई लैब तैयार की। अब वे रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कोडिंग, ड्रोन और 3D प्रिंटिंग जैसी तकनीकों से स्कूली बच्चों को परिचित करा रहे है। उनका सपना अपने जिले में हजारों ऐसे युवा तैयार करना है, जो नई तकनीक विकसित करने और अनुसंधान के क्षेत्र में योगदान दे सकें।

बीटेक के बाद नौकरी के बजाय चुना तकनीकी नवाचार का रास्ता

देवव्रत सिन्हा की इंजीनियरिंग की पढ़ाई कोरोना काल के लॉकडाउन के दौरान हुई। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आधुनिक तकनीकों को खुद समझना शुरू किया। धीरे-धीरे रोबोटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), मशीन लर्निंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और वेबसाइट डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई। इसी रुचि को उन्होंने अपने काम का आधार बना लिया।परिवार चाहता था कि देवव्रत सरकारी नौकरी की तैयारी करे, लेकिन उन्होंने तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ने का फैसला किया। उनका मानना है कि सरकारी सेवा के साथ-साथ तकनीकी अनुसंधान और नवाचार भी देश के विकास के लिए जरूरी है।देवव्रत का कहना है कि यदि सभी युवा केवल सरकारी नौकरी की तैयारी में जुटे रहेंगे, तो नई तकनीकों पर काम करने के लिए कौन आगे आएगा। वे चाहते है कि धमतरी जिले से हजारों युवा तकनीकी क्षेत्र में अपनी पहचान बनाएं और उनसे भी बेहतर उपलब्धियां हासिल करें।

STEM रोबो हब इंडिया के जरिए बच्चों को दे रहे तकनीकी शिक्षा

देवव्रत सिन्हा STEM रोबो हब इंडिया के संस्थापक है। इस पहल के माध्यम से वे बच्चों को आधुनिक तकनीक का व्यावहारिक ज्ञान देने का प्रयास कर रहे है। STEM का अर्थ साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स है।उनका उद्देश्य बच्चों को केवल किताबों में तकनीक के बारे में पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें खुद प्रयोग करने, मॉडल तैयार करने और नए आविष्कारों की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करना है। इसके लिए वे रोबोटिक्स, कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, ड्रोन तकनीक, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और 3D प्रिंटिंग जैसे विषयों पर काम कर रहे है।देवव्रत स्कूलों में जाकर बच्चों को इन तकनीकों की जानकारी देते है। सरकारी स्कूलों में भी वे कई बार प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर चुके है, ताकि आधुनिक तकनीक की शिक्षा केवल सीमित संसाधनों वाले बच्चों के लिए बाधा न बने।

आठवीं-नौवीं कक्षा से ही तकनीक से जुड़ें बच्चे

देवव्रत का मानना है कि बच्चों को आधुनिक तकनीकों से परिचित कराने के लिए कॉलेज तक इंतजार नहीं करना चाहिए। वे चाहते है कि विद्यार्थी आठवीं और नौवीं कक्षा से ही रोबोटिक्स, कोडिंग, 3D प्रिंटिंग तथा एआई जैसी तकनीकों को देखना, समझना और उन पर प्रयोग करना शुरू कर दें।उनके अनुसार, यदि बच्चे कम उम्र से ही अनुसंधान और नवाचार की दिशा में काम करने लगें, तो बारहवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते उनके पास मजबूत आधार तैयार हो सकता है। इससे उन्हें आगे की पढ़ाई और तकनीकी करियर चुनने में मदद मिलेगी।देवव्रत का मानना है कि इस पहल का लाभ केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहेगा। जब धमतरी के बच्चे तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ेंगे, तो इससे पूरे जिले को नई पहचान मिल सकती है।

