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Sunday, September 6, 2026

बाल विवाह एक सामाजिक अभिशाप: इसे जड़ से मिटाना छत्तीसगढ़ का संकल्प

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रायपुर – 06 सितंबर 2026

बाल विवाह न केवल एक सामाजिक कुरीति है, बल्कि यह मानव अधिकारों, बाल अधिकारों और विशेष रूप से बालिकाओं के स्वर्णिम भविष्य पर एक गंभीर कुठाराघात भी है।

सीएम विष्णु देव साय के नेतृत्व और महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के मार्गदर्शन में राज्य सरकार ने बाल विवाह जैसी जड़ जमा चुकी सामाजिक बुराई को जड़ से उखाड़ने के लिए प्रशासनिक तत्परता और सामाजिक भागीदारी का एक बेहतरीन मॉडल पेश किया है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा हाल ही में 27 नवंबर को ‘बाल विवाह, कम उम्र और जबरन विवाह के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस’ घोषित करने का निर्णय एक ऐसा वैश्विक मील का पत्थर है, जो इस कुप्रथा के खिलाफ जारी संघर्ष को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करेगा।

यह भारत के लिए भी एक गर्व का क्षण है, क्योंकि ठीक दो वर्ष पूर्व 27 नवंबर 2024 को ही देश में ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ के राष्ट्रव्यापी संकल्प की नींव रखी गई थी।

भारत की इस जन-मुहिम को अब वैश्विक स्तर पर मिली यह मान्यता यह सिद्ध करती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से शुरू की गई सामाजिक पहलें सीमाओं को लांघकर वैश्विक क्रांति का रूप ले सकती हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनते इस अनुकूल माहौल के बीच, यदि हम क्षेत्रीय धरातल पर नजर डालें, तो छत्तीसगढ़ राज्य की भूमिका इस वैश्विक संकल्प को साकार करने में अत्यंत अनुकरणीय रही है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़े राज्य की इस सफलता की कहानी खुद बयां करते हैं।

सर्वेक्षण-5 (2019-21) के अनुसार छत्तीसगढ़ में 18 वर्ष से कम उम्र में विवाह करने वाली बालिकाओं का प्रतिशत 12.1 था, जो सर्वेक्षण-6 (2023-24) में घटकर 10.1 प्रतिशत पर आ गया है।

आंकड़ों का यह गिरावट का रुझान केवल संख्यात्मक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उन हजारों बेटियों के मुस्कराते चेहरों और उनके सुरक्षित भविष्य का प्रमाण है, जिन्हें समय रहते इस कुप्रथा के भंवर से निकाला गया।

छत्तीसगढ़ में इस परिवर्तन के पीछे शासन, पुलिस तंत्र, स्थानीय निकायों, धर्मगुरुओं और नागरिक समाज की समन्वित रणनीति रही है।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन’ (JRC) जैसे सहयोगी संगठनों के साथ मिलकर पिछले तीन वर्षों में राज्य के 33 जिलों से 8,414 संभावित बाल विवाहों को रुकवाना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि जब शासन की नीति और समाज की नीयत एक दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो परिणाम अभूतपूर्व होते हैं।

हालांकि, 10.1 प्रतिशत का आंकड़ा यह चेतावनी भी देता है कि राह अभी पूरी निष्कंटक नहीं हुई है। ग्रामीण और सुदूर जनजातीय अंचलों में आज भी अशिक्षा, गरीबी और पारंपरिक जड़ता के कारण बाल विवाह के मामले सामने आते हैं।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2030 तक बाल विवाह को पूरी तरह समाप्त करने का जो सतत विकास लक्ष्य (SDG) तय किया गया है, उसे हासिल करने के लिए निगरानी तंत्र को और अधिक चुस्त बनाना होगा।

छत्तीसगढ़ सरकार का यह संकल्प कि प्रत्येक बालिका को सुरक्षा, शिक्षा और समान अवसर प्राप्त हों, न केवल राज्य के सामाजिक ढांचे को मजबूती प्रदान कर रहा है, बल्कि 27 नवंबर को वैश्विक पटल पर गूंजने वाले ‘बाल विवाह उन्मूलन दिवस’ के संकल्पों को जमीनी धरातल पर चरितार्थ करने का काम भी कर रहा है।

समय की मांग है कि इस मुस्तैदी को और धार दी जाए, ताकि कोई भी बचपन कुरीतियों की भेंट न चढ़े और हर बेटी अपनी पूर्ण क्षमता के साथ आकाश छू सके।
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