शीशें का घर और बंजर होता दिल: ज़मीन अब पत्थर हो गई
लेख डेस्क 25 जून 2026
दिल’ वह उपजाऊ मिट्टी है जहाँ संवेदनाओं की फसल उगती है, लेकिन जब यह मिट्टी ‘पत्थर’ बन जाती है, तो इंसान का पूरा अस्तित्व ही बंजर हो जाता है। दिल वह ज़मीन है, जहाँ इंसान के विचार, उसका व्यवहार और उसके संस्कार जन्म लेते हैं। एक किसान अपनी ज़मीन को कोमल रखता है ताकि उसमें बीज अंकुरित हो सकें। लेकिन आज के दौर में, दौलत और अहम् की धूप ने उस गीली मिट्टी को सुखाकर ‘पत्थर’ बना दिया है।
पत्थर में बीज नहीं उगते उपज नहीं होती
पत्थर कितना ही कीमती क्यों न हो—चाहे वह हीरा हो या संगमरमर—उसमें कभी कोई पौधा नहीं उग सकता। जब हमारा दिल पत्थर का हो जाता है, तो उसमें प्रेम, दया और करुणा के बीज दम तोड़ देते हैं। अब वहाँ ‘विचार’ नहीं पैदा होते, बल्कि एक कठोर ‘जड़ता’ पैदा होती है। जिस मिट्टी में कभी अपनों के लिए नमी थी, वह अब कंक्रीट के जंगल की तरह सख्त हो चुकी है।
पत्थर के होठों पर अब शब्द नहीं
जब दिल की कोमलता खत्म होती है, तो उसका सबसे पहला असर हमारी ज़ुबान पर पड़ता है। हमारे होंठ अब शब्द नहीं बोलते, बल्कि पत्थर बरसाते हैं। आज जब कोई किसी से बात करता है, तो संवाद नहीं होता, बल्कि एक हमला होता है। लहजे की कड़वाहट और शब्दों की चोट ऐसी लगती है मानो कोई सामने वाले को पत्थर मार रहा हो।
शीशे के घर और पत्थर का व्यापार
यहाँ वह पुरानी कहावत याद आती है— “जिनके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते।” लेकिन आज विडंबना देखिए, हमने अपने घरों को तो शीशे का (दिखावे का) बना लिया है, पर अपने दिलों को पत्थर का कर लिया है।हम भूल गए हैं कि अगर दिल कोमल और उपजाऊ न रहा, तो हम दूसरों को जो ‘पत्थर’ मार रहे हैं, उनकी चोट एक दिन हमारे अपने शीशे के वजूद को भी चकनाचूर कर देगी।
वापसी का रास्ता ही भूल गए
सवाल यह है कि जो दिल कभी उपजाऊ था, वह इतना कड़क कैसे हो गया? क्या ‘दौलत’ की चाहत इतनी बड़ी हो गई कि हमने अपनी ‘इंसानियत’ की नमी ही खो दी?
हमें फिर से उस ‘मिट्टी की सोंधी महक’ की ओर लौटना होगा। हमें अपने दिल की ज़मीन को फिर से जोतना होगा ताकि उसमें नफरत के पत्थर नहीं, बल्कि मुहब्बत के पौधे उग सकें। क्योंकि पत्थर बनकर हम दुनिया जीत तो सकते हैं, पर उसमें रह नहीं सकते।
“सीने में धड़कन नहीं, सिक्कों की खनक पाल बैठे हैं; हम मिट्टी के पुतले थे, मगर पत्थर से अब दिल लाल कर बैठे हैं।”
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