तैयार किया AI ब्रेन, डेटा सुरक्षित रखने पर भी किया काम

देवव्रत के तकनीकी प्रयोगों में उनका तैयार किया गया एआई ब्रेन भी शामिल है। उनके मुताबिक, इस सिस्टम को अलग-अलग भाषाओं में बातचीत करने में सक्षम बनाने की दिशा में विकसित किया गया है। इसके साथ ही उन्होंने इसकी प्रोग्रामिंग और डेटा को सुरक्षित रखने से जुड़े पहलुओं पर भी काम किया है।देवव्रत चाहते है कि सिस्टम में मौजूद जानकारी लंबे समय तक सुरक्षित रहे। यदि डिवाइस खराब हो जाए, तो उसकी कोडिंग के आधार पर सिस्टम को दोबारा तैयार करने और डेटा को फिर से उपलब्ध कराने की संभावना पर भी उन्होंने काम किया है।उनके लिए यह प्रयोग केवल एक तकनीकी मॉडल तैयार करने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए वे यह दिखाना चाहते है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सीखने की इच्छा और लगातार प्रयोग करने की आदत से नए समाधान विकसित किए जा सकते है।

नौकरी छोड़ने के बाद पिता से नहीं ली आर्थिक मदद

देवव्रत अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी महत्वपूर्ण मानते है। उनका कहना है कि नौकरी छोड़ने के बाद से उन्होंने अपने पिता से एक रुपये की भी आर्थिक सहायता नहीं मांगी। वे अपने प्रयासों के जरिए आगे बढ़ने और अपनी कंपनी को विकसित करने में जुटे है।उनका लक्ष्य भारत को केवल तकनीक का इस्तेमाल करने वाले देश के रूप में नहीं, बल्कि नई तकनीक विकसित करने और दुनिया को ज्ञान देने वाले देश के रूप में स्थापित होते देखना है। इसी सोच के साथ वे अपनी तकनीकी पहल को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे है।

बचपन से मशीनों को खोलकर समझने की थी आदत

देवव्रत के पिता चमन कुमार सिन्हा और माता बिमला सिन्हा बताते है कि बचपन से ही उनका बेटा मशीनों और तकनीकी उपकरणों में दिलचस्पी रखता था। वह छोटे-छोटे खिलौनों को खोलकर उनके अंदर की बनावट और काम करने के तरीके को समझने की कोशिश करता था।समय के साथ यही जिज्ञासा रोबोटिक्स और आधुनिक तकनीक पर काम करने की प्रेरणा बन गई। माता-पिता के मुताबिक, देवव्रत पढ़ाई में अच्छा रहा है। उसने किसी बड़े संस्थान में जाकर विशेष प्रशिक्षण लेने के बजाय घर पर रहकर खुद सीखने और प्रयोग करने का रास्ता चुना।देवव्रत अपने काम के बारे में परिवार को जानकारी देते रहते है, हालांकि उनके कई तकनीकी प्रयोगों को समझना माता-पिता के लिए भी आसान नहीं होता। इसके बावजूद उन्हें अपने बेटे की मेहनत और कुछ नया करने की कोशिश पर गर्व है।

धमतरी कलेक्टर ने की सराहना, मगरलोड में रोबोटिक्स लैब की तैयारी

देवव्रत के प्रयासों को जिला प्रशासन का भी समर्थन मिल रहा है। धमतरी के कलेक्टर अबिनाश मिश्रा ने उनके काम की सराहना करते हुए बताया कि किसान परिवार से आने वाले देवव्रत रोबोटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और एआई जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम कर रहे है।

वे स्कूलों में बच्चों को रोबोटिक्स और 3D प्रिंटिंग की जानकारी देने के साथ सरकारी स्कूलों में प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित कर चुके है। कलेक्टर के मुताबिक, जिला प्रशासन देवव्रत के साथ मिलकर मगरलोड ब्लॉक में रोबोटिक्स लैब शुरू करने की दिशा में काम कर रहा है।

इस पहल का उद्देश्य स्कूली विद्यार्थियों तक उन्नत तकनीक की शिक्षा पहुंचाना और उन्हें नए प्रयोगों के अवसर उपलब्ध कराना है। कलेक्टर ने यह भी कहा कि जिले में प्रतिभाशाली और उत्साही युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रशासन हरसंभव प्रयास करेगा। देवव्रत जैसे युवाओं की पहल दूसरे विद्यार्थियों को भी प्रेरित कर सकती है।

भगवद्गीता की सीख से मिलती है आगे बढ़ने की प्रेरणा

देवव्रत के कार्यस्थल पर एक पोस्टर लगा है, जिस पर लिखा है, युद्ध करना तुम्हारा परम कर्तव्य है, पार्थ। वे बताते है कि भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को कर्तव्य का बोध कराने वाली सीख उन्हें लगातार काम करने की प्रेरणा देती है।

जब कभी आलस आता है या काम करने की इच्छा कम होती है, तो पोस्टर पर लिखी यह पंक्ति उन्हें अपना लक्ष्य याद दिलाती है। इसके बाद वे फिर से अपने काम में जुट जाते है।

उनके लिए तकनीक सीखना और नए प्रयोग करना केवल करियर बनाने का जरिया नहीं है। यह एक ऐसा लक्ष्य है, जिसे वे लगातार मेहनत करके आगे ले जाना चाहते है।

धमतरी से हजारों तकनीकी प्रतिभाएं तैयार करने का लक्ष्य

देवव्रत सिन्हा की कहानी एक युवा इंजीनियर के व्यक्तिगत प्रयासों से आगे बढ़कर बच्चों को नई संभावनाओं से जोड़ने की पहल भी है। वे चाहते है कि धमतरी का हर बच्चा आधुनिक तकनीक को समझे, सवाल पूछे, खुद प्रयोग करे और नई चीजें बनाने का आत्मविश्वास विकसित करे।

मगरलोड में रोबोटिक्स लैब शुरू करने की दिशा में जिला प्रशासन के प्रयास इस लक्ष्य को आगे बढ़ाने में मददगार हो सकते है। यदि स्कूली विद्यार्थियों को शुरुआती उम्र से ही तकनीकी शिक्षा और प्रयोग करने के अवसर मिलते है, तो वे भविष्य में अनुसंधान, इंजीनियरिंग और नवाचार जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ने की तैयारी कर सकते है।

किसान परिवार से निकलकर अपनी मेहनत से तकनीकी दुनिया में जगह बनाने की कोशिश कर रहे देवव्रत अब अपना ज्ञान अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते है। उनका सपना है कि धमतरी से शुरू होने वाली यह पहल दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचे और भारत नई तकनीक विकसित करने वाले देशों में अपनी मजबूत पहचान बनाए।

बस्तर दशहरा में 600 साल पुरानी मावली परघाव परंपरा का भव्य आयोजन, मां दंतेश्वरी के जयकारों से गूंजा जगदलपुर

 बस्तर : छत्तीसगढ़ के बस्तर में विश्व प्रसिद्ध दशहरा पर्व के दौरान मावली परघाव की ऐतिहासिक रस्म पूरे विधि-विधान के साथ निभाई गई। मंगलवार देर रात आयोजित इस परंपरा में बस्तर राजपरिवार ने मावली माता का स्वागत किया और मां दंतेश्वरी से देश तथा प्रदेश में सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की। इस अवसर पर जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर के कुटरू बाड़ा में दो देवियों का पावन मिलन भी हुआ।इस ऐतिहासिक आयोजन को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु जुटे। मंदिर परिसर से लेकर आसपास की सड़कों तक भक्तों की भारी भीड़ नजर आई। आतिशबाजी, फूल-मालाओं और माता के जयकारों के बीच पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूब गया। करीब छह शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा बस्तर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

राजपरिवार ने परंपरागत तरीके से किया मावली माता का स्वागत

दंतेवाड़ा से मावली माता की डोली और छत्र जगदलपुर पहुंचने पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने माता का स्वागत किया। श्रद्धालुओं ने फूल-मालाएं अर्पित कर और आतिशबाजी के जरिए अपनी आस्था प्रकट की। इस दौरान छत्तीसगढ़ की खुशहाली और जनकल्याण की कामना की गई।मान्यता है कि बस्तर रियासत के शासक लगभग 600 वर्षों से मावली माता के आगमन पर इस रस्म को विशेष सम्मान और भव्यता के साथ निभाते आ रहे है। इस आयोजन में राजपरिवार के साथ आम श्रद्धालुओं की भागीदारी भी परंपरा को जीवंत बनाए रखती है।

