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Saturday, March 7, 2026

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: छात्रों की आत्महत्याएं सिर्फ आंकड़े नहीं, हमारी व्यवस्था की विफलता हैं

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नई दिल्ली, 26 जुलाई:
देश में छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं जिस तेज़ी से बढ़ रही हैं, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने साफ कहा,
इतने छात्र आत्महत्या कर रहे हैं, इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।”
यह हमारे शिक्षा तंत्र, सामाजिक सोच और मानसिक स्वास्थ्य तंत्र – तीनों की सामूहिक असफलता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि इन दुखद घटनाओं के पीछे शैक्षणिक दबाव, सामाजिक तिरस्कार और भावनात्मक उपेक्षा जैसी वजहें काम कर रही हैं, जिन्हें अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
📊 चौंकाने वाली तस्वीर: 13 हज़ार छात्र आत्महत्या के शिकार
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार:
वर्ष 2022 में आत्महत्या करने वाले 1.7 लाख लोगों में से 13,044 छात्र थे।
वर्ष 2001 में यह संख्या 5,425 थी — यानी दो दशकों में ढाई गुना वृद्धि
हर 100 आत्महत्या मामलों में औसतन 8 छात्र शामिल हैं।
2,248 छात्रों ने केवल इसलिए जान दी क्योंकि वे परीक्षा में असफल हो गए थे।
इन आंकड़ों को देखकर कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ आंकड़े नहीं, युवा मनों का टूटता भरोसा है।
⚖️ मानसिक स्वास्थ्य है मौलिक अधिकार का हिस्सा
कोर्ट ने यह भी कहा कि मानसिक स्वास्थ्य, जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का एक अनिवार्य पक्ष है। यह सिर्फ चिकित्सा या इलाज का विषय नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, जिम्मेदार और जागरूक शिक्षा प्रणाली की ज़िम्मेदारी है कि वह छात्रों को आत्महत्या की कगार पर पहुँचने से पहले ही संभाले।
🧠 NEET छात्रा की आत्महत्या से उपजा राष्ट्रीय मंथन
सुनवाई विशाखापट्टनम में नीट की तैयारी कर रही एक छात्रा की आत्महत्या से जुड़ी थी, जिसकी जांच CBI से कराने की मांग पहले आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में खारिज हो चुकी थी। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश के लिए 15 दिशा-निर्देश जारी किए, ताकि:
शिक्षा संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य तंत्र मजबूत हो,
छात्रों की सुनवाई हो, सज़ा नहीं,
और परीक्षा की असफलता को जीवन की असफलता न माना जाए।
🕊️ कॉलेजों को बनना होगा अभिभावक का विकल्प
कोर्ट ने कहा कि जब छात्र अपने घरों से दूर रहकर कॉलेजों में पढ़ते हैं, तब संस्थानों की भूमिका केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें ‘लोको पेरेंटिस’ यानी अभिभावक का स्थान लेना होगा — जो नियम नहीं, सहयोग और सहानुभूति देता है।
जातिगत भेदभाव की ओर इशारा करते हुए कोर्ट ने कहा कि कॉलेज परिसरों में यह भावना छात्रों को मानसिक रूप से तोड़ती है और संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।
🔍 क्या?करेंगे सरकार और संस्थान?
कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि मार्च 2025 में गठित नेशनल टास्क फोर्स की सिफारिशों को कब और कैसे लागू किया जाएगा, इसका विवरण 90 दिनों में हलफनामा देकर बताया जाए।
🔚 निष्कर्ष: यह सिर्फ छात्र नहीं, भविष्य का अंत है
हर आत्महत्या के पीछे एक अधूरी कहानी होती है — जिसे अगर सही समय पर सुना गया होता, तो शायद बचाया जा सकता था। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम केवल न्यायिक नहीं, राष्ट्रीय चेतना का आह्वान है।
अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था, समाज और सरकार – सभी एकजुट होकर छात्र जीवन को बोझ नहीं, भरोसा बनाएं।

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