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Sunday, November 1, 2026

सिंहासन की पुतलियाँ श्मशान का बेताल या आज का रामलीला मैदान

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संदर्भ लेख विपक्ष रैली/रामलीला मैदान 1 नवंबर 2026

(दृश्य: 1 नवंबर की सुबह। टीवी स्क्रीन पर विपक्ष की आयोजित महारैली का सीधा प्रसारण चल रहा है। ज्वाला और ज्योतिपति मेज पर चाय की चुस्कियों के साथ गहन सोच में डूबे हैं।)

रुकावट के लिए लगे बेरीकेट्स कूद कर कार्यकर्ता पहुंच रहे रामलीला मैदान ।

ज्वाला: (स्क्रीन की ओर इशारा करते हुए, तीखे स्वर में) ज्योतिपति जी, आज 1 नवंबर है। सड़कों पर जनसैलाब है, विपक्ष की महारैली है और हवा में भारी असंतोष। 79 वर्षों के इस स्वतंत्र भारत में हम आज कहाँ खड़े हैं? क्या यह वही भारत है जिसका सपना हमारे पुरखों ने देखा था?

ज्योतिपति: (धीमे और गंभीर स्वर में) ज्वाला, इतिहास केवल कालचक्र नहीं, दर्पण होता है। 79 साल की इस यात्रा में अगर देश का ढांचा चरमराहट की आवाज़ कर रहा है, तो इसकी पृष्ठभूमि किसी एक दिन या एक नीति की देन नहीं है।

इतिहास गवाह है कि हम पहले क्षेत्रवाद, अलगाववाद, धर्मवाद और जातिवाद के कारण शताब्दियों तक गुलाम रहे। और जब 1000 साल के संघर्ष के बाद स्वतंत्रता मिली, तो हमने क्या किया? हमने ‘विकासवाद’ को राजनीति का मूलमंत्र बनाने के बजाय देश को तुष्टिकरण ‘आरक्षणवाद’ और ‘वोटबैंकवाद’ के चक्रव्यूह में धकेल दिया।

ज्वाला: लेकिन सत्ता में बैठे लोग तो इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास का दावा करते हैं!

ज्योतिपति: (कटाक्ष करते हुए) छद्म विकास! कागज़ों और विज्ञापनों पर दिखने वाला विकास, जो असल में विदेशी कर्ज़ के बलबूते खड़ा किया गया है। आज भारत विश्व के उन शीर्ष देशों में शामिल है जो भारी कर्ज़ के नीचे दबे हैं।

अमेरिका आज हम पर अनाप-शनाप टैरिफ़ की तलवार लटकाकर आर्थिक दबाव बना रहा है। सीमा पर स्थिति यह है कि चीन अरुणाचल के रास्ते भारतीय सीमा में पैठ बनाने की कोशिश में है।

कूटनीति का पहला नियम है कि जब विदेशी आक्रमणकारी और बाहरी शक्तियाँ ताकतवर हों, तो राजा का पहला कर्तव्य अपने घर को अंदर से अटूट बनाना होता है। लेकिन हम क्या कर रहे हैं? सामाजिक समरसता और समावेशन के नाम पर नए-नए विभाजन पैदा कर रहे हैं।

ज्वाला: यही तो मूल रहस्य है! महंगाई से आम नागरिक पिसा जा रहा है, बेकारी और बेरोजगारी से युवा त्रस्त हैं, महिलाओं के वास्तविक उत्थान पर नीतियाँ सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित रह गईं।

पूर्ववर्ती सरकारों ने अगर तुष्टीकरण की नीति चलाई, तो मौजूदा व्यवस्था ने क्या किया? समान नागरिक संहिता (UCC) की बातें तो हुईं, पर व्यावहारिक धरातल पर अधिकारों की समरूपता की जगह नए प्रशासनिक विरोधाभास खड़े कर दिए गए। ऐसा क्यों है कि आज सवर्ण हो, महिला हो, या समाज का कोई अन्य वर्ग नाराजगी है?—हर कोई किसी न किसी मोड़ पर खुद को उपेक्षित या ठगा हुआ महसूस कर रहा है?

