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Sunday, November 1, 2026
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बेमेतरा पुलिस का विशेष यातायात अभियान जारी, 38 वाहन चालकों पर कार्रवाई

बेमेतरा, 01 मई 2026 –

पुलिस उप महानिरीक्षक (DIG) रामकृष्ण साहू (IPS) के निर्देशन में जिले में सड़क सुरक्षा एवं यातायात नियमों के पालन हेतु विशेष अभियान चलाया जा रहा है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हरीश कुमार यादव सहित पुलिस अधिकारियों के मार्गदर्शन में जिले के सभी थाना/चौकी एवं यातायात पुलिस द्वारा यह अभियान लगातार जारी है।

इस अभियान के तहत 30 अप्रैल 2026 को बिना हेलमेट, तीन सवारी, सीट बेल्ट का उपयोग न करना, तेज गति, शराब सेवन कर वाहन चलाना, मॉडिफाइड साइलेंसर, बिना लाइसेंस एवं दस्तावेज नहीं रखने जैसे उल्लंघनों पर कार्रवाई करते हुए कुल 38 वाहन चालकों के विरुद्ध चालान किया गया। इनमें से 04 प्रकरणों में ₹1,400 समन शुल्क वसूला गया तथा 34 प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किए गए।

थाना-वार कार्रवाई में थाना नांदघाट में 11, थाना दाढ़ी में 08, थाना खम्हरिया में 04, थाना चंदनू में 02, चौकी मारो में 02 एवं यातायात बेमेतरा में 11 चालान किए गए। साथ ही “सशक्त ऐप” के माध्यम से गुम या चोरी हुए वाहनों की पहचान हेतु जिले में विशेष चेकिंग अभियान चलाते हुए 40 वाहनों की जांच की गई।

बेमेतरा पुलिस ने आम नागरिकों से अपील की है कि वे यातायात नियमों का पालन करें, हेलमेट एवं सीट बेल्ट का अनिवार्य उपयोग करें, शराब सेवन कर वाहन न चलाएं, नाबालिगों को वाहन न चलाने दें तथा वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग न करें। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई आगे भी निरंतर जारी रहेगी।

लोकतंत्र का नया अनुशासन: जब ‘सवाल’ ही ‘जुर्म’ बन जाए

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विशेष आलेख:-01/05/2026

आदर्शों का रामराज्य बनाम आज का तंत्र
“हम अक्सर ‘रामराज्य’ की दुहाई देते हैं, जहाँ मर्यादा का आदर्श ऐसा था कि एक साधारण नागरिक की शंका मात्र पर प्रभु श्री राम ने अपनी सबसे प्रिय ‘राजलक्ष्मी’ (माता सीता) का त्याग कर दिया था। वह राज्य ‘जनमत’ के प्रति इतना संवेदनशील था। लेकिन आज? आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ ‘छानबीन’ और ‘छेड़छाड़’ के बीच की लकीर धुंधली कर दी गई है। एक आम आदमी के लिए कानून की पेचीदगियां अलग हैं, लेकिन जब वही आदमी अपने द्वारा चुनी गई सरकार की नीतियों को ‘छेड़ता’ है या सवाल उठाता है, तो व्यवस्था का चेहरा अचानक सख्त हो जाता है। कल का राजा ‘सवाल’ सुनकर आत्म-मंथन करता था, आज का तंत्र सवाल सुनकर ‘दमन’ की राह चुनता है।”

चुनाव और अधिकार का विरोधाभास
विडंबना देखिए, जिस सरकार को हम अपनी उंगलियों से चुनते हैं, चुनाव के बाद वही उंगली अगर सत्ता की खामियों की तरफ उठे, तो उसे ‘अनुशासनहीनता’ करार दे दिया जाता है। यह एक अजीब तरह का ‘मौन समझौता’ है—वोट दीजिए और फिर पांच साल तक चकाचौंध वाली सड़कों और बंद होते स्कूलों को खामोशी से देखिए।

प्राथमिकता का सवाल
आपने अक्सर देखा होगा कि छोटे-मोटे अपराधों में शायद थाने से राहत मिल जाए, लेकिन व्यवस्था के खिलाफ ‘कलम’ चलाना या उसकी ‘शराब नीति’ और ‘शिक्षा नीति’ पर सवाल उठाना सबसे बड़ा जोखिम बन गया है। आज कलम चलाने वाली उंगलियों को “राजस्व और विकास” के तर्कों से डराया जाता है।

आवाज’ की असल चुनौती
एक पत्रकार का धर्म ही है ‘सत्ता को छेड़ना’। अगर पत्रकार सरकार को नहीं छेड़ेगा, तो जनता के मुद्दे कभी मुख्यधारा में नहीं आएंगे। लेकिन आज का माहौल ऐसा है कि पत्रकार को अपनी सुरक्षा और सच्चाई के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

चौपाल बिंदु:
“लोकतंत्र में जनता ‘मालिक’ होती है, लेकिन आज मालिक ही डरा हुआ है कि कहीं वह अपने कारिंदों से हिसाब न मांग ले। सड़कों की चौड़ाई तो बढ़ गई, पर सवाल पूछने की आजादी की गलियां संकरी होती जा रही हैं।”

डिस्क्लेमर :-यह मात्र वैचारिक लेख है जहां व्यवस्था की विसंगतियों पर एक व्यंग्यात्मक ध्यानाकर्षण है। उद्देश्य केवल आइना दिखाना है।”






विकास का ‘चमत्कारी’ चश्मा: जनता हुई चकाचौंध है!

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चौपाल डेस्क:-01/05/2026

बधाई हो! हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ अब ‘समस्या’ शब्द डिक्शनरी से बाहर होने वाला है। विकास की गति इतनी तीव्र है कि अब हमें पुरानी और धूल भरी चीजों की जरूरत ही नहीं रही।

स्कूलों का ‘शांति काल’
कुछ लोग कहते हैं कि स्कूल बंद हो रहे हैं। अरे भाई, इसे बंद होना नहीं, ‘ज्ञान का केंद्रीकरण’ (Centralization) कहते हैं। सरकार चाहती है कि बच्चे इधर-उधर भटकने के बजाय एक ही जगह इकट्ठा हों। और फिर, आज के डिजिटल युग में स्कूलों की ऊंची इमारतों की क्या जरूरत? जब हाथ में मोबाइल और जेब में मुफ्त का डेटा हो, तो मास्टर जी को ‘एडजस्ट’ करना ही तो मास्टर स्ट्रोक है! आखिर आत्मनिर्भर बनने की शुरुआत बचपन से ही तो होगी।

राजस्व की ‘पवित्र’ धारा
शराब की दुकानों पर जो लंबी कतारें दिखती हैं, वो केवल भीड़ नहीं, बल्कि ‘देशभक्तों का योगदान’ है। ये वो कर्मयोगी हैं जो अपनी सेहत की चिंता छोड़कर राज्य के राजस्व (Revenue) के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। सरकार भी कितनी दयालु है—वह जानती है कि शिक्षा और रोजगार की चिंता में युवा तनाव में आ सकता है, इसलिए ‘तनाव मुक्ति’ के केंद्र (शराब काउंटर) हर मोड़ पर खोल दिए गए हैं। यह ‘वेलफेयर स्टेट’ का सबसे आधुनिक मॉडल है।

‘वोट’ वाली उंगली का सम्मान
लोकतंत्र में उंगली का बड़ा महत्व है। सरकार हमारी इस उंगली का इतना सम्मान करती है कि उसे साल में एक बार (चुनाव के दिन) वीआईपी ट्रीटमेंट देती है। बाकी समय वह चाहती है कि हम अपनी उंगलियों का इस्तेमाल केवल ‘ताली बजाने’ और ‘स्मार्टफोन चलाने’ में करें। काम मांगने के लिए हाथ उठाने की मेहनत भला जनता क्यों करे? जब ‘मुफ्त की योजनाओं’ की गंगा बह रही हो, तो पसीना बहाने की दकियानूसी सोच अब पुरानी बात हो गई है।

सड़कों का ‘साहस’
सड़कें अब इतनी चौड़ी और चमकदार हैं कि उन पर चलते हुए डर नहीं, गर्व महसूस होता है। एक्सीडेंट तो बस ‘रफ्तार के रोमांच’ का एक छोटा सा हिस्सा हैं। सरकार ने अपना काम कर दिया—सड़कें चमका दीं। अब अगर उस पर जिंदगी नहीं चमक पा रही, तो यह तो जनता की अपनी ‘मैनेजमेंट स्किल’ की कमी है, है ना?

चौपाल बिंदु:
सरकार का इरादा नेक है—वह हमें ‘चकाचौंध’ की ऐसी आदत डाल देना चाहती है कि हमारी आंखों को अंधेरा देखने की आदत ही न रहे। अभाव में भी ‘भाव’ ढूंढ लेना ही तो असली नागरिक होने की पहचान है। जय हो इस ‘चमकते’ विकास की!




महापर्व का ‘महा-क्लाइमेक्स’: बंगाल में स्याही, झालमुड़ी और परिणाम का इंतज़ार

न्यूज आर्टिकल:01/05/2026
बंगाल की हवाओं में इस वक्त रबींद्र संगीत की मिठास कम और ‘एग्जिट पोल’ की कड़वाहट ज़्यादा घुली हुई है। 4 मई को बॉक्स खुलने वाला है और अगले तीन दिन तक पूरा तंत्र एक ऐसे ‘अदृश्य’ परिणाम के इंतज़ार में है, जो तय करेगा कि अगले पाँच साल तक जनता ‘राजा’ रहेगी या सिर्फ एक ‘आंकड़ा’।

विज्ञापनों का ‘सोनार बांग्ला’ बनाम हकीकत का गलियारा
पिछले कुछ हफ्तों में हमने विज्ञापनों में जो बंगाल देखा, वह किसी जन्नत से कम नहीं था। चमचमाती सड़कों और फ्लाईओवर की तस्वीरों के बीच वह आम बंगाली कहीं खो गया है, जो आज भी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते अपनी चप्पलें घिस चुका है। विडंबना देखिए, जिस उंगली पर नीली स्याही लगाने के लिए करोड़ों खर्च किए गए, वही उंगली जब रोजगार के लिए ‘कलम’ उठाना चाहती है, तो व्यवस्था उसे ‘आधार कार्ड’ का एक बेजान नंबर मानकर फाइलों में दबा देती है।

झालमुड़ी का तीखापन और चुनावी चकाचौंध
इन दिनों बंगाल के हर नुक्कड़ पर झालमुड़ी के दोने में कड़वे तेल की महक के साथ सत्ता का स्वाद भी घुला हुआ है। जिस तरह झालमुड़ी में मुड़मुड़े, चने और मसालों का घालमेल होता है, वैसे ही चुनावी वादों में हकीकत और सपनों का ऐसा मिश्रण परोसा गया है कि जनता का गला सूख रहा है।

नेताजी ने चकाचौंध भरी सड़कों का विज्ञापन तो परोसा, लेकिन झालमुड़ी बेचने वाले उस युवा की सुध नहीं ली जिसने एम.ए. (M.A.) की डिग्री होने के बावजूद स्टेशन की पटरी को अपना ‘ऑफिस’ बना लिया है।

सरकार को वह उंगली तो पसंद है जो ईवीएम (EVM) दबाती है, लेकिन झालमुड़ी के तीखेपन की तरह जब जनता सवाल पूछती है, तो उसे ‘फ्रीबीज’ की मीठी चटनी चटाकर शांत कर दिया जाता है।

“दीदी’ की दुआ और ‘दादा’ का दावा: उंगलियों का हिसाब
सरकारों को जनता केवल चुनाव के समय ही ‘इंसान’ नजर आती है। जैसे ही 4 मई का सूरज उगेगा और किसी एक दल के माथे पर विजय का तिलक लगेगा, ये चमचमाती सड़कों वाली तस्वीरें और सुरक्षा के दावे फिर से सरकारी फाइलों की धूल चाटने लगेंगे। विकास का पहिया हाईवे पर तो फर्राटा भर रहा है, लेकिन वह उस माँ की रसोई तक नहीं पहुँच पा रहा, जहाँ आज भी ‘काम’ की जगह ‘राशन’ का इंतजार है।

खबरनिष्कर्ष: परिणाम का धर्म
4 मई को जो भी जीते, असली जीत तब होगी जब उंगली पर लगी वह स्याही केवल वोट का निशान न रहकर, हक़ की कलम बन जाए। झालमुड़ी का तीखापन ज़बान पर तो रहे, पर व्यवस्था के प्रति यह सवाल भी कम न हो कि “हमें स्मार्ट सिटी चाहिए या स्मार्ट जीवन?”

डिस्क्लेमर :-यह मात्र वैचारिक लेख है जहां व्यवस्था की विसंगतियों पर एक व्यंग्यात्मक ध्यानाकर्षण है। उद्देश्य केवल आइना दिखाना है।”

बुद्ध पूर्णिमा: मारने वाला से बचाने वाला बड़ा होता है राजसी वैभव से निर्वाण तक का मार्ग

बुद्ध पूर्णिमा – 01/04/2026

आज बुद्ध पूर्णिमा है—वह पावन दिन जब सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुआ, उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ और इसी दिन उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि करुणा, त्याग और आत्म-साक्षात्कार के उस सफर का उत्सव है जिसने पूरी दुनिया को शांति का मार्ग दिखाया।

दया और न्याय का आरंभ: सिद्धार्थ और देवदत्त

सिद्धार्थ के भीतर करुणा के बीज बचपन में ही दिखने लगे थे। एक प्रसिद्ध प्रसंग है जब उनके चचेरे भाई देवदत्त ने एक पक्षी (हंस)को तीर मार दिया। घायल पक्षी सिद्धार्थ की गोद में गिरा। उन्होंने उसका उपचार किया और उसे जीवनदान दिया।

जब देवदत्त ने अपने शिकार पर अधिकार जताया, तो सिद्धार्थ उससे उलझ गए। मामला दरबार तक पहुँचा, जहाँ यह ऐतिहासिक निर्णय हुआ कि “मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है।” यहीं से स्पष्ट हो गया था कि सिद्धार्थ का हृदय प्राणीमात्र के दुख से द्रवित होने वाला है।

आसक्ति में दुख है विरक्ति में आनंद

वे चार दृश्य: जिन्होंने जीवन की दिशा बदल दी
एक राजकुमार के रूप में सिद्धार्थ का जीवन सुख-सुविधाओं से भरा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। महल की चहारदीवारी से बाहर निकलने पर उन्होंने चार ऐसे दृश्य देखे जिन्होंने उनके अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया:
एक वृद्ध व्यक्ति: शरीर की जर्जरता और लाचारी को देख उन्हें समय की क्रूरता का आभास हुआ।
एक बीमार व्यक्ति: शारीरिक कष्ट और पीड़ा ने उन्हें झकझोर दिया।
एक शवयात्रा:निर्जीव देह को देख सिद्धार्थ के मन में **’जीवन की नश्वरता’ का भाव जागा। उन्हें समझ आया कि मृत्यु अटल है और यह वैभव क्षणभंगुर है।
एक संन्यासी: अंत में एक शांत संन्यासी को देख उन्हें बोध हुआ कि असली शांति बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि विरक्ति और भीतर की खोज में है।

“जीवन नश्वर है, यहाँ की खुशियाँ स्थायी नहीं हैं। असली आनंद तो संसार के मोह से ऊपर उठने में है।” — यही वह विचार था जिसने उनके मन में ‘वैराग्य’ पैदा किया।



महाभिनिष्क्रमण: सत्य की खोज

29 वर्ष की आयु में, जब दुनिया सो रही थी, सिद्धार्थ ने अपने परिवार (पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल), पिता, राज्य और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। इसे बौद्ध ग्रंथों में महाभिनिष्क्रमण’ कहा गया है।

वे किसी राज्य को जीतने नहीं, बल्कि जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाने के लिए निकले थे। वर्षों की कठोर तपस्या और साधना के बाद, बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें वह ‘प्रकाश’ मिला जिसने उन्हें **’बुद्ध’ (जागृत पुरुष)** बना दिया।



बुद्ध का संदेश आज के लिए

आज के भागदौड़ भरे जीवन में बुद्ध की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हैं। बुद्ध हमें सिखाते हैं कि:

अप्प दीपो भव:अपना दीपक स्वयं बनें।

मध्यम मार्ग: न अत्यधिक विलासिता, न अत्यधिक कठोरता।

अहिंसा:मन, वचन और कर्म से किसी को दुःख न पहुँचाना।

बुद्ध पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर, आइए हम भी अपने भीतर के करुणा के भाव को जगाएं और शांति की ओर एक कदम बढ़ाएं।

नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स।


स्क्रीन से दूरी, जिंदगी से नजदीकी” — युवाओं में बढ़ रहा है ‘डिजिटल डिटॉक्स’ का ट्रेंड

नई दिल्ली, 01 मई 2026

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहाँ हर इंसान मोबाइल और सोशल मीडिया में डूबा हुआ है, वहीं अब एक नई सोच जन्म ले रही है — “डिजिटल डिटॉक्स।” देशभर के युवा अब सप्ताह में एक दिन मोबाइल बंद रखने, सोशल मीडिया से ब्रेक लेने और प्रकृति के करीब जाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

डिजीटल युग में डिजिटल लाइफ हो चली है ।डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक प्रयोग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है, जिससे अनिद्रा, चिंता, ध्यान में कमी, मोटापा और स्क्रीन एडिक्शन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। निरंतर स्क्रीन टाइम आंखों की थकान, गर्दन के दर्द और सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देता है, जिससे डिजिटल डिटॉक्स और गैजेट्स के सीमित उपयोग की आवश्यकता बढ़ गई है।

शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में थकान, सिरदर्द और सूखी आंखें की समस्या होती है। मोबाइल और लैपटॉप के अत्यधिक उपयोग से गर्दन और पीठ में दर्द (टेक्स्ट नेक सिंड्रोम) होता है। गतिहीन जीवनशैली के कारण मोटापा और हृदय रोग का जोखिम बढ़ जाता है।

सामाजिक और व्यवहारिक अलगाव के साथ उत्पादकता में कमी हो जा रही है।बचाव के लिए दूरी जरूरी

डिजिटल एडिक्शन से बचने के लिए ‘डिजिटल डिटॉक्स’ (गैजेट्स से कुछ समय की दूरी) अपनाना, रात में स्क्रीन का उपयोग कम करना, शारीरिक व्यायाम करना और सोशल मीडिया के उपयोग का समय सीमित करना आवश्यक है।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार स्क्रीन देखने से नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। डिजिटल डिटॉक्स अपनाने वाले लोग बताते हैं कि इससे उनकी नींद बेहतर हुई, रिश्ते मजबूत हुए और मन शांत रहने लगा।

विशेषज्ञों की सलाह है कि रात को सोने से एक घंटे पहले मोबाइल बंद कर दें, सुबह उठते ही फोन न देखें और परिवार के साथ बिताए समय में फोन को दूर रखें। यह छोटी सी आदत जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है।




“AI अब बन रहा है विद्यार्थियों का सबसे बड़ा शिक्षक” — शिक्षा जगत में बड़ा बदलाव

नई दिल्ली, 01 मई 2026

भारत में शिक्षा का तरीका तेजी से बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI अब केवल टेक्नोलॉजी की दुनिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह स्कूलों और कॉलेजों में भी अपनी जगह बना चुका है। देशभर के लाखों विद्यार्थी अब AI टूल्स की मदद से पढ़ाई कर रहे हैं, डाउट्स क्लियर कर रहे हैं और अपनी क्षमता के अनुसार सीख रहे हैं।

शिक्षाविदों का कहना है कि AI आधारित शिक्षा से हर बच्चे को उसकी अपनी गति और समझ के अनुसार सीखने का मौका मिलता है, जो पारंपरिक कक्षाओं में संभव नहीं था। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब स्मार्टफोन के जरिये बच्चे बेहतरीन शिक्षा पा रहे हैं।

सामान्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता: उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता जो मनुष्यों की तरह ही कार्यों की एक विस्तृत श्रृंखला में ज्ञान को समझने, सीखने और लागू करने की क्षमता रखती है।किसी विशिष्ट कार्य या कार्यों के समूह को संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया है और अपनी निर्धारित क्षमताओं से परे कार्य नहीं कर सकता।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेताते हैं कि AI शिक्षक की जगह नहीं ले सकता। शिक्षक और AI का संयोजन ही भविष्य की शिक्षा का आधार होगा। सरकार भी अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत AI को पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में काम कर रही है।

“सुबह की 30 मिनट की सैर बदल सकती है आपकी पूरी जिंदगी” — डॉक्टरों की नई सलाह

नई दिल्ली, 30 अप्रैल 2026

देश में बढ़ते मधुमेह, हृदय रोग और मोटापे के मामलों के बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञ एक सरल लेकिन कारगर उपाय सुझा रहे हैं — रोज सुबह महज 30 मिनट की पैदल सैर। हालिया शोध बताते हैं कि नियमित पैदल चलने से न केवल शरीर स्वस्थ रहता है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।

डॉक्टरों के अनुसार सुबह की सैर से शरीर में विटामिन डी की पूर्ति होती है, रक्तचाप नियंत्रित रहता है, पाचन तंत्र मजबूत होता है और दिनभर ऊर्जा बनी रहती है। इसके अलावा यह डिप्रेशन और एंग्जाइटी को भी कम करने में सहायक है।

सुबह की सैर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक उत्तम, प्राकृतिक और मुफ्त व्यायाम है। यह ताज़ी हवा, पक्षियों की चहचहाहट और शांत वातावरण के साथ दिन की सकारात्मक शुरुआत करती है। यह हृदय को स्वस्थ रखने, वजन घटाने, ब्लड शुगर नियंत्रित करने, मांसपेशियों को मजबूत बनाने और तनाव कम करने में मदद करती है।

खास बात यह है कि इसके लिए किसी जिम या महंगे उपकरण की जरूरत नहीं। बस एक अच्छी आदत और थोड़ी सी इच्छाशक्ति चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर आप आज से ही यह आदत अपना लें तो तीन महीने में फर्क खुद महसूस होगा।

टीबी मुक्त भारत अभियान: हड़ुआ और सहसपुर में सफल शिविर

बेमेतरा/साजा, 30 अप्रैल 2026

बेमेतरा जिले में स्वास्थ्य विभाग द्वारा टीबी मुक्त भारत अभियान के अंतर्गत चलाए जा रहे 100 दिवसीय विशेष अभियान की कड़ी में 29 अप्रैल को साजा विकासखण्ड के ग्राम हड़ुआ एवं सहसपुर में एक सफल स्क्रीनिंग शिविर का आयोजन किया गया। कलेक्टर सुश्री प्रतिष्ठा ममगाई के निर्देश और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अमृत लाल रोहलेडर के मार्गदर्शन में आयोजित इस शिविर में उच्च जोखिम समूह के 188 लोगों का अत्याधुनिक हैंड हेल्ड पोर्टेबल एक्स-रे मशीन के माध्यम से निःशुल्क एक्स-रे किया गया।

शिविर में जांच के दौरान 19 संदेहास्पद मरीजों की पहचान की गई, जिनका स्पूटम सैंपल अत्याधुनिक ट्रू-नाट मशीन से जांच हेतु एकत्र किया गया। शिविर से पूर्व मितानिनों और स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा घर-घर सर्वे कर ग्रामीणों को टीबी के लक्षण, उपचार और बचाव की संपूर्ण जानकारी दी गई, जिससे बड़ी संख्या में ग्रामीण उत्साहित होकर शिविर में सम्मिलित हुए।

शिविर में बीएमओ साजा, जिला कार्यक्रम समन्वयक, बीपीएम और एसटीएस ने पूरी जिम्मेदारी के साथ सहभागिता निभाई। जिला चिकित्सालय बेमेतरा से रेडियोग्राफर जावेद मंसूरी और शेष नारायण टंडन ने एक्स-रे मशीन का संचालन किया। ग्रामीण स्वास्थ्य संयोजक, मितानिन और ग्रामीणजन की सक्रिय भागीदारी से यह शिविर पूर्णतः सफल रहा। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने संपूर्ण कार्यक्रम का कुशलतापूर्वक क्रियान्वयन किया।

बंगाल में सत्ता का संग्राम — 6 में से 5 एग्जिट पोल में BJP आगे, ममता की विदाई की आहट?

राजनीति/बंगाल चुनाव 2026-30 अप्रैल 2026,

पश्चिम बंगाल में 15 साल से काबिज ममता बनर्जी की TMC को इस बार कड़ी चुनौती मिलती दिख रही है। अधिकांश एग्जिट पोल भाजपा को बहुमत के पार दिखा रहे हैं, हालाँकि एक-दो सर्वे ‘दीदी’ की वापसी का दावा कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दोनों चरणों का मतदान समाप्त होते ही देश की राजनीतिक नज़रें अब एग्जिट पोल पर टिक गई हैं। 23 अप्रैल को पहले चरण और 29 अप्रैल को दूसरे चरण में 294 सीटों पर क्रमशः 93.19% और 91.57% ऐतिहासिक मतदान हुआ — जो इस चुनाव की असाधारण जनभागीदारी को दर्शाता है।

जनमत एग्जिट पोल के मुताबिक TMC को 195–200 और BJP को केवल 80–90 सीटें मिल सकती हैं — यानी ममता की चौथी बार भी सरकार बन सकती है।
— जनमत एग्जिट पोल, 29 अप्रैल 2026
अलग-अलग सर्वे एजेंसियों के आंकड़े अलग-अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं, लेकिन इनमें एक बात साझा है — मुकाबला पूरी तरह TMC और BJP के बीच है। वाम दल और कांग्रेस का इस बार खाता भी खुलना मुश्किल दिख रहा है।

भाजपा का दावा — ‘खेला खत्म’
भाजपा नेता और नंदीग्राम से उम्मीदवार सुवेंदु अधिकारी ने एग्जिट पोल आने के बाद दावा किया कि ज़मीनी हकीकत एग्जिट पोल से भी बड़ी है और भाजपा को 180 से अधिक सीटें मिलेंगी। प्रजा पोल के आंकड़े BJP को 178–200 सीटें देकर इस दावे को बल देते हैं। वोट शेयर के लिहाज़ से भी भाजपा को 42.8% और TMC को 41.4% वोट मिलने का अनुमान जताया गया है — जो यह बताता है कि मुकाबला बेहद करीबी है।

ममता का जवाब — ‘लोकतंत्र कुचला जा रहा है’
दूसरी तरफ, TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी ने मतदान के दौरान केंद्रीय बलों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि 1984 से चुनाव लड़ रही हैं लेकिन ऐसा अत्याचार पहले नहीं देखा। भवानीपुर में BJP नेता सुवेंदु अधिकारी का TMC कार्यकर्ताओं ने घेराव किया, जबकि फालता में लाठीचार्ज की खबरें भी आईं। Peoples Pulse और जनमत जैसे दो एग्जिट पोल अभी भी TMC को प्रचंड बहुमत देते हैं।

इतिहास गवाह है — एग्जिट पोल हमेशा सही नहीं होते
बंगाल चुनाव के इतिहास में एग्जिट पोल की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। 2021 में भी तमाम एजेंसियों ने कड़ी टक्कर का अनुमान लगाया था, लेकिन जब असली नतीजे आए तो TMC ने 215 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया और BJP सिर्फ 77 सीटों पर सिमट गई। इसलिए इस बार भी एग्जिट पोल को अंतिम सत्य मानना जल्दबाज़ी होगी।

असली तस्वीर 4 मई को स्पष्ट होगी, जब बंगाल के साथ-साथ असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के नतीजे भी घोषित किए जाएंगे। तब तय होगा कि बंगाल में कमल खिलता है या ‘दीदी’ का जादू एक बार फिर हकीकत को एग्जिट पोल से अलग कर देता है।

पश्चिम बंगालएग्जिट पोलBJPTMCममता बनर्जीचुनाव 2026
यह आलेख उपलब्ध एग्जिट पोल डेटा पर आधारित है। अंतिम परिणाम 4 मई 2026 को घोषित होंगे।