पश्चिम बंगाल का चुनाव: मोदी बनाम ममता से आगे की कहानी
दिल्ली की रणनीति और बंगाल की चुनौती_06/01/2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव किसी सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह—के लिए एक प्रतिष्ठा की लड़ाई का रूप ले चुका है। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए यह न केवल सत्ता की रक्षा, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने का संघर्ष है।
भाजपा की चुनावी गणित स्पष्ट है—उसे हिंदू मतों के बड़े हिस्से को अपने पक्ष में एकजुट करना होगा। दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के जरिए अपने राजनीतिक संतुलन को साधने की कोशिश की है। जगन्नाथ धाम जैसे कदम यह संकेत देते हैं कि वह भाजपा के नैरेटिव को उसी के मैदान में चुनौती देने का प्रयास कर रही हैं।
अब टकराव महज दो दलों का नहीं, बल्कि दो राजनीतिक संस्कृतियों और नैरेटिव्स की भी लड़ाई है। एक ओर मोदी-केंद्रित राष्ट्रवादी राजनीति है, तो दूसरी ओर ममता बनर्जी की क्षेत्रीय अस्मिता और कल्याणकारी राजनीति। खास बात यह है कि दक्षिण भारत की तरह पश्चिम बंगाल भी उन राज्यों में शामिल है, जहां अब तक मोदी-शाह की चुनावी रणनीति निर्णायक प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है।
बिहार जैसे राज्यों में गठबंधन से सत्ता तक पहुंचने वाली भाजपा को पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ अकेले लड़ना पड़ रहा है। लेफ्ट और कांग्रेस कमजोर हुई हैं, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की पकड़ अब भी बनी हुई है। यह चुनाव भाजपा की संगठनात्मक मजबूती और रणनीति की असली परीक्षा है।
पश्चिम बंगाल भाजपा के लिए ध्रुवीकरण की राजनीति का अहम इम्तिहान है।राज्य में करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम और 70 प्रतिशत हिंदू मतदाता हैं।
पिछले चुनावों में मिले 40 प्रतिशत वोट समर्थन बढ़ने का संकेत देते हैं, पर बहुमत अब भी सवाल है।