ज्योतिपति: (अंगुली उठाकर) ज्वाला, इसे समझने के लिए तुम्हें भारत की सबसे प्राचीन और तिलस्मी कथाओं के मूल दर्शन को समझना होगा। याद करो उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के राजसिंहासन को—’सिंहासन बत्तीसी’।

जब विक्रमादित्य उस सिंहासन पर बैठते थे, तो उसमें जुड़ी 32 पुतलियाँ जीवंत हो उठती थीं।

वे पुतलियाँ केवल सजावट नहीं थीं, वे प्रजा के अधिकार, महिला सम्मान, राजधर्म और राजा के नैतिक दायित्वों की प्रतीक थीं। वे राजा से प्रश्न करती थीं और विक्रमादित्य हर प्रश्न का उत्तर अपने न्यायप्रिय और प्रजापालक आचरण से देते थे।

लेकिन जब राजा भोज उस सिंहासन पर बैठने लगा, तो 32 पुतलियों ने ऐसे प्रश्न पूछे जिनका उत्तर अहंकार और अयोग्यता के कारण भोज के पास नहीं था। पुतलियाँ उड़ गईं, सिंहासन बेजान हो गया और अंततः उसे ज़मीन में गाड़ना पड़ा।

ज्वाला: (आँखों में चमक लाते हुए) यानी आज की राजसत्ता भी राजा भोज की तरह उस सिंहासन की कसौटी पर निष्फल साबित हो रही है?

ज्योतिपति: बिलकुल। और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जब वही विक्रमादित्य प्रजापालन और न्याय के मार्ग से हटकर सिद्धियाँ और अति-शक्तियाँ पाने के लालच में तंत्र-मंत्र के चक्कर में पड़े, तो ‘बेताल पच्चीसी’ का जन्म हुआ।

बेताल पच्चीसी में राजतंत्र नहीं है; वहाँ श्मशान है, कंधे पर टँगा मुर्दा है, तंत्र और मंत्र है। बेताल हर बार सवाल पूछता है—”अगर उत्तर जानते हुए भी चुप रहे, तो तुम्हारा सिर टुकड़ों में टूट जाएगा।”

आज का तंत्र वही श्मशान की साधना बन चुका है। सत्ता राजधर्म छोड़कर केवल सत्ता में बने रहने की ‘सिद्धि’ पाने में लगी है। बेताल की तरह आज देश का आम नागरिक, युवा और बुद्धिजीवी सत्ता से सवाल पूछ रहा है, लेकिन सत्ता अहंकार के नशे में चूर है।

ज्वाला: आपने बहुत सटीक कहा। विक्रमादित्य के दरबार में नवरत्न थे—वराहमिहिर और आर्यभट्ट जैसे महान वैज्ञानिक और विद्वान। उसी परंपरा पर मुगल काल में भी नवरत्नों की व्यवस्था दिखी जहाँ योग्यताओं का समावेश था। लेकिन आज की राजनीति में ज्ञान और विवेक की जगह केवल वोटों का गणित है।

ज्योतिपति: राजसत्ता कोई खेल या मज़ाक नहीं है ज्वाला। सिंहासन पर बैठने वाले का धीर, वीर और गंभीर होना अति-आवश्यक है। जो सत्ता देश को बांटने, विभाजन करने, तुष्टीकरण करने या जाति-धर्म के नाम पर शासन करने का काम करती है, वह अंततः अपने ही पतन का गड्ढा खोदती है।

हमारे शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि राजसत्ता से बड़ी ‘धर्मसत्ता’ होती है, और धर्मसत्ता व राजसत्ता दोनों ‘ईश्वरीय सत्ता’ के अधीन हैं। अहंकार ही सत्ता के पतन का सबसे बड़ा कारण है।

रावण को सत्ता और शक्ति का अहंकार था, जिसका अंत सबने देखा। इसके विपरीत, प्रभु श्री राम को सत्ता का रत्ती भर अहंकार नहीं था—एक साधारण नागरिक (धोबी) की शंका पर भी उन्होंने अपनी सबसे प्रिय वस्तु, माता सीता का त्याग कर राजधर्म की मर्यादा को सर्वोपरि रखा।

ज्वाला: तो क्या सत्ताधीशों को यह समझ नहीं आ रहा है कि यदि वे इस अहंकार से बाहर नहीं निकले, तो उनका हश्र भी पूर्ववर्ती सरकारों जैसा ही होगा?

ज्योतिपति: यदि वे इतिहास से सबक नहीं लेंगे, तो नियति अपना काम करेगी। जब तक देश में ‘विकासवाद’ और ‘समान नागरिक अधिकार’ को सच्चा आधार नहीं बनाया जाएगा, और जब तक सत्ता पुतलियों के प्रश्नों से भागकर बेताल के तिलस्म में उलझी रहेगी, तब तक न सीमाएँ सुरक्षित रहेंगी और न ही समाज।

आज की यह विपक्ष की महारैली और सड़कों का असंतोष उसी जन-आक्रोश का संकेत है।

राजसत्ता तभी तक जीवित रहती है जब तक वह प्रजा को संतान मानकर उसका समरूप पालन-पोषण करे, न कि उसे केवल एक वोट बैंक समझे।

(दोनों एक-दूसरे की ओर देखते हैं। चाय का कप मेज पर रखा जाता है और प्रकाश धीरे-धीरे धीमा होता है।)



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