छह सदियों से कायम है मावली परघाव की परंपरा

मावली परघाव की शुरुआत बस्तर के तत्कालीन महाराजा रुद्र प्रताप देव के समय से जुड़ी मानी जाती है। उस दौर में देवी की डोली का भव्य स्वागत किया जाता था। समय के साथ राजशाही व्यवस्था बदल गई, लेकिन देवी के सम्मान से जुड़ी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।परंपरागत मान्यता के अनुसार, मावली माता का संबंध कर्नाटक के मलवल्य गांव से है। कहा जाता है कि छिंदक नागवंशीय शासकों के शासनकाल में देवी बस्तर पहुंची थीं। छिंदक नागवंश ने नौवीं से 14वीं शताब्दी के बीच इस क्षेत्र पर शासन किया था। इसके बाद चालुक्य शासक अन्नम देव ने बस्तर में अपना राज्य स्थापित किया और मावली देवी को कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया। देवी के प्रति आदर व्यक्त करने और उनका विधिवत स्वागत करने की परंपरा आगे चलकर मावली परघाव के रूप में स्थापित हुई।

नवमी पर डोली का स्वागत, दशहरा समाप्त होने पर होती है विदाई

बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के अनुसार, परंपरा के तहत नवमी के दिन दंतेवाड़ा से आने वाली मावली माता की डोली का स्वागत किया जाता है। राजा, राजगुरु और पुजारी नंगे पांव राजमहल से मंदिर परिसर तक पहुंचते है। वहां देवी की अगवानी और पूजा-अर्चना के बाद डोली को कंधों पर उठाकर राजमहल स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर में लाया जाता है।बस्तर दशहरा संपन्न होने तक माता की डोली राजमहल में विराजमान रहती है। पर्व के समापन के बाद पूरे सम्मान के साथ देवी को विदाई दी जाती है।

पंचमी से शुरू होती है देवी-देवताओं को आमंत्रित करने की प्रक्रिया

कमलचंद भंजदेव ने बताया कि बस्तर दशहरा में देवी-देवताओं की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए पंचमी के दिन दंतेवाड़ा जाकर निमंत्रण देने की परंपरा है। मधोता, बड़े डोंगर, छोटे डोंगर सहित अन्य स्थानों के देवी-देवताओं को भी पर्व में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है।इसी दिन मंदिर से मावली माता की डोली को सिंह द्वार के पास लाया जाता है। इसके बाद जिया बाबा को डोली लेकर पहुंचने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। पुराने समय में डोली को पैदल ही बस्तर तक लाया जाता था और निशा जात्रा के अवसर पर अष्टमी के दिन इसका आगमन होता था।

दुर्लभ वनफूलों से तैयार होता है कांटाबंद साफा

मावली परघाव की रस्म में राजपरिवार के सदस्यों के सिर पर सजा कांटाबंद साफा भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। यह साफा जंगल में मिलने वाले दुर्लभ फूलों से तैयार किया जाता है और इसे बनाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।कमलचंद भंजदेव के मुताबिक, इस साफे का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इसे नम्रता और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। माता की डोली को राजमहल लाने के दौरान इसे धारण किया जाता है।इस वर्ष तिथि दो होने के कारण माता की डोली एक दिन पहले ही पहुंच गई। हालांकि, रस्म के प्रति श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। बस्तर दशहरा समाप्त होने तक माता की डोली राजमहल में रहेगी, जिसके बाद परंपरागत विधि से उनकी विदाई की जाएगी।मावली परघाव केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी आस्था, राजपरिवार की परंपरा और स्थानीय समाज की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यही वजह है कि हर साल इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर अपनी परंपरा से जुड़ाव प्रकट करते है।

शरद पूर्णिमा 2026: चांदनी में रखी खीर कब खाएं? जानें शुभ समय, धार्मिक मान्यता और प्रसाद ग्रहण करने का सही तरीका

 शरद पूर्णिमा को हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन चंद्रमा की पूजा करने, मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु का स्मरण करने तथा रात में चांदनी के नीचे खीर रखने की परंपरा प्रचलित है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखी खीर विशेष गुणकारी हो जाती है। इस साल शरद पूर्णिमा का व्रत 25 अक्टूबर 2026, रविवार को रखा जाएगा। ऐसे में श्रद्धालुओं के बीच यह जानने की उत्सुकता रहती है कि खीर किस समय रखनी चाहिए और उसे कब ग्रहण करना शुभ माना जाता है।

चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने की क्या है मान्यता?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस रात चंद्रमा की किरणों को अमृत के समान गुणकारी माना जाता है। इसी विश्वास के चलते दूध और चावल से बनी खीर को खुले आसमान के नीचे रखा जाता है, ताकि उस पर चांदनी पड़े।कई परिवारों में इस खीर को भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। कुछ लोग इसे रात में खाते हैं, जबकि कुछ परिवारों में अगले दिन सुबह खीर खाने की परंपरा है। यह प्रथा धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

शरद पूर्णिमा पर खीर खाने का सही समय क्या है?

परंपरागत मान्यता के अनुसार, खीर को शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है। इसके बाद पूजा-अर्चना करके इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।कुछ परिवारों में खीर को पूरी रात चांदनी में रखने के बाद अगले दिन सूर्योदय से पहले खाने की परंपरा है। इस मान्यता के अनुसार, सुबह लगभग 4 बजे के आसपास खीर ग्रहण करना शुभ माना जाता है। हालांकि, यह कोई सार्वभौमिक धार्मिक नियम नहीं है। सही समय स्थानीय पंचांग, पूर्णिमा तिथि और परिवार की परंपरा के अनुसार तय किया जा सकता है।खीर को मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु को अर्पित करने के बाद परिवार के सदस्यों के बीच प्रसाद के रूप में बांटने की भी परंपरा है।

शरद पूर्णिमा की खीर का धार्मिक महत्व

शरद पूर्णिमा अश्विन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इसे कोजागर पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर कृपा करती हैं।इसी वजह से कई श्रद्धालु रात में मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं और उन्हें खीर का भोग लगाते हैं। चंद्रमा की चांदनी में खीर रखने की परंपरा भी इस पर्व की प्रमुख धार्मिक मान्यताओं में शामिल है।कुछ परिवार इस अवसर पर खुले स्थान में पानी से भरा पात्र भी रखते हैं। अगले दिन सुबह उस पानी का धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल किया जाता है। इसे भी पारंपरिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है।

खीर रखने और खाने के दौरान इन बातों का रखें ध्यान

  • खीर तैयार करने के बाद उसे साफ और सुरक्षित स्थान पर रखें।
  • चांदनी में रखने के लिए बर्तन को जाली या हल्के ढक्कन से ढकें, ताकि धूल और कीड़े उसमें न गिरें।
  • खीर को लंबे समय तक सामान्य तापमान पर रखने से उसमें बैक्टीरिया पनप सकते हैं। इसलिए रातभर बाहर रखी खीर की सुरक्षा का ध्यान रखें।
  • खीर को खाने से पहले उसकी गंध, रंग और स्थिति जांच लें। खराब होने का संदेह हो तो उसे न खाएं।
  • पूजा के बाद खीर को प्रसाद के रूप में परिवार के साथ बांट सकते हैं।

धार्मिक मान्यताओं में शरद पूर्णिमा की खीर का विशेष स्थान है, लेकिन चांदनी में रखने से उसमें औषधीय गुण बढ़ने या रोग दूर होने के दावों के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए धार्मिक परंपरा निभाने के साथ खाद्य सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है।

छत्तीसगढ़ में पुलिस स्मृति दिवस पर शहीद जवानों को नमन, सीएम विष्णुदेव साय बोले- बस्तर में स्थायी शांति और विकास हमारा संकल्प

रायपुर : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 21 अक्टूबर को पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर शहीद पुलिस जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। माना स्थित चौथी वाहिनी छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल परिसर में आयोजित स्मृति दिवस परेड में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल हुए। सभी ने शहीद स्मारक पर पुष्पचक्र और पुष्प अर्पित कर देश तथा प्रदेश की सुरक्षा में प्राण न्योछावर करने वाले जवानों को नमन किया।

शहीदों को श्रद्धांजलि, परिजनों का किया सम्मान

पुलिस स्मृति दिवस कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री ने शहीद जवानों के परिजनों से मुलाकात की। इस अवसर पर उनके त्याग और बलिदान को याद करते हुए परिजनों को सम्मानित किया गया।कार्यक्रम में पुलिस बल के उन जवानों को श्रद्धांजलि दी गई, जिन्होंने कर्तव्य निभाते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। इस आयोजन के जरिए शहीदों के साहस, समर्पण और देश के प्रति उनकी निष्ठा को याद किया गया।

सीएम विष्णुदेव साय बोले- बस्तर में स्थायी शांति के साथ विकास हमारा लक्ष्य

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि नक्सलवाद के सफाए का संकल्प पूरा हुआ है और बस्तर में विकास को अंतिम छोर तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब सरकार का प्रमुख लक्ष्य क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के साथ विकास की गति को मजबूत करना है।मुख्यमंत्री ने कानून का शासन बनाए रखने और नागरिकों की सुरक्षा को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया। उन्होंने शहीद जवानों को नमन करते हुए कहा कि सरकार शहीद परिवारों के साथ हमेशा खड़ी है।

21 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है पुलिस स्मृति दिवस?

पुलिस स्मृति दिवस हर साल 21 अक्टूबर को देशभर में मनाया जाता है। यह दिन उन पुलिसकर्मियों के बलिदान की याद में समर्पित है, जिन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।इस दिवस का ऐतिहासिक संबंध 21 अक्टूबर 1959 की घटना से है, जब लद्दाख के हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में चीनी सैनिकों के हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 10 जवान शहीद हो गए थे। उन्हीं वीर जवानों की स्मृति में यह दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई।पुलिस स्मृति दिवस पर देशभर में शहीद पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजलि दी जाती है और उनके अदम्य साहस, कर्तव्यनिष्ठा तथा सेवा भावना को याद किया जाता है। यह दिन सुरक्षा बलों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के साथ उनके योगदान और बलिदान के महत्व को भी रेखांकित करता है।

छत्तीसगढ़ में सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने से मिलेगी राहत, एक ही पोर्टल पर 939 सेवाएं, जानें कैसे बनेगा आपका काम आसान

 रायपुर। छत्तीसगढ़ में सरकारी सेवाओं तक आम लोगों की पहुंच आसान बनाने के लिए डिजिटल व्यवस्था का विस्तार किया जा रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार की सेवा सेतु पहल के जरिए नागरिकों को एक ही डिजिटल मंच पर अलग-अलग विभागों की सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में काम हो रहा है। इस प्लेटफॉर्म पर 38 विभागों की 939 शासकीय सेवाएं उपलब्ध हैं।

इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को छोटे-बड़े प्रशासनिक कार्यों के लिए बार-बार सरकारी कार्यालयों में जाने की परेशानी से राहत दिलाना है। ऑनलाइन आवेदन की सुविधा मिलने से समय और खर्च बचाने के साथ सरकारी सेवाओं की प्रक्रिया को अधिक सरल और पारदर्शी बनाने में मदद मिल सकती है।

आय, जाति और निवास प्रमाण पत्र के लिए भी सुविधा

सेवा सेतु के माध्यम से नागरिक कई जरूरी सरकारी सेवाओं के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। इनमें आय प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, विवाह पंजीयन और गुमास्ता लाइसेंस जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

इन दस्तावेजों की जरूरत विद्यार्थियों, नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं, कारोबारियों और आम नागरिकों को अलग-अलग अवसरों पर पड़ती है। शिक्षा में प्रवेश, रोजगार संबंधी प्रक्रियाओं, व्यवसाय संचालन और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए इनकी आवश्यकता होती है।

एक ही मंच पर विभिन्न सेवाएं उपलब्ध होने से नागरिकों को संबंधित विभाग की जानकारी जुटाने और आवेदन की प्रक्रिया पूरी करने में सहूलियत मिल सकती है।

प्रदेशभर में बनाए गए 16,773 सेवा केंद्र

डिजिटल सेवाओं को केवल ऑनलाइन माध्यम तक सीमित रखने के बजाय सरकार ने सेवा केंद्रों का नेटवर्क भी तैयार किया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेशभर में 16,773 सेवा केंद्र इस व्यवस्था से जुड़े हैं।

इन केंद्रों की भूमिका खासतौर पर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हो सकती है। ऐसे इलाकों में रहने वाले लोगों को कई बार सरकारी काम के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। वहीं, जिन नागरिकों को ऑनलाइन आवेदन करने में परेशानी होती है, वे सेवा केंद्रों की सहायता ले सकते हैं।

इससे डिजिटल सुविधाओं का लाभ उन लोगों तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है, जिनके पास पर्याप्त तकनीकी जानकारी या ऑनलाइन संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।

21,582 अधिकारी-कर्मचारी भी व्यवस्था से जुड़े

सेवा सेतु के संचालन के लिए केवल पोर्टल और सेवा केंद्र ही नहीं, बल्कि सरकारी अमले की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस डिजिटल व्यवस्था में 21,582 अधिकारी-कर्मचारियों को जोड़ा गया है।

इनकी भागीदारी से आवेदनों को संबंधित विभागों तक पहुंचाने, प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने और आवेदन की स्थिति पर नजर रखने में सहायता मिल सकती है।

डिजिटल रिकॉर्ड के जरिए आवेदन संबंधी जानकारी उपलब्ध रहने से कामकाज की निगरानी करना भी आसान हो सकता है। हालांकि, इस व्यवस्था का वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि आवेदनों का निपटारा कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से किया जाता है।

55 लाख से ज्यादा आवेदन, जानें क्या बताते हैं आंकड़े

सेवा सेतु पर अब तक 55 लाख 13 हजार 672 ऑनलाइन आवेदन प्राप्त होने की जानकारी दी गई है। यह संख्या बताती है कि इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से बड़ी संख्या में नागरिक सरकारी सेवाओं के लिए आवेदन कर चुके हैं।

हालांकि, प्राप्त आवेदनों की संख्या और उनके निपटारे के आंकड़े अलग-अलग होते हैं। उपलब्ध जानकारी में स्वीकृत, निरस्त और लंबित आवेदनों का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया है। इसलिए सभी आवेदनों का निराकरण हो जाने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

नागरिकों के लिए डिजिटल व्यवस्था तभी अधिक उपयोगी साबित होगी, जब आवेदन की स्थिति जानने की सुविधा के साथ तय समय में सेवा उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जाए।

ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों के लोगों को कैसे मिलेगा फायदा?

छत्तीसगढ़ के कई ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में सरकारी कार्यालयों तक पहुंचना लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। दूरी, यात्रा का खर्च और काम में लगने वाला समय आम नागरिकों की परेशानी बढ़ाते हैं।

सेवा सेतु के तहत स्थापित केंद्रों और ऑनलाइन आवेदन की सुविधा से इन समस्याओं को कम करने की संभावना है। विद्यार्थी, महिलाएं, किसान, छोटे कारोबारी और अन्य नागरिक अपनी जरूरत के अनुसार उपलब्ध सेवाओं के लिए आवेदन कर सकते हैं।

इसके लिए जरूरी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को पोर्टल की जानकारी मिले और सेवा केंद्रों पर आवेदन भरने से लेकर जरूरी दस्तावेजों की जानकारी प्राप्त करने तक उचित सहायता उपलब्ध हो।

डिजिटल सुशासन को मजबूत बनाने पर जोर

सेवा सेतु के जरिए छत्तीसगढ़ सरकार सरकारी सेवाओं को एकीकृत मंच पर उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है। इसका उद्देश्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाना, आवेदन संबंधी जानकारी तक नागरिकों की पहुंच बढ़ाना और सरकारी कामकाज में जवाबदेही को प्रोत्साहित करना है।

हालांकि, केवल सेवाओं को ऑनलाइन उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। तकनीकी समस्याओं का समाधान, आवेदन प्रक्रिया में स्पष्टता, सेवा केंद्रों की सक्रियता और समयबद्ध निराकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

सेवा सेतु की सफलता किन बातों पर निर्भर करेगी?

38 विभागों की 939 सेवाएं, 16,773 सेवा केंद्र, 21,582 अधिकारी-कर्मचारी और 55 लाख से अधिक आवेदन इस व्यवस्था के व्यापक दायरे को दर्शाते हैं। अब इसके प्रभाव का आकलन आवेदन निपटारे की गति, सेवाओं की गुणवत्ता और नागरिकों को मिलने वाली वास्तविक राहत के आधार पर किया जाना महत्वपूर्ण होगा।

यदि आवेदन प्रक्रिया आसान रहती है और लोगों को निर्धारित समय में सेवाएं मिलती हैं, तो सेवा सेतु छत्तीसगढ़ में डिजिटल सुशासन को मजबूत करने के साथ आम जनता और सरकारी तंत्र के बीच की दूरी कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

छत्तीसगढ़ के सिरपुर को मिली बड़ी पहचान, UNESCO की सूची में शामिल होते ही विश्व धरोहर बनने की उम्मीद बढ़ी

 छत्तीसगढ़ :  ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में बड़ी उपलब्धि सामने आई है। महासमुंद जिले में स्थित प्राचीन ऐतिहासिक स्थल सिरपुर को UNESCO की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल किया गया है। इस फैसले से सिरपुर के भविष्य में विश्व धरोहर स्थल बनने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। इसे राज्य के इतिहास, संस्कृति और पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

भारत सरकार ने भेजा था प्रस्ताव

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत सरकार ने 28 सितंबर 2026 को सिरपुर को UNESCO की अस्थायी विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजा था। इसके बाद 19 अक्टूबर को जिनेवा में हुई प्रक्रिया के तहत इसे सूची में शामिल किए जाने की घोषणा की गई।इस उपलब्धि से महासमुंद सहित पूरे छत्तीसगढ़ में उत्साह का माहौल है। अब सिरपुर की ऐतिहासिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की उम्मीद और बढ़ गई है।

प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी रहा है सिरपुर

सिरपुर का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। प्राचीन काल में यह दक्षिण कोसल की राजधानी के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखता था। यहां हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरें एक साथ मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र की धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं।महानदी के तट पर बसे इस ऐतिहासिक क्षेत्र में प्राचीन मंदिर, बौद्ध मठ, स्तूप और जैन प्रतिमाएं मौजूद हैं। ये अवशेष उस दौर की कला, स्थापत्य और धार्मिक परंपराओं की झलक पेश करते हैं।

लक्ष्मण मंदिर से लेकर बौद्ध विहारों तक फैली विरासत

सिरपुर में पुरातात्विक उत्खनन के दौरान कई महत्वपूर्ण अवशेष सामने आए हैं। यहां का लक्ष्मण मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है। ईंटों से निर्मित यह मंदिर भारतीय प्राचीन स्थापत्य कला का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।इसके अलावा आनंदप्रभु कुटी विहार, गंधेश्वर महादेव मंदिर और स्वास्तिक विहार भी सिरपुर की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा हैं। यहां मिले पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि पांचवीं से आठवीं शताब्दी के बीच सिरपुर राजनीतिक, धार्मिक और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा था।

अस्थायी सूची के बाद क्या है अगला कदम?

UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की प्रक्रिया में अस्थायी सूची महत्वपूर्ण शुरुआती चरण है। इसके बाद संबंधित देश को स्थल के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक या प्राकृतिक महत्व के प्रमाणों के साथ विस्तृत नामांकन प्रस्ताव तैयार करना होता है। आगे मूल्यांकन और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही किसी स्थल को अंतिम विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जा सकता है।सिरपुर का अस्थायी सूची में पहुंचना इस दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अब इसके स्थायी नामांकन के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से आगे की तैयारी किए जाने की उम्मीद है।

पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिल सकता है फायदा

सिरपुर को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने से छत्तीसगढ़ में ऐतिहासिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इससे देश-विदेश के पर्यटकों की रुचि इस स्थल में बढ़ने, स्थानीय रोजगार के अवसर पैदा होने और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।हालांकि, UNESCO की अस्थायी सूची में शामिल होना अंतिम विश्व धरोहर दर्जा मिलने के बराबर नहीं है। इसके बावजूद यह उपलब्धि सिरपुर की ऐतिहासिक महत्ता को वैश्विक मंच तक पहुंचाने की दिशा में एक अहम कदम